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साइंस न्यूज़

Explainer: क्या होती है जीनोम सिक्वेंसिंग... जिससे नए वैरिएंट्स का पता लगाते हैं?

Omicron genome sequencing
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कोरोना के नए और खतरनाक वैरिएंट ओमिक्रॉन (Omicron) को लेकर भारत की सरकार ने कमर कस ली है. दो लोग दक्षिण अफ्रीका से आए थे, वो कोरोना पॉजिटिव निकले हैं. तेलंगाना के स्कूल में 42 छात्र पॉजिटिव मिले हैं. इसके अलावा ओमिक्रॉन की मौजूदगी ब्रिटेन, कनाडा, नीदरलैंड्स में दर्ज की गई है. भारत सरकार ने हाल में मिले पॉजिटिव मामलों के सैंपल की पुष्टि और संक्रामकता की ताकत को जानने के लिए कोरोना के इस वैरिएंट की जीनोम सैंपलिंग का फैसला किया है. सैंपल को लैब में भेजा गया है. आइए जानते हैं कि आखिर ये जीनोम सिक्वेंसिंग (Genome Sequencing) होता क्या है? कैसे पता करते हैं कि कौन सा वैरिएंट कितना खतरनाक है? (फोटोः गेटी)

Omicron genome sequencing
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जीनोम सिक्वेसिंग क्या होती है? (What is Genome Sequencing?)

हमारी कोशिकाओं के भीतर आनुवंशिक पदार्थ (Genetic Material) होता है. इसे DNA, RNA कहते हैं. इन सभी पदार्थों को सामूहिक रूप से जीनोम कहा जाता है. एक जीन की तय जगह और दो जीन के बीच की दूरी और उसके आंतरिक हिस्सों के व्यवहार और उसकी दूरी को समझने के लिए कई तरीकों से जीनोम मैपिंग (Genome Mapping) या जीनोम सिक्वेंसिंग की जाती है. जीनोम मैपिंग से पता चलता है कि जीनोम में किस तरह के बदलाव आए हैं. यानी ओमिक्रॉन (Omicron) की जीनोम मैपिंग होती है तो इसके जेनेटिक मटेरियल की स्टडी करके यह पता किया जाएगा कि इसके अंदर किस तरह के बदलाव हुए हैं. यह पुराने कोरोना वायरस से कितना अलग है. (फोटोः गेटी) 

Omicron genome sequencing
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क्या होता है जीनोमिक्स? (What is Genomics?)

जीनोम में एक पीढ़ी से जुड़ें गुणों और खासियतों को अगली पीढ़ी में भेजने की काबिलियत होती है. इसलिए आपने सुना होगा कि अलग-अलग वैरिएंट मिलकर नया कोरोना वैरिएंट बना रहे हैं. यानी इनके अंदर पुरानी पीढ़ी के जीनोम और नए बने वैरिएंट की खासियत होगी. जीनोम के अध्ययन को जीनोमिक्स (Genomics) कहते हैं. (फोटोः गेटी)

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जीनोम सिक्वेंसिंग की जरूरत क्यों? (Why Genome Sequencing is important?)

जीनोम सिक्वेंसिंग की वजह से मानसिक, शारीरिक बीमारियों का इलाज किया जा सकता है. जैसे- कैंसर, दिल संबंधी रोग, डायबिटीज, हाई ब्लडप्रेशर, न्यूरोमस्क्युलर डिस्ऑर्डर आदि. इसके अलावा कई संक्रामक रोगों को इलाज के लिए भी जीनोम सिक्वेंसिंग जा चुकी है. जैसे- मलेरिया, डेंगू, एचआईवी, कोरोनावायरस, ईबोला, सार्स आदि. इससे यह पता चलता है कि किस व्यक्ति को किस तरह की बीमारी है या हो सकती है. कैसे लक्षण हो सकते हैं. हर देश के हिसाब से बीमारियों में कितना अंतर आता है. साथ ही इसके जरिए हम बीमारी का सटीक इलाज भी खोज सकते हैं. (फोटोः गेटी)

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जीनोम सिक्वेंसिंग में क्या जांचते हैं? (What happens in Genome Sequencing?)

जीनोम सिक्वेंसिंग में DNA या RNA के अंदर मौजूद न्यूक्लियोटाइड के लयबद्ध क्रम का पता लगाया जाता है. इसके तहत मौजूद चार तत्वों यानी एडानिन (A), गुआनिन (G), साइटोसिन (C) और थायमिन (T) की सीरीज का पता लगाया जाता है. ताकि इनमें आने वाले बदलाव से यह पता चल सके कि कौन सी बीमारी का वायरस या बैक्टीरिया कितना नुकसानदेह हो सकता है. (फोटोः गेटी)

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क्या होता है जेनेटिक वैरिएंट? (What is Genetic Variant?)

साधारण भाषा में अगर कहें तो जीनोम सिक्वेंसिंग एक तरह से किसी वायरस का बायोडेटा होता है. कोई वायरस कैसा है, किस तरह का दिखता है. इसकी जानकारी जीनोम से मिलती है. इससे ही कोरोनावायरस के नए स्ट्रेन का पता चलता है. कोरोना के नए स्ट्रेन को वैज्ञानिक भाषा में जेनेटिक वैरिएंट (Genetic Variant) कहते हैं. हर वैरिएंट की ताकत अलग-अलग होती है. इनका आकार, व्यवहार और नुकसान पहुंचाने की ताकत भी अलग-अलग होती है. (फोटोः गेटी)

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भारत में जीनोम सिक्वेंसिंग की सुविधा (Genome Sequencing Facilities in India)

देश में जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (नई दिल्ली), सीएसआईआर-आर्कियोलॉजी फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (हैदराबाद), डीबीटी - इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज (भुवनेश्वर), डीबीटी-इन स्टेम-एनसीबीएस (बेंगलुरु), डीबीटी - नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल  जीनोमिक्स (NIBMG), (कल्याणी, पश्चिम बंगाल), आईसीएमआर- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (पुणे) जैसे चुनिंदा प्रयोगशालाएं हैं. (फोटोः गेटी)

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कोरोना की जीनोम सिक्वेंसिंग (Genome Sequencing of Coronavirus)

कोरोनावायरस लगातार म्यूटेट हो रहा है. यानी अपना स्वरूप बदल रहा है. ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है. इस साल अप्रैल तक दुनिया के 172 देशों में 12 लाख से ज्यादा कोरोना वायरस जीनोम सिक्वेंसिंग हो चुकी थी. ये जानकारी द ग्लोबल इनिशिएटिव ऑन शेयरिंग एवियन इंफ्लूएंजा डेटा (GISAID) पर सार्वजनिक किया था. जीनोम सिक्वेंसिंग से मिली सारी जानकारियां सांइटिस्ट्स के लिए अत्यधिक जरूरी हैं. इनकी बदौलत पिछले कोरोना वायरसों और नए आने वाले कोरोना वायरसों के बारे जानकारी मिलेगी. साथ ही यह पता चल रहा है कि दुनिया भर के अलग-अलग देशों में किस तरह के कोरोना वायरस मौजूद हैं. (फोटोः गेटी)

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GISAID की शुरुआत साल 2016 में की गई थी ताकि फ्लू से संबंधित जीनोम का डेटाबेस तैयार हो सके. कोरोना वायरस के जीनोम से संबंधित पहला डेटा जनवरी 2020 में चीन ने डाला था. उसके बाद अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, यूके और अन्य देशों ने डालना शुरू किया. अब तक GISAID पर 172 देशों ने कोरोना वायरस के जीनोम सिक्वेंसिंग से संबंधित डेटा अपलोड किया है. (फोटोः गेटी)