राजस्थान के झुंझुनूं जिले के छोटे से गांव खेडारो की ढाणी से निकली एक कहानी इन दिनों IPL के मंच पर सुर्खियां बटोर रही है. ये कहानी है मुकुल चौधरी की, लेकिन असल में यह एक पिता के जुनून, कर्ज, तानों और अटूट भरोसे की कहानी भी है.
मुकुल के पिता दलीप चौधरी ने 2003 में ग्रेजुएशन और शादी के साथ ही एक सपना देख लिया था. अगर बेटा हुआ तो उसे क्रिकेटर बनाएंगे. अगले साल मुकुल का जन्म हुआ और उसी के साथ शुरू हो गया एक लंबा संघर्ष.
दलीप ने छह साल तक राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) की तैयारी की, लेकिन सफलता नहीं मिली. इसके बाद रियल एस्टेट में हाथ आजमाया, वो भी नहीं चला. लेकिन इन नाकामियों के बीच उनका सपना कभी नहीं बदला.
2016 में बेहतर क्रिकेट अकादमी की तलाश उन्हें सीकर ले गए, जहां उन्होंने मुकुल का दाखिला कराया. यहीं से असली परीक्षा शुरू हुई. आमदनी का कोई स्थायी जरिया नहीं था, खर्च बढ़ता जा रहा था. ऐसे में दलीप ने बड़ा फैसला लिया. उन्होंने अपना घर बेच दिया. करीब 21 लाख रुपये मिले, जो पूरी तरह बेटे के क्रिकेट करियर में लगा दिए गए.
इसके बाद उन्होंने होटल का कारोबार शुरू किया और इसके लिए कर्ज लिया, लेकिन किश्तें समय पर नहीं चुका पाए. हालात इतने बिगड़े कि उन्हें जेल तक जाना पड़ा. दलीप कहते हैं, 'मैंने कभी धोखा नहीं दिया, लेकिन हालात मेरे खिलाफ थे.'
A journey that’s bound to inspire a generation! ✨#MukulChoudhary’s cricketing rise, his family’s sacrifices, and how the game changed everything around him. ❤️
— Star Sports (@StarSportsIndia) April 9, 2026
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इस दौरान रिश्तेदारों ने भी साथ छोड़ दिया. कई बार उन्हें ताने सुनने पड़े, 'अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली, अब बेटे को तो छोड़ दो.' ...लेकिन इन बातों ने दलीप को और मजबूत किया.
मुकुल ने भी इन संघर्षों को करीब से देखा. जब लखनऊ सुपर जायंट्स ने उन्हें IPL ऑक्शन में 2.60 करोड़ रुपये में खरीदा, तो उनका पहला वादा यही था कि वह पिता का कर्ज चुकाएंगे.
हालांकि IPL का दबाव अलग होता है. सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ एक मैच में वह टीम को जीत तक नहीं पहुंचा सके. कप्तान ऋषभ पंत ने मैच जरूर खत्म किया, लेकिन मुकुल के अंदर यह बात बैठ गई.
मैच के बाद टीम होटल में वह भावुक हो गए. झुंझुनूं में बैठे उनके पिता ने वीडियो कॉल पर बेटे की लाल आंखें देखीं. दलीप बताते हैं, 'मैंने पूछा- रो लिया? उसने सिर हिलाया और कहा कि अगली बार मौका मिला तो वह मैच खत्म करेगा.'
और यही बात मुकुल ने अगली ही पारी में साबित कर दी. उन्होंने दबाव में शानदार बल्लेबाजी करते हुए टीम को जीत दिलाई. उनकी 27 गेंदों की पारी सिर्फ रन नहीं थी, बल्कि एक जवाब थी अपने आप से, हालात से और उन तमाम लोगों से जिन्होंने कभी उन पर शक किया था.
दलीप खुद भी स्थानीय स्तर पर क्रिकेट खेल चुके हैं. उनके आदर्श कपिल देव और सचिन तेंदुलकर रहे, लेकिन मुकुल पर सबसे गहरा असर एमएस धोनी का पड़ा. 2011 वर्ल्ड कप फाइनल के बाद से उन्होंने धोनी की तरह मैच फिनिश करने का सपना देखा.
मुकुल कहते हैं, 'धोनी जिस तरह मुश्किल गेंदों को भी छक्का बना देते थे, वही चीज मैं सीखना चाहता हूं.' यही कारण है कि उनके खेल में आज फिनिशर का आत्मविश्वास साफ नजर आता है.
घरेलू क्रिकेट में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है. 2025-26 अंडर-23 लिस्ट-ए ट्रॉफी में उन्होंने 617 रन बनाए, जिसमें दो शतक और चार अर्धशतक शामिल थे. 39 छक्कों के साथ वह टूर्नामेंट के सबसे ज्यादा छक्के लगाने वाले बल्लेबाज रहे.
इसके बाद सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में भी उन्होंने तेज स्ट्राइक रेट से रन बनाए और चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा. कोच अंशु जैन के मुताबिक, 'दिल्ली के खिलाफ मैच में जब 26 रन चाहिए थे, तब मुकुल ने चार छक्के लगाकर मैच खत्म किया.'
ईडन गार्डन्स में खेली गई वह पारी सिर्फ एक शानदार इनिंग नहीं थी, वह सालों के संघर्ष, कर्ज, तानों और एक पिता के विश्वास का नतीजा थी.
मुकुल चौधरी ने उस रात सिर्फ एक मैच नहीं जिताया, उन्होंने अपने पिता के सपने को एक नई पहचान दी.