खराब फॉर्म, चयन से जुड़े झटकों और आलोचना के शोर के बीच इस बल्लेबाज ने जवाब शब्दों से नहीं, बल्ले से दिया. उसने अपनी तकनीक को निखारा, शॉट चयन में धैर्य जोड़ा और 196 रनों के दबाव भरे लक्ष्य का पीछा करते हुए पारी की रफ्तार को अपने नियंत्रण में रखा. जब विकेट गिर रहे थे और मैच फिसलता दिख रहा था, तब ‘हीरो नंबर 9’ एक छोर पर अडिग खड़ा रहा.
जी हां, नंबर-9 वाली जर्सी पहने संजू सैमसन के नाबाद 97 रन भारत के लिए सेमीफाइनल का टिकट से कम नहीं... सुपर आठ का वह मुकाबला, जो किसी क्वार्टर फाइनल जैसा था, उसमें सैमसन ने कमान संभाली और वेस्टइंडीज को 5 विकेट से हराकर टीम को आखिरी चार में पहुंचा दिया.संजू की इस पारी को सिर्फ ‘कमबैक’ कहना ठीक नहीं होगा. यह सिर्फ खराब दौर के बाद बनाए गए रन नहीं थे, बल्कि खुद पर दोबारा काम करने और भरोसा लौटाने की कहानी थी.
संजू ने अपनी तकनीक में छोटे... लेकिन अहम बदलाव किए, खासकर ट्रिगर मूवमेंट और संतुलन पर. साथ ही, उन्होंने बाहरी आलोचना को किनारे रखकर मैच की स्थिति के हिसाब से बल्लेबाजी की. सबसे बड़ी बात, उनका पुराना ‘ठहराव’ लौट आया- वही शांत चेहरा, गेंद को आखिरी पल तक देखने का धैर्य और बिना घबराहट के शॉट खेलना. जब सैमसन इस तरह खेलते हैं, तो वे सिर्फ रन नहीं बनाते, मैच का रुख बदल देते हैं.
Eden Gardens witnessed yet another classic! 💙
97*(50) in a must-win match - #SanjuSamson, take a bow! 🙌
ICC Men’s #T20WorldCup Semi-Final 2 👉 #INDvENG | THU, 5 MAR, 6 PM pic.twitter.com/UnBYIc7CF2— Star Sports (@StarSportsIndia) March 1, 2026
1. तकनीकी खामी से तकनीकी समाधान तक
न्यूजीलैंड और इंग्लैंड सीरीज के दौरान सैमसन की सबसे बड़ी परेशानी उनका ट्रिगर मूवमेंट बन गया था. गेंदबाज के हाथ से गेंद छूटने के बाद वे लेग-साइड और बैकफुट की ओर खिसक जाते थे. इसका असर साफ दिखता था- शरीर का वजन गेंद से दूर चला जाता, संतुलन बिगड़ता और बल्ला सीधा आने की बजाय स्लाइस करता हुआ दिखता. कई बार बैट का फेस बंद होने के कारण गेंद बल्ले के बाहरी किनारे से टकराती या लीडिंग एज बन जाता... नतीजा, एक जैसी गेंदों पर बार-बार आउट होने का सिलसिला, जिसने उनकी लय और आत्मविश्वास दोनों को प्रभावित किया.
आलोचकों ने तो इसे ‘फंडामेंटल फ्लॉ’ तक करार दे दिया था, मानो यही उनकी बल्लेबाजी की जड़ समस्या हो. लेकिन कोलकाता में तस्वीर बदली हुई दिखी. सैमसन अब भी बैक और लेग-साइड की ओर मूव कर रहे थे, फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार वह मूवमेंट देर से नहीं, पहले हो रहा था. यानी गेंदबाज के हाथ से गेंद छूटते समय उनका शरीर पहले से संतुलित स्थिति में था. उनका बेस स्थिर था, सिर सीधा और वजन नियंत्रित. यही छोटी-सी टाइमिंग का बदलाव उन्हें बेहतर संतुलन और साफ शॉट खेलने की आजादी दे गया.
यही सूक्ष्म बदलाव उन्हें संतुलन दे गया. शॉट खेलते वक्त सिर स्थिर, आंखें लेवल और बैट-स्विंग सीधी. यह बदलाव दिखने में छोटा, असर में बड़ा था.
2. पावरप्ले में आक्रामकता, पर नियंत्रण के साथ
196 रनों का पीछा करते हुए पावरप्ले में 24 रन (13 गेंद) बनाना सामान्य आंकड़ा लग सकता है, पर संदर्भ महत्वपूर्ण है. दो विकेट (6 ओवरों में 53/2) गिर चुके थे. इस परिस्थिति में सैमसन ने बेतरतीब आक्रमण नहीं किया.उन्होंने गेंद की लेंथ पढ़कर शॉट चुने. हार्ड लेंथ को फ्लैट-बैट से, फुलर लेंथ को कवर-ड्राइव या लॉन्ग-ऑफ के ऊपर. यहां उनका स्ट्राइक रेट आक्रामक था, लेकिन शॉट चयन सधे हुए. यही फर्क एक ‘फ्लैशी’ पारी और ‘मैच-विनिंग’ पारी में होता है.
3. ... स्पिन के खिलाफ असली परीक्षा
मध्य ओवरों में भारत लड़खड़ा सकता था. स्पिनरों के खिलाफ जहां बाकी बल्लेबाज स्पिन के खिलाफ 19 गेंदों में सिर्फ 21 रन ही जोड़ पाए- यानी लगभग रन-ए-बॉल से थोड़ा ऊपर, वहीं सैमसन ने उसी दौर में 17 गेंदों पर 37 रन ठोक दिए. यहां उनकी खासियत दिखी- लाइन के बाहर जाकर गेंद को एंगल से खेलना. वे क्रीज में गहराई तक गए, लेकिन बैलेंस नहीं खोया.
जेसन होल्डर और रोमारियो शेफर्ड जैसे गेंदबाजों की लेंथ-बेस्ड रणनीति को उन्होंने इंतजार करके तोड़ा. खासकर वाइड लेगकटर पर उनका लॉन्ग-ऑफ के ऊपर शॉट इस बात का संकेत था कि वे अब गेंद का पीछा नहीं कर रहे, गेंद उनके इंतजार में है.
4. एंकर नहीं, नियंत्रक
अक्सर 50 गेंदें खेलने वाले बल्लेबाज को ‘एंकर’ कहा जाता है, लेकिन यह पारी सिर्फ एंकरिंग नहीं थी- यह नियंत्रण की मिसाल थी. संजू ने जोखिम भी लिया, मगर पूरी गणना के साथ. विकेट गिरते तो रफ्तार थाम लेते, साथी जमता तो स्ट्राइक रोटेशन बढ़ा देते... सबसे अहम बात, उन्होंने कभी मैच को खुद से आगे नहीं निकलने दिया. पारी उनकी पकड़ में रही, और खेल उनकी शर्तों पर चला.
यह परिपक्वता उनके खेल में पहले कम ही नजर आती थी. सैमसन पर अक्सर यही टिप्पणी होती रही है कि वे या तो आंखों को सुकून देने वाली 30 रनों की पारी खेलते हैं या फिर जल्दबाजी में बड़ा शॉट लगाते हुए आउट हो जाते हैं. बीच का रास्ता जैसे गायब रहता था.
5. मानसिक शोर से मानसिक शांति तक
बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक ने इशारों में कहा कि कई आवाजें खिलाड़ी के मन में संदेह भर देती हैं. सैमसन के साथ यही हुआ. हर विशेषज्ञ, हर पूर्व क्रिकेटर सलाह दे रहा था. इस पारी में साफ दिखा कि उन्होंने शोर बंद किया. वे अपनी प्रक्रिया पर लौटे.
मैच के बाद इंटरव्यू में उनका यह कहना, 'मैंने खुद पर शक किया.' सिर्फ एक बयान नहीं था, बल्कि भीतर चल रही लड़ाई की सच्ची झलक थी. क्रिकेटर अक्सर आत्मविश्वास की बात करते हैं, कमजोरी की नहीं. ऐसे में खुले मंच पर संदेह स्वीकार करना दुर्लभ ईमानदारी है.
.@IamSanjuSamson reflects on how self-doubt is part of every cricketer’s journey, how setbacks fueled his growth, and how staying mentally strong helped him deliver when India needed it most.
— Star Sports (@StarSportsIndia) March 2, 2026
From tough phases to steering the team into the semi-final - a story of resilience,… pic.twitter.com/mWwT8SKTDE
6. भारत की रणनीति के लिए क्या मायने?
भारत ने उन्हें ओपनर-विकेटकीपर के रूप में चुना था, ताकि टीम को पावरप्ले में इंटेंट और मध्य ओवरों में फ्लुएंसी मिले. यह पारी उसी ब्लूप्रिंट की पुष्टि थी. सबसे अहम- उन्होंने दिखाया कि वे सिर्फ प्लान A नहीं, बल्कि प्लान A का विकसित संस्करण हैं.
अगर यह ठहराव कायम रहा, तो भारत को सेमीफाइनल में सिर्फ एक ओपनर नहीं, बल्कि एक टेम्पो-सेटर मिलेगा- जो मैच की गति तय कर सकता है.
- जब ईशान किशन IN, संजू OUT
... लेकिन यह कहानी सिर्फ व्यक्तिगत सुधार की नहीं है. इसके पीछे टीम रणनीति का बदलता गणित भी था. वर्ल्ड कप से ठीक पहले तक सैमसन ही नियमित ओपनर थे. उन्होंने अभिषेक के साथ मजबूत साझेदारी बनाई थी. लेकिन जनवरी 2026 में न्यूजीलैंड के खिलाफ खराब फॉर्म और घरेलू क्रिकेट में ईशान किशन के शानदार प्रदर्शन ने समीकरण बदल दिया. टीम ने फॉर्म को प्राथमिकता दी- किशन अंदर, सैमसन बाहर. द्विपक्षीय सीरीज में यह दांव चला, लेकिन वर्ल्ड कप के दबाव और धीमी पिचों पर तस्वीर अलग निकली.
- भारत को फिर संतुलन की ओर लौटना पड़ा
भारत की लेफ्ट-हैंड क्रांति ने टीम को विस्फोटक बनाया है. टॉप ऑर्डर में बाएं हाथ के बल्लेबाजों की मौजूदगी ने विरोधियों की योजनाएं बिगाड़ी हैं. लेकिन यही क्रांति जब दाएं हाथ के ऑफ-स्पिन और एंगल के जाल में उलझने लगी, तो संतुलन की जरूरत महसूस हुई. ऐसे में एक ‘राइट’ विकल्प ही ‘लेफ्ट’ समस्या का हल बन सकता था. शायद सही शुरुआत के लिए भारत को फिर संतुलन की ओर लौटना पड़ा और सैमसन को वापस लाना पड़ा.
सैमसन की बल्लेबाजी में आक्रामकता हमेशा दिखती रही है, लेकिन उसका स्रोत ठहराव है. जब वह ठहराव टूटता है, तो शॉट जल्दबाजी बन जाते हैं. जब वह लौटता है, तो वही शॉट कला बन जाते हैं. कोलकाता में उन्होंने सिर्फ रन नहीं बनाए... उन्होंने अपनी बल्लेबाजी की पहचान वापस पाई. और अगर यह पहचान बनी रही, तो यह पारी सिर्फ एक मैच-विनिंग नॉक नहीं, बल्कि करियर-डिफाइनिंग मोड़ साबित हो सकती है.