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Pehowa Tirth: कुरुक्षेत्र का पिहोवा तीर्थ क्यों है खास? जहां महाभारत के इस योद्धा का हुआ था अंतिम संस्कार

Pehowa Tirth: सरस्वती नदी के किनारे बसा पिहोवा तीर्थ पितृ कर्मों के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यहां श्राद्ध और पिंडदान करने से आत्माओं को शांति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. हर साल यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-पाठ करने पहुंचते हैं और अपने पूर्वजों का आशीर्वाद लेते हैं.

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पिहोवा तीर्थ क्यों है विशेष? (Photo: ITG)
पिहोवा तीर्थ क्यों है विशेष? (Photo: ITG)

Pehowa Tirth: हरियाणा के कुरुक्षेत्र में स्थित पिहोवा तीर्थ को बहुत ही प्राचीन और पवित्र स्थान माना जाता है. यह तीर्थ सरस्वती नदी के किनारे बसा हुआ है और खासतौर पर पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यहां हर साल चैत्र चौदस के मौके पर बड़ा मेला लगता है, जिसमें देशभर से लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पूजा करने आते हैं. वामन पुराण के अनुसार, पिहोवा में स्नान करने से गंगा, यमुना, नर्मदा और सिंधु में स्नान करने जितना पुण्य मिलता है.

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि इस स्थान का नाम राजा पृथु के नाम पर पड़ा. कहा जाता है कि उन्होंने अपने पिता के निधन के बाद यहीं सरस्वती नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार और पिंडदान किया था. मान्यता है कि यहां स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है. यह भी कहा जाता है कि यहां मृत्यु होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है. महाभारत, पद्म पुराण, भागवत पुराण और वामन पुराण जैसे ग्रंथों में पिहोवा तीर्थ को अत्यंत पवित्र स्थल बताया गया है.

इसी तीर्थ स्थल पर हुआ था भीष्म पितामह का अंतिम संस्कार

पिहोवा तीर्थ को पितरों की शांति और मोक्ष से जुड़ा बेहद पवित्र स्थान माना जाता है. मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण और पांडव यहां आए थे और युद्ध में मारे गए वीरों के लिए पिंडदान किया था. कहा जाता है कि भीष्म पितामह का अंतिम संस्कार भी इसी स्थान पर हुआ था और उन्हें यहीं मोक्ष की प्राप्ति हुई. तभी से लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए इस तीर्थ पर आकर श्राद्ध और तर्पण करते हैं.

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पिहोवा तीर्थ से है भगवान ब्रह्मा और भगवान कार्तिकेय का भी है संबंध

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पवित्र स्थान पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी. महाभारत में भी इसका उल्लेख मिलता है कि इस क्षेत्र की पावन भूमि पर बैठकर सृष्टि का निर्माण हुआ था. वामन पुराण में भी इस तीर्थ का महत्व बताया गया है. मान्यता है कि भगवान इंद्र ने भी यहां आकर अपने पितरों का पिंडदान किया था.

इसके अलावा कई ऋषि-मुनियों और राजाओं से जुड़ी कथाएं भी इस स्थान को और अधिक पवित्र बनाती हैं. कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इसी भूमि पर कठोर तपस्या कर विशेष सिद्धि प्राप्त की थी. राजा ययाति ने भी यहां कई यज्ञ किए थे. साथ ही यह भी मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय अपने गणों के साथ इस तीर्थ में निवास करते हैं.

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