Eid ul Adha: इस्लाम धर्म में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद को बेहद पाक और अहम त्योहार माना जाता है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ बकरे की कुर्बानी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन असल में यह त्योहार त्याग, सब्र और अल्लाह के हुक्म के आगे पूरी तरह सिर झुका देने की मिसाल है. इसके पीछे हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम की ऐसी कहानी छुपी है, जिसे इस्लामी इतिहास का सबसे बड़ा इम्तिहान माना जाता है.
इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक, हजरत इब्राहिम अल्लाह के लाडले नबियों में एक थे. बुढ़ापे में लंबी दुआओं के बाद उन्हें बेटा हुआ, जिनका नाम इस्माइल रखा गया. इब्राहिम अपने बेटे से बेहद मोहब्बत करते थे. लेकिन जब इस्माइल चलने-फिरने की उम्र में पहुंचे, तब अल्लाह ने हजरत इब्राहिम का इम्तिहान लेने का फैसला किया.
हजरत इब्राहिम ने देखा ख्वाब
कहा जाता है कि लगातार तीन रातों तक हजरत इब्राहिम को ख्वाब आया, जिसमें अल्लाह ने उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने को कहा. इब्राहिम समझ गए कि उनका सबसे अज़ीज़ बेटा ही वह चीज है, जिसकी कुर्बानी मांगी जा रही है.
इसके बाद उन्होंने अपने बेटे इस्माइल से इस बारे में बात की. उन्होंने कहा, “बेटा, मैंने ख्वाब में देखा है कि मैं तुम्हें कुर्बान कर रहा हूं. तुम्हारी क्या राय है?” यह सुनकर भी हजरत इस्माइल घबराए नहीं. उन्होंने जवाब दिया, “अब्बू जान, आपको जो हुक्म मिला है, उसे पूरा कीजिए. इंशाअल्लाह, आप मुझे सब्र करने वालों में पाएंगे.”
यह सिर्फ एक बाप-बेटे की बातचीत नहीं थी, बल्कि अल्लाह के प्रति अटूट भरोसे और ईमान की सबसे बड़ी मिसाल थी.
आज भी हज के दौरान मुसलमान शैतान को मारते हैं कंकड़
इसके बाद हजरत इब्राहिम अपने बेटे को लेकर मक्का के पास मीना के मैदान की ओर रवाना हुए. रास्ते में शैतान ने कई बार उन्हें रोकने और बहकाने की कोशिश की, लेकिन उनका ईमान नहीं डगमगाया. उन्होंने शैतान को कंकड़ मारकर भगा दिया. यही वजह है कि आज भी हज के दौरान मुसलमान जमरात पर कंकड़ मारते हैं.
मीना पहुंचकर हजरत इस्माइल ने अपने पिता से कहा कि वह उनकी आंखों पर पट्टी बांध लें, ताकि बेटे का चेहरा देखकर उनका दिल न पसीज जाए. हजरत इब्राहिम ने आंखों पर पट्टी बांधी और अल्लाह का नाम लेकर छुरी चला दी.
जिब्राईल जन्नत से लेकर दुम्बा
लेकिन जैसे ही छुरी चली, अल्लाह ने अपने बंदे की यह कुर्बानी और सब्र कबूल कर लिया. फरिश्ते जिब्राईल जन्नत से एक दुम्बा लेकर आए और हजरत इस्माइल की जगह उसे रख दिया गया. जब हजरत इब्राहिम ने आंखों से पट्टी हटाई, तो उनका बेटा सही-सलामत खड़ा था और उसकी जगह दुम्बा कुर्बान हो चुका था.
तभी आसमान से आवाज आई, "ऐ इब्राहिम! तुमने अपने ख्वाब को सच कर दिखाया."
यही घटना ईद-उल-अजहा की बुनियाद मानी जाती है. इस्लाम में कुर्बानी का मतलब सिर्फ जानवर की बलि देना नहीं, बल्कि अपने अंदर की बुराइयों, अहंकार, लालच और गुस्से को खत्म करना भी है. साथ ही यह त्योहार गरीबों और जरूरतमंदों के साथ खुशियां बांटने का भी पैगाम देता है.