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पहला आओ, सजा पाओ! ICC ने 50 साल में वर्ल्ड कप को बना दिया 'भूलभुलैया'

आईसीसी का वर्ल्ड कप इतिहास स्पष्टता और भ्रम के बीच झूलता रहा है. 1975 से 2026 तक फॉर्मेट में लगातार बदलाव हुए- कभी सुपर सिक्स, कभी सुपर एट, कभी अंक आगे ले जाने का नियम, तो अब प्री-सीडिंग... पिछले पचास वर्षों में आईसीसी ने वर्ल्ड कप के फॉर्मेट के साथ लगातार प्रयोग किए हैं, जिनमें कई बार प्रतिस्पर्धात्मक स्पष्टता की जगह व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता मिली.

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T20 वर्ल्ड कप 2026 अब सुपर 8 स्टेज में पहुंच गया है. (Photo, Getty)
T20 वर्ल्ड कप 2026 अब सुपर 8 स्टेज में पहुंच गया है. (Photo, Getty)

क्रिकेट प्रशंसकों से दो सवाल पूछिए -

- 2003 क्रिकेट वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में भारत ने किस टीम का सामना किया था?

- क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत और पाकिस्तान पहली बार कब भिड़े थे?

अगर इन सवालों का जवाब देने में ठहराव आता है, तो वजह सिर्फ याददाश्त नहीं है - वजह है आईसीसी के फॉर्मेट्स का लगातार बदलता, उलझता और कई बार बेतुका ढांचा.

2026 की ‘कॉमेडी’

2026 का पुरुष T20 वर्ल्ड कप भारत और श्रीलंका में खेला जा रहा है, लेकिन मैदान से ज्यादा चर्चा टूर्नामेंट की संरचना की हो रही है.

स्थिति यह बनी कि चारों ग्रुप विजेता- भारत, जिम्बाब्वे, दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज सुपर-8 के एक ही ग्रुप में पहुंच गए. वहीं रनर-अप टीमें दूसरे, अपेक्षाकृत आसान ग्रुप में हैं.

मतलब साफ है- ग्रुप में पहले स्थान पर आना आपको इनाम नहीं, सजा देता है.

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यह संयोग नहीं है. यह ड्रॉ की गड़बड़ी नहीं है. यह ‘प्री-सीडिंग’ का सीधा परिणाम है- वह प्रणाली जिसमें सुपर-8 के ग्रुप टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही आईसीसी रैंकिंग के आधार पर तय कर दिए जाते हैं, न कि ग्रुप स्टेज में वास्तविक प्रदर्शन के आधार पर.

नतीजा?

ग्रुप स्टेज प्रतियोगिता कम और औपचारिकता ज्यादा बन जाता है. असली समीकरण बोर्डरूम में तय हो जाते हैं, पहली गेंद फेंके जाने से पहले.

प्री-सीडिंग क्यों?

- ताकि ब्रॉडकास्टर्स महीनों पहले शेड्यूल लॉक कर सकें.
- भारत बनाम पाकिस्तान जैसे मुकाबले हर हाल में सुनिश्चित हों.
- भारत के सुपर-8 मैच विज्ञापनदाताओं को पहले से बेचे जा सकें.

यह टूर्नामेंट डिजाइन के नाम पर व्यावसायिक इंजीनियरिंग है.

यह नया नहीं, एक पैटर्न है

वनडे वर्ल्ड कप से लेकर T20 वर्ल्ड कप तक, आईसीसी ने लगातार फॉर्मेट के साथ प्रयोग किए हैं. अक्सर स्पष्टता की कीमत पर व्यावसायिक तर्क को प्राथमिकता दी गई है.

शुरुआती वनडे वर्ल्ड कप (1975-1987)

पहले चार वर्ल्ड कप में आठ टीमें, दो ग्रुप, शीर्ष दो सेमीफाइनल में.

सरल ढांचा- पर कमी यह थी कि सभी टीमें एक-दूसरे से नहीं खेलती थीं.

सबसे चौंकाने वाली बात?
भारत और पाकिस्तान 1992 तक वर्ल्ड कप में आमने-सामने नहीं आए. 1975, 1979, 1983 और 1987 में दोनों को अलग-अलग ग्रुप में रखा गया और कई बार बिना भिड़े ही बाहर हो गए.

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1992: लगभग आदर्श मॉडल

9 टीमें. फुल राउंड-रॉबिन. शीर्ष चार सेमीफाइनल में.

हर टीम हर टीम से खेली.
पहले मैच से नेट रन रेट मायने रखता था.
कहीं छुपने की जगह नहीं.

बारिश नियम पर विवाद था- दक्षिण अफ्रीका को एक गेंद में 22 रन का संशोधित लक्ष्य- लेकिन फॉर्मेट पर कोई सवाल नहीं.

संरचनात्मक ईमानदारी के लिहाज से यह सबसे साफ वर्ल्ड कप था.

1996: विस्तार और पतन की शुरुआत

12 टीमें. दो ग्रुप- हर ग्रुप से चार क्वार्टर फाइनल में.

छह में से चार के आगे बढ़ने का मतलब- दो हार के बाद भी आराम से क्वालिफाई.

1992 की तात्कालिकता खत्म हो गई.

1999: सुपर सिक्स की उलझन

सुपर सिक्स आया. ग्रुप से तीन टीमें आगे, और साथ में अपने ग्रुप की क्वालिफाई टीमों के खिलाफ अंक भी आगे ले जाए गए.

इतनी जटिल व्यवस्था कि गंभीर प्रशंसक भी स्टैंडिंग समझने में उलझ गए.

दक्षिण अफ्रीका का टाई सेमीफाइनल- लांस क्लूजनर का रन आउट- रन रेट के आधार पर बाहर.
एक ऐसा फॉर्मेट जिसमें टाई सेमीफाइनल के बाद भी रन रेट तय करे, और जिसे लोग पूरी तरह समझ न पाएं - यह गहरी संरचनात्मक खामी थी.

2003: वही कहानी, बड़ा पैमाना

14 टीमें. सुपर सिक्स फिर से. वही जटिल अंक प्रणाली.

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केन्या सेमीफाइनल तक पहुंचा और भारत से खेला- एक परीकथा जैसी कहानी.

लेकिन अधिकांश प्रशंसक यह ठीक से समझा नहीं पाए कि केन्या आगे कैसे बढ़ा.

2007: सबसे निचला बिंदु

16 टीमें. चार ग्रुप. सुपर-8. फिर से अंक आगे.

- 47 दिन का टूर्नामेंट.
- भारत और पाकिस्तान ग्रुप स्टेज में बाहर.
- फाइनल लगभग अंधेरे में खत्म.

यह वर्ल्ड कप व्यापक रूप से सबसे खराब माना गया.

2011 और 2015: स्थिरता की वापसी

दो ग्रुप. क्वार्टर फाइनल. सेमीफाइनल.

- साफ, समझने योग्य फॉर्मेट.
- आप नए दर्शक को भी समझा सकते थे.

दोनों टूर्नामेंट रोमांचक रहे. आईसीसी ने एक ही ढांचे को दो बार बनाए रखा - दुर्लभ संयम.

2019 और 2023: राउंड-रॉबिन की वापसी

10 टीमें. फुल राउंड-रॉबिन. शीर्ष चार सेमीफाइनल में.

1992 के बाद सबसे ईमानदार संरचना.

- हर मैच मायने रखता था.
- कोई कैरी फॉरवर्ड अंक नहीं.
- कोई अस्पष्ट सीडिंग नहीं.

- 2019 का फाइनल- मैच टाई, सुपर ओवर टाई, बाउंड्री काउंट से फैसला - इतिहास का सबसे यादगार क्षण.

- 2023 भी उतना ही स्पष्ट और संतुलित.

आईसीसी ने लगातार दो बार सही किया.

T20 वर्ल्ड कप का विकास
शुरुआती संस्करण (2007–2016)

सरल ग्रुप. सुपर-8 या सुपर फोर.
स्पष्ट स्टैंडिंग.

2007 का बॉल-आउट नियम विवादित था, पर ढांचा समझने योग्य था.

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2021–2022: सुपर 12 युग

16 टीमें. क्वालिफायर राउंड. दो ग्रुप. शीर्ष दो सेमीफाइनल.

थोड़ा विस्तृत, पर साफ.
कोई अंक आगे नहीं.
कोई प्री-सीडिंग नहीं.

2022 में इंग्लैंड ने खिताब जीतकर एक साथ वनडे और T20 दोनों विश्व कप रखने वाली पहली टीम बनने का गौरव हासिल किया.

2024: बदलाव की शुरुआत

20 टीमें. सुपर-8 की शुरुआत.

और यहीं चुपचाप प्री-सीडिंग आई.
सुपर-8 ग्रुप रैंकिंग से तय- ग्रुप स्टेज प्रदर्शन से नहीं.

तब यह दोष खुलकर सामने नहीं आया.

2026: खामी उजागर

अब आ चुका है.

चारों ग्रुप विजेता एक ही सुपर-8 ग्रुप में.
रनर-अप को आसान रास्ता.

पहले स्थान का इनाम- कठिन ड्रॉ.

यह दुर्घटना नहीं. यह डिजाइन है.

त्रासद-व्यंग्य

पचास साल से आईसीसी स्पष्टता और अराजकता के बीच झूलती रही है. विडंबना यह है कि आदर्श मॉडल उसे 1992 में ही मिल गया था. सवाल यह कभी नहीं था कि क्या काम करता है. सवाल यह था कि क्या प्रतिस्पर्धात्मक ईमानदारी को व्यावसायिक सुविधा पर तरजीह दी जाएगी. पचास साल का रिकॉर्ड कहता है- जवाब ‘नहीं’ है. क्रिकेट इससे बेहतर का हकदार है. हमेशा था. शायद आगे भी रहेगा.

(संदीपन शर्मा, हमारे गेस्ट ऑथर, क्रिकेट, सिनेमा, संगीत और राजनीति पर लिखना पसंद करते हैं. उनका मानना है कि ये चारों दुनिया आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं)

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