ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच होने वाला वर्ल्डकप सेमीफाइनल दोनों टीमों के कप्तानों में से किसी एक का आखिरी वर्ल्डकप मैच होगा. इसलिए इस जंग में सालों का अनुभव झोंकने की तैयारी में माइकल क्लार्क और महेंद्र सिंह धोनी दोनों ही होंगे. इसमें कोई शक नहीं कि माइकल क्लार्क एक जबरदस्त कप्तान हैं लेकिन बड़े मुकाबलों में जीत की बात करेंगे तो शायद ही दुनियाभर की मौजूदा सभी टीमों के कप्तानों में से कोई धोनी के आस-पास भी खड़ा होगा. धोनी जहां पिछला वर्ल्डकप जीतकर इस वर्ल्डकप में कप्तानी करने उतरे हैं वहीं क्लार्क के लिए कप्तान के तौर पर ये पहला वर्ल्ड कप है.
अनुभव में धोनी के आधे भी नहीं क्लार्क
वन-डे मैचों में कप्तानी की बात करें तो महेंद्र सिंह धोनी और माइकल क्लार्क का कोई मुकाबला नहीं. धोनी ने अब तक 177 मैचों में भारत की कप्तानी की है और 100 मैचों में वो भारत को जीत भी दिला चुके हैं, 62 मैचों में भारत की हार हुई है, 4 मैच टाई रहे जबकि 11 का कोई नतीजा नहीं निकला. उधर माइकल क्लार्क का कप्तानी में अनुभव सिर्फ 72 वन-डे मैचों का है, जिनमें से ऑस्ट्रेलिया ने 48 मैच जीते हैं और 21 में उसकी हार हुई है, 3 मैचों का कोई नतीजा नहीं निकला. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भी धोनी 34 मैचों में कप्तानी कर चुके हैं जबकि क्लार्क ने भारत के खिलाफ सिर्फ 3 ही मैचों में कप्तानी की है.
बड़े मैचों के कप्तान हैं धोनी
2007 में वर्ल्ड टी 20 का फाइनल हो, 2011 के वर्ल्डकप का फाइनल या 2013 की चैंपियंस ट्रॉफी का फाइनल, महेंद्र सिंह धोनी ने हर बार अपनी कप्तानी का लोहा मनवाया. यही नहीं आईपीएल के फाइनल मैचों में भी धोनी की कप्तानी की हमेशा तारीफ हुई . उन्होंने अपनी कप्तानी में अपनी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स को दो बार आईपीएल विजेता भी बनाया. धोनी के रिकॉर्ड्स साफ बताते हैं कि जितना बड़ा मैच होता है धोनी की कप्तानी उतनी ही निखर कर आती है. उधर माइकल क्लार्क की कप्तानी में ऑस्ट्रेलिया आजतक एक भी बड़ा टूर्नामेंट नहीं जीत पाया है. दबाव में दमदार कप्तानी दिखाने में क्लार्क अब तक नाकाम ही रहे हैं.
धोनी का मनोबल हैं ऊंचा
पिछले वर्ल्डकप में जीत और इस वर्ल्डकप के हर मैच में धमाकेदार प्रदर्शन की बदौलत धोनी का मनोबल एक कप्तान के तौर पर तो ऊंचा है ही, जिम्बाबवे के खिलाफ मुकाबले में मैच जिताऊ पारी खेलने के बाद धोनी का मनोबल एक बल्लेबाज़ के तौर पर भी आसमान छू रहा है. वहीं क्लार्क पिछले काफी समय से फिटनेस से जूझ रहे हैं. वर्ल्डकप की शुरूआत में उन्हें इसी वजह से बेंच पर भी बैठना पड़ा. न्यूज़ीलैंड के खिलाफ एक करीबी मुकाबले में उनकी टीम की हार भी हुई, जिसका असर क्लार्क के मनोबल पर भी हुआ.