स्टेडियम की फ्लडलाइट्स चमक रही थीं, 200 से ज्यादा रनों का पहाड़ सामने था और फाइनल का दबाव हर सांस के साथ भारी होता जा रहा था. बाहर से सब सामान्य लग रहा था, लेकिन इस बड़े मंच पर उतरने वाली रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) की कप्तान स्मृति मंधाना अंदर से एक अलग ही लड़ाई लड़ रही थीं. तेज बुखार, शरीर में कंपकंपी और कमजोरी... हालात ऐसे थे कि कई खिलाड़ी ऐसे दिन मैदान के पास भी न जाएं, लेकिन स्मृति मंधाना अलग हैं.
RCB के हेड कोच मलोलन रंगराजन ने मैच के बाद कहा, 'उन्हें तेज बुखार था, तबीयत बेहद खराब थी, लेकिन टीम के भीतर किसी को इसका अहसास तक नहीं होने दिया. दोपहर में जब मैंने हाल पूछा, तो उन्होंने बस मुस्कुराकर कहा- नहीं मालो, कोई दिक्कत नहीं… मैं खेलूंगी.'
फाइनल में बहाने नहीं चलते... और स्मृति बहानों की खिलाड़ी कभी रहीं ही नहीं.
शांत शुरुआत, तूफानी इरादे
204 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए स्मृति मंधाना शुरुआत में बेहद संयमित दिखीं. 5 ओवर के बाद उनके नाम सिर्फ 6 रन थे. बाहर बैठा दर्शक शायद सोच रहा था- क्या यह वही फाइनल है, जहां स्मृति गायब हो जाती हैं? लेकिन यह सवाल उनके बल्ले ने बहुत बेरहमी से खारिज कर दिया.
इसके बाद जो हुआ, वह सिर्फ बल्लेबाजी नहीं थी- वह मानसिक मजबूती का प्रदर्शन था. स्मृति ने मैच को पढ़ा, गेंदबाज़ों को परखा और फिर एक-एक करके दिल्ली कैपिटल्स (DC) के सारे विकल्प खत्म कर दिए.
Captain Smriti battled overnight fever to lead from the front and play that match winning knock… 🫡
— Royal Challengers Bengaluru (@RCBTweets) February 6, 2026
Head Coach Malo’s words for 3 special players - Shreyanka, Pooja & Sayali, brought smiles on everyone’s faces… 🥹
A message for the next season and more from the dressing room.… pic.twitter.com/W6ToniL5II
स्पिन का जवाब, क्लास के साथ
दिल्ली की सबसे बड़ी ताकत स्पिन थी. श्री चरणी, स्नेह राणा... जिनके खिलाफ पूरी लीग में बल्लेबाजों ने दम तोड़ा था, लेकिन RCB की इकलौती लेफ्ट-हैंडर स्मृति मंधाना ने वही स्पिन गेंदें अलग-अलग हिस्सों में भेजनी शुरू कर दीं. कभी क्रीज से हटकर पॉइंट के ऊपर, कभी स्टंप्स के पार जाकर लॉन्ग-ऑन और डीप मिडविकेट के बीच.
यह ताकत नहीं थी, यह नियंत्रण था. यह जल्दबाजी नहीं थी, यह योजना थी.
हर ओवर में बाउंड्री लगी. हर शॉट दिल्ली के आत्मविश्वास को थोड़ा-थोड़ा तोड़ता चला गया. स्नेह राणा जैसी अनुभवी गेंदबाज भी बेबस नजर आईं. और फिर वह शॉट- पीछे हटकर, अंदर-बाहर का स्विंग और गेंद वाइड लॉन्ग-ऑफ के ऊपर. यह सिर्फ एक छक्का नहीं था, यह फाइनल पर हस्ताक्षर था.
87 रन… और एक पूरी कहानी
41 गेंदों पर 87 रन. तेज बुखार के बीच, दबाव के पहाड़ तले. RCB ने छह विकेट से मैच जीता और दूसरी बार WPL की चैम्पियन बनी.
स्मृति मंधाना पूरे टूर्नामेंट में 377 रन बनाकर टॉप स्कोरर रहीं, लेकिन यह पारी आंकड़ों से कहीं बड़ी थी. यह जवाब था- उन सवालों का, उन फुसफुसाहटों का, जो फाइनल से पहले उठती रही थीं.
'यह इनह्यूमन था…'
मैच के बाद कोच रंगराजन के पास शब्द कम पड़ गए. 'जिस तरह से उसने बल्लेबाजी की… शायद यह इनह्यूमन था. वह पूरी तरह कंट्रोल में थी. उसे पता था कि कब कहां मारना है.'
उन्होंने बताया कि यूपी वॉरियर्ज के खिलाफ लीग के आखिरी मैच में कुछ बदला था. 27 गेंदों पर नाबाद 54 रन. वही लय, वही आत्मविश्वास, जो फाइनल में फूट पड़ा.
जीत से भी बड़ी एक मिसाल
कोच कहते हैं, 'स्मृति मंधाना सिर्फ ट्रॉफी नहीं उठातीं, वह मानक तय करती हैं- ट्रेनिंग में, ड्रेसिंग रूम में और मैदान पर. अपने खेल को लेकर वह एक ‘नर्ड’ हैं. हर दिन कुछ नया आजमाना, खुद को बेहतर करना… शायद यही वजह है कि वह यहां तक पहुंची हैं.'
उस रात, जब RCB की खिलाड़ी जश्न में डूबी थीं, स्मृति मंधाना ने एक और भूमिका निभाई- प्रेरणा की. यह बता दिया कि फाइनल जीतने के लिए सिर्फ़ फिट शरीर नहीं, मजबूत इरादे चाहिए.
...और जब अंत में नारे गूंजे-
Ee saala kuda cup namdu (इस साल भी कप हमारा है) ...तो वह सिर्फ ट्रॉफी का जश्न नहीं था. वह उस लड़की की कहानी का उत्सव था, जिसने बुखार को नजरअंदाज किया, दबाव को चुनौती दी और फाइनल को हमेशा के लिए अपना बना लिया.