माघ मेला (प्रयागराज) में हुए विवाद के बाद ज्योतिर्मठ के पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवादों में घिर गए हैं. इसी के साथ ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद पर कई वर्षों से चला आ रहा विवाद भी सुर्खियों में आ गया है. असल में सनातन परंपरा के चार प्रमुख केंद्रों में से एक ज्योतिर्मठ की शंकराचार्य पदवी का 70 साल से अधिक पुराना है. इसीके साथ ये सवाल भी उठ रहे हैं कि आखिर शंकराचार्य बनाए कैसे जाते हैं, इसकी पूरी प्रोसेस क्या है?
भ्रमण और तीर्थ परंपरा से जुड़ा है शंकराचार्य पद
इस सवाल का जवाब इतिहास में आठवीं सदी के दौर में जाकर मिलता है. जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने पहले पूरे देश का भ्रमण किया, हर तीर्थ की यात्रा की और अपने अद्वैत सिद्धांत का प्रचार किया. अद्वैत सिद्धांत मानता है कि प्रकृति में जो भी कुछ अलग-अलग दिख रहा है, वह असल में एक ही है. वह एक ही रूप के अलग-अलग स्वरूप हैं. दार्शनिक तरीके से देखें तो जीव और परमात्मा अलग-अलग नहीं है. दोनों एक हैं.
शंकराचार्य से ही जुड़ी है शास्त्रार्थ परंपरा
इसी सिद्धांत को लेकर आगे बढ़ने के दौरान उनका कई विद्वानों से शास्त्रार्थ हुआ. जिनमें मंडन मिश्र, विदुषी उभय भारती, कई जैन आचार्य और बौद्ध मत को मानने वाले कई विद्वान भंते शामिल रहे. शंकराचार्य ने अपने शास्त्रार्थ से इन सभी को हराकरा अद्वैत सिद्धांत को स्थापित किया. इसके बाद ही उन्होंने चार मठों की स्थापना की.

एक से चार शंकराचार्य कैसे बने?
इन चार पीठों पर ही उन्होंने जिन्हें मठ का स्वामी और संरक्षक बनाया उन्हें उनके जरिये ही शंकराचार्य की उपाधि दी गई. इस तरह सबसे पहले एक शंकराचार्य थे. एक से चार हुए जो चारों दिशाओं में बने मठों में नियुक्त हुए. वैदिक सूक्ति 'एकोहं बहुस्याम:' (छांदोग्य उपनिषद) यानी 'ब्रह्म एक है और उसकी बहुत हो जाने की इच्छा है' के ध्येय वाक्य से ही मठों की स्थापना हुई और चार शंकराचार्य बने.
संन्यास और मठीय अनुशासन है जरूरी
सनातन परंपरा में शंकराचार्य केवल किसी मठ के प्रमुख नहीं होते, बल्कि वे आदि शंकराचार्य की बनाई गई दार्शनिक परंपरा के जीवित प्रतिनिधि माने जाते हैं. यह पद ज्ञान, त्याग, तप, शास्त्रबोध और गुरु–शिष्य परंपरा का मिला-जुला रूप है. शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया न तो चुनाव से तय होती है, न किसी सरकार की नियुक्ति से. यह एक विशुद्ध धार्मिक और परंपरागत प्रक्रिया है, जिसकी जड़ें वेद, उपनिषद, संन्यास परंपरा और मठीय अनुशासन में गहराई तक जाती हैं.
आदि शंकराचार्य और शंकराचार्य परंपरा की शुरुआत
आदि शंकराचार्य (लगभग 788–820 ई.) को खो चुके अद्वैत वेदांत को समाज में फिर से स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है. माधवीय शंकरविजय और अनंतानंद गिरी के लिखे हुए शंकरविजय और चिद्विलासीय शंकरविजय जैसे ग्रंथों में आदि शंकराचार्य का उल्लेख मिलता है कि उन्होंने पूरे भारत में भ्रमण कर वेदांत दर्शन की स्थापना की. इसी उद्देश्य से उन्होंने चार दिशाओं में चार आम्नाय पीठों की स्थापित किया. इन पीठों का उद्देश्य था- वेदों की रक्षा, संन्यास परंपरा का संरक्षण और अद्वैत दर्शन का प्रचार.
चार आम्नाय पीठ और उनका दार्शनिक ढांचा
परंपरा के अनुसार सभी पीठ को एक वेद, एक महावाक्य और एक संन्यास परंपरा सौंपी गई. इसका पूरा वर्णन भी माधवीय शंकरविजय, शंकराचार्य परंपरा के मठ के दस्तावेजों में मिलता है.
श्रृंगेरी शारदा पीठ (दक्षिण) – यजुर्वेद, महावाक्य- अहं ब्रह्मास्मि
द्वारका शारदा पीठ (पश्चिम) – सामवेद, महावाक्य- तत्त्वमसि
पुरी गोवर्धन पीठ (पूर्व) – ऋग्वेद, महावाक्य- प्रज्ञानं ब्रह्म
ज्योतिर्मठ/बदरिकाश्रम (उत्तर) – अथर्ववेद, महावाक्य- अयमात्मा ब्रह्म
इन पीठों के संरक्षक, मुखिया अधिष्ठाता को ही जगतगुरु शंकराचार्य कहा जाता है.
शंकराचार्य बनने की पहली और अनिवार्य शर्त: संन्यास
शंकराचार्य बनने के लिए सबसे पहली और अनिवार्य शर्त संन्यास है. धर्मशास्त्र, संन्यास उपनिषद और दशनामी परंपरा के ग्रंथों में इसका स्पष्ट जिक्र है, जहां लिखा मिलता है कि शंकराचार्य केवल वही बन सकता है जो पूरी तरह संन्यासी हो. गृहस्थ, ब्रह्मचारी या वानप्रस्थ इस पद के अधिकारी नहीं माने जाते. संन्यास का अर्थ केवल कपड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि जीवनभर के लिए त्याग, ब्रह्मचर्य और वैराग्य की प्रतिज्ञा है.
क्या है दशनामी परंपरा जिनसे आते हैं शंकराचार्य?
इस डिटेल के साथ यहां यह भी बताना जरूरी हो जाता है कि आदि शंकराचार्य ने संन्यासियों को दस नामों गिरि, पर्वत, सागर, तीर्थ, आश्रम, सरस्वती आदि में बांटा था. दस तरह के नामों की इसी परंपरा को दशनामी संप्रदाय कहा जाता है. चारों पीठों से जुड़े शंकराचार्य इसी दशनामी परंपरा से आते हैं. इससे वह बिल्कुल अलग हो ही नहीं सकते.
यह तथ्य भी मठाम्नाय निर्णय और पारंपरिक मठ के दस्तावेजों में मिलता है. शंकराचार्य पद केवल तपस्वी होने से नहीं मिलता. इसके लिए शास्त्रों का गहरा ज्ञान सबसे जरूरी शर्त है. यही योग्यता की कसौटी है. मठाम्नाय अनुशासन ग्रंथ में मठ से जुड़े सभी अनुशासन और नियम और कायदे-कानून का जिक्र है और मठों को इससे दाएं-बाएं होने की अनुमति नहीं है.
पहला स्टेप- वेद-वेदांगों का अध्ययन जरूरी
इसमें जिस तरह की परंपरा का जिक्र है उसके अनुसार अभ्यर्थी (यानी शंकराचार्य पद के लिए नामित) को वेदों का अध्ययन, प्रमुख उपनिषदों की समझ, ब्रह्मसूत्र और शंकरभाष्य का ज्ञान, भगवद्गीता पर अधिकार होना चाहिए. शंकराचार्य परंपरा का निर्णय करने वाली विद्वत संस्थाएं और काशी विद्वत परिषद जैसे मंचों ने बार-बार इसे सामने रखा है.
दूसरा स्टेप- गुरु-शिष्य परंपरा में बने रहना जरूरी
शंकराचार्य बनने या बनाए जाने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है गुरु–शिष्य परंपरा. परंपरा के अनुसार जीवित शंकराचार्य अपने जीवनकाल में ही योग्य शिष्य को चुनते हैं. यह चयन वर्षों की शिक्षा, तप और परीक्षा के बाद होता है. इसका उल्लेख माधवीय शंकरविजय और मठीय परंपराओं में मिलता है, हालांकि वह इस सोच के साथ किसी शिष्य को चयनित नहीं कर सकते हैं कि वही उनके बाद शंकराचार्य बनें. साफ-साफ कहें तो शंकराचार्य वसीयत के आधार पर नहीं बन सकते हैं.
तीसरा स्टेप- गुरु की इच्छा, अनुमति और अधिकार
जब गुरु यह मान लेते हैं कि शिष्य पूर्णतः योग्य है, तब उसे उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है, लेकिन यह घोषणा अकेले गुरु नहीं कर सकते हैं. मठ और पीठ के सामने सार्वजनिक घोषणा की जाती है, जिसमें अन्य मठों को शंकराचार्यों की सहमति भी शामिल है.
चौथा स्टेप- मठों की सहमति, मठ परिषद की उपस्थिति जरूरी
भले ही अंतिम निर्णय गुरु का होता है, फिर भी परंपरा की वैधता के लिए वरिष्ठ संन्यासी, वेदपाठी आचार्य, मठ परिषद की उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है. इससे परंपरा की निरंतरता प्रमाणित होती है. यह प्रक्रिया वैदिक मंत्रोच्चार और संन्यास विधि के अनुसार होती है, जिसमें औपचारिक पट्टाभिषेक सबसे महत्वपूर्ण होता है.

अब कुछ आसान से सवाल जो अक्सर जिज्ञासा बनते हैं...
क्या राजा (या सत्ता) का हस्तक्षेप होता है?
पहला तो यह क्या शंकराचार्य के चयन में राजा या राज्य की भूमिका होती रही है? इसका जवाब है कि सीधे उनकी कोई भूमिका नहीं होती. पुराने समय में राजा मठों के संरक्षक होते थे, वह निर्णायक नहीं थे. कवि और लेखक कल्हण की लिखी राजतरंगिणी और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ बताते हैं कि राजा मठों को सम्मान और दान देते थे, लेकिन शंकराचार्य की नियुक्ति में हस्तक्षेप नहीं करते थे.
...जब दरभंगा नरेश ने की थी ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य बनाए जाने की कवायद
इसे ज्योतिर्मठ के ही एक उदाहरण से समझा जा सकता है. साल 1941 से पहले 168 साल तक इस पीठ पर कोई भी शंकराचार्य नहीं था. एक तरफ जब भारत की आजादी की कवायद अपने अंतिम चरण में पहुंच रही थी तब उस समय देश में सनातन के संरक्षण के लिए ये जरूरी लगा कि सभी पीठों पर शंकराचार्य हों और वह सक्रिय भूमिका में रहें. इस जरूरत को समझते हुए दरभंगा नरेश, गढ़वाल के शासक और अन्य कुछ रियासतों के प्रभावशाली राजा सामने आए, उन्होंने मठों को इस कार्य के लिए एकजुट किया और फिर सभी की सहभागिता से ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद के लिए स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को चुना गया.
क्या सरकारें और संविधान इस पदवी पर हस्तक्षेप कर सकते हैं?
भारतीय संविधान के आर्टिकल 25 और 26 धार्मिक संस्थाओं को स्वायत्तता देते हैं. यह स्वायत्त स्वतंत्रता सिर्फ चार मठों तक ही नहीं सीमित है, बल्कि अन्य धार्मिक पीठों और मठों के लिए भी है. सुप्रीम कोर्ट ने शिरूर मठ केस (AIR 1954 SC 282) में स्पष्ट कहा था कि राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता.
शिरूर मठ केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बनता है उदाहरण
शिरूर मठ केस मामले में सवाल था कि क्या सरकार किसी मठ या धार्मिक संस्था के धार्मिक कामों में दखल दे सकती है. कोर्ट ने साफ कहा कि संविधान का आर्टिकल 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों को खुद चलाने का अधिकार देता है, यानी पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और धार्मिक आस्थाओं में सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती. हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मठ की संपत्ति, आय, प्रशासन और आर्थिक प्रबंधन जैसे गैर-धार्मिक (सेक्युलर) मामलों को कानून के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है. सरल शब्दों में, यह फैसला धर्म और प्रशासन के बीच की रेखा खींचता है, जिसमें कहा गया कि धर्म में तो आजादी है, लेकिन व्यवस्था और धन के मामलों में सरकारी नियंत्रण संभव है.
ज्योतिर्मठ (बदरिकाश्रम) शंकराचार्य पद पर विवाद: परंपरा और दावा
ज्योतिर्मठ, जिसे उत्तराम्नाय पीठ भी कहा जाता है, शंकराचार्य परंपरा का उत्तरी केंद्र है. परंपरा के अनुसार इसका संबंध सीधे बदरिकाश्रम और अथर्ववेद से है. माधवीय शंकरविजय में जिक्र है कि यहां का शंकराचार्य हिमालय क्षेत्र में वेदांत परंपरा का संरक्षक होता है. बीसवीं शताब्दी के बीतते-बीतते ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हुआ. विवाद का मूल प्रश्न यह नहीं था कि शंकराचार्य कौन है, बल्कि यह था कि उत्तराधिकारी की घोषणा परंपरा के अनुसार हुई या नहीं?
इस विवाद में तीन प्रमुख बिंदु उभरकर सामने आए.
1. क्या पूर्व शंकराचार्य ने अपने जीवनकाल में उत्तराधिकारी घोषित किया था?
2. क्या दीक्षा और पट्टाभिषेक की प्रक्रिया शास्त्र के अनुसार ठीक थी?
3. क्या मठीय परंपरा और दशनामी संप्रदाय के नियमों का पालन हुआ?
इलाहाबाद हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह प्रश्न आया कि क्या सिविल कोर्ट किसी व्यक्ति को शंकराचार्य के रूप में काम करने से रोक सकती है. न्यायालयों ने बार-बार स्पष्ट किया कि वे धार्मिक पद की वैधता तय नहीं करते, बल्कि केवल यह देखते हैं कि सिविल कोर्ट का आदेश विधिक सीमा में है या नहीं.
मठाम्नाय अनुशासनः शंकराचार्यों के लिए लिखित संविधान
शंकराचार्यों की नियुक्ति, योग्यता और भूमिका को समझने का सबसे प्रामाणिक और जरूरी सोर्स है 'मठाम्नाय अनुशासन'. मठाम्नाय (मठ और आम्नाय) आदि शंकराचार्य की ही लिखी एक रचना है, जो उनके द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों (शारदा, गोवर्धन, द्वारका, शृंगेरी) के नियम और सिद्धांतों का वर्णन करती है, जिसे 'महानुशासन' भी कहते हैं और यह मठों के अनुशासन और कार्यप्रणाली के लिए एक मार्गदर्शक है, जिसमें विद्वानों और पीठाधीश्वरों के कर्तव्य बताए गए हैं.

मठाम्नाय का अर्थ है 'मठों के आम्नाय यानी परंपरा और नियम' यह रचना मठों की व्यवस्था, उनके सिद्धांत, और पीठाधीश्वरों के आचरण और विद्वानों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करता है.
इसके लगभग 73 श्लोकों में मठों की जरूरी परंपरा के विधान हैं, जिसे 'महानुशासन' या 'मठाम्नाय महासेतुः' भी कहा जाता है. यह ग्रंथ मठों के पदानुक्रम और उनके संचालन के लिए वैदिक परंपराओं का पालन तय करता है, और गैर-मान्यता प्राप्त पीठाधीश्वरों के दावों को खारिज करता है. तो शंकराचार्यों की नियुक्ति, उनका बनना और उनका चयन-चुनाव इसी लिखी हुई परंपरा के आधार पर होता है.
शंकराचार्य नियुक्ति से जुड़े कुछ सबसे आम सवाल
प्रश्न: शंकराचार्य कौन बन सकता है?
उत्तर: वही व्यक्ति शंकराचार्य बन सकता है जो दशनामी संन्यास परंपरा से दीक्षित संन्यासी हो, शास्त्रों में पारंगत हो और गुरु–शिष्य परंपरा के अनुसार उत्तराधिकारी घोषित किया गया हो.
प्रश्न 2: क्या कोई गृहस्थ शंकराचार्य बन सकता है?
उत्तर: नहीं, धर्मशास्त्रों और मठीय परंपरा के अनुसार गृहस्थ इस पद पर नहीं आ सकता है.
प्रश्न 3: क्या शंकराचार्य का चुनाव होता है?
उत्तर: नहीं, शंकराचार्य पद पर न तो चुनाव होता है और न ही मतदान. यह परंपरागत उत्तराधिकार की प्रक्रिया है, लेकिन इसमें भी सभी की सहमति होती है और आखिरी सहमति जिस पीठ का शंकराचार्य चुना जा रहा होता है, उसके अलावा तीनों अन्य पीठों के शंकराचार्यों की ओर से सहमति की घोषणा जरूरी होती है.
प्रश्न 4: क्या सरकार शंकराचार्य नियुक्त कर सकती है?
उत्तर: नहीं, सरकार या राज्य को धार्मिक पद पर नियुक्ति का अधिकार नहीं है।
प्रश्न 5: शंकराचार्य की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर: परंपरा के अनुसार जीवित शंकराचार्य ही योग्य शिष्य को अपना उत्तराधिकारी घोषित करता है।
प्रश्न 6: क्या एक से अधिक शंकराचार्य हो सकते हैं?
उत्तर: परंपरा में प्रत्येक पीठ के लिए एक ही शंकराचार्य होता है. एक से अधिक शंकराचार्य नहीं हो सकते हैं.
प्रश्न 7: पट्टाभिषेक क्या होता है?
उत्तर: यह वह धार्मिक विधि है जिसमें उत्तराधिकारी को औपचारिक रूप से पीठाधीश्वर घोषित किया जाता है.
प्रश्न 8: क्या लिखित वसीयत से शंकराचार्य बनाया जा सकता है?
उत्तर: नहीं, लिखित दस्तावेज़ से शंकराचार्य नहीं बनाए जा सकते हैं. परंपरागत दीक्षा और सार्वजनिक घोषणा जरूरी है.
प्रश्न 9: मठ परिषद की क्या भूमिका होती है?
उत्तर: मठ परिषद और वरिष्ठ संन्यासी प्रक्रिया के साक्षी होते हैं, पर अंतिम निर्णय गुरु का होता है.
प्रश्न 10: क्या कोर्ट शंकराचार्य तय कर सकती है?
उत्तर: नहीं, अदालत यह घोषित नहीं करती कि शंकराचार्य कौन है.
प्रश्न 11: क्या शंकराचार्य पद आजीवन होता है?
उत्तर: परंपरा के अनुसार शंकराचार्य आजीवन पद पर रहते हैं, जब तक वे खुद उत्तराधिकारी घोषित न कर दें.