- 35 साल की उम्र
- एक हाथ पर टेप
- मौजूदा रणजी सीजन में अब तक 37 विकेट.
- सेमीफाइनल में 8/90- फर्स्ट-क्लास करियर की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी
- तीन मैचों में दूसरा 5 विकेट हॉल
- फिर भी टीम इंडिया से दूरी बरकरार
मोहम्मद शमी का मामला अब सिर्फ फॉर्म या फिटनेस का नहीं है. यह चयन प्रक्रिया की साफगोई और संवाद पर भी सवाल खड़ा करता है.
रणजी में बयान, आंकड़ों की भाषा में
जम्मू-कश्मीर के खिलाफ सेमीफाइनल में शमी ने जो 8/90 लिया, वह सिर्फ आंकड़ा नहीं- वह संदेश था. एक हाथ पर टेप बंधा हुआ, लेकिन लय में धार वैसी ही जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिखती थी. नई गेंद से शुरुआती दो विकेट, 143 रनों की साझेदारी तोड़कर मैच की दिशा बदलना और अंत में टेल को समेट देना- यह पूरा स्पेल अनुभव, फिटनेस और आक्रामक मानसिकता का नमूना था.
इस सीजन रणजी में 37 विकेट लेकर वह छठे सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं. यह उनका फर्स्ट-क्लास करियर का 15वां ‘फाइव-फॉर’ है. इससे पहले उनका सर्वश्रेष्ठ 7/79 (2012-13) था- टीम इंडिया डेब्यू से कुछ महीने पहले आया था.
पिछले मैच में उन्होंने अर्धशतक भी जड़ा. यानी योगदान एकतरफा नहीं. सवाल फिर वही- अगर यह पर्याप्त नहीं, तो चयन का पैमाना क्या है?
संवाद की कमी या रणनीतिक बदलाव?
चयन समिति के अध्यक्ष अजीत अगरकर और पैनल की ओर से शमी के भविष्य पर स्पष्ट बयान नहीं आया. शमी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उन्हें अपने रोल और भविष्य को लेकर साफ संकेत नहीं मिले.
यहां बहस ‘चयन बनाम अस्वीकृति’ की नहीं, ‘स्पष्टता बनाम चुप्पी’ की है. अगर भारत तेज गेंदबाजी में ट्रांजिशन के दौर से गुजर रहा है, तो क्या 37 विकेट लेने वाला अनुभवी गेंदबाज उस प्रक्रिया से बाहर है? अगर लंबी योजना बन रही है, तो क्या वर्तमान प्रदर्शन अप्रासंगिक हो गया?
उम्र बनाम प्रभाव
35 की उम्र को तर्क के तौर पर पेश करना आसान है. लेकिन रेड-बॉल क्रिकेट में अनुभव अक्सर निर्णायक होता है. स्विंग और सीम की समझ, दबाव में सटीक लाइन-लेंथ- ये गुण उम्र से नहीं, अभ्यास और अनुशासन से आते हैं.
शमी लगातार लंबे स्पेल डाल रहे हैं. फिटनेस पर सवाल नहीं. घरेलू क्रिकेट में असर बरकरार. ऐसे में क्या केवल उम्र चयन की कसौटी हो सकती है?
और सबसे अहम- क्या जसप्रीत बुमराह के साथ नई गेंद से उनकी जोड़ी को बिना स्पष्ट घोषणा के खत्म मान लिया जाए?
अक्टूबर की खिड़की: आखिरी या निर्णायक?
अक्टूबर-नवंबर में भारत का न्यूजीलैंड दौरा प्रस्तावित है- जिसमें दो टेस्ट की सीरीज होनी है. 2009 में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की अगुवाई में भारत ने न्यूजीलैंड में आखिरी टेस्ट सीरीज जीती थी. तब से लेकर अब तक भारतीय टीम वहां जीत दर्ज नहीं कर पाई है.
2014 में शमी ने दो टेस्ट में 10 विकेट लिए. वेलिंग्टन में 4/70, ऑकलैंड में 3/37. छह साल बाद, 2020 में उन्होंने दो टेस्ट में 5 विकेट झटके, जिसमें क्राइस्टचर्च में 4/81 उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा. कुल मिलाकर न्यूजीलैंड में 4 टेस्ट में 15 विकेट उनके नाम हैं. न्यूजीलैंड की परिस्थितियों में शमी का रिकॉर्ड साधारण नहीं है. इस बात का संकेत हैं कि सीम और स्विंग वाली पिचों पर वह अब भी उपयोगी साबित हो सकते हैं.
न्यूजीलैंड की पिचें- हल्की नमी, सीम मूवमेंट और हवा में स्विंग... शमी की ताकत के अनुरूप हैं. अगर चयन परिस्थितियों के आधार पर होता है, तो यह सीरीज तर्कसंगत अवसर हो सकती है.
लेकिन यदि प्राथमिकता पूरी तरह भविष्य की तैयारी है, तो यह संकेत होगा कि शमी का अध्याय लगभग बंद माना जा चुका है.
जनवरी में प्रस्तावित बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के लिए कम से कम चार टेस्ट की बड़ी सीरीज आ रही है. अगर दीर्घकालिक योजना को प्राथमिकता दी गई, तो संभव है कि युवा गेंदबाजों पर दांव लगाया जाए.
ऐसे में न्यूजीलैंड दौरा शमी के लिए एक ‘फेयरवेल विंडो’ भी हो सकता है... अगर चयन समिति उस दिशा में सोचे.
शमी ने भारत के लिए आखिरी मैच 2025 चैम्पियंस ट्रॉफी में खेला था. तब से घरेलू क्रिकेट में वह लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं.
असली मुद्दा: सम्मानजनक अंत या अनिश्चित खामोशी?
यह कहानी सिर्फ एक तेज गेंदबाज की वापसी की नहीं है. यह इस बात की परीक्षा है कि क्या भारतीय चयन प्रक्रिया प्रदर्शन को प्राथमिकता देती है और खिलाड़ियों के साथ पारदर्शी संवाद रखती है.
8/90 के बाद शमी ने दरवाजा खटखटाया नहीं- लगभग तोड़ दिया है. अब गेंद चयन समिति के पाले में है. अक्टूबर सिर्फ दो टेस्ट की सीरीज नहीं है. यह तय करेगा कि मोहम्मद शमी का अंतरराष्ट्रीय अध्याय सम्मानजनक विदाई के साथ बंद होगा या बिना स्पष्ट उत्तर के खामोशी में.