राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति का किसी मामले में आरोपी होना, उसके दोषी होने का प्रमाण नहीं है. अदालत ने गिरफ्तारी के बाद पुलिस द्वारा थाने के बाहर आरोपी की फोटो खींचकर जारी करने के चलन पर कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने इसे मानव गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना है.
यह मामला जैसलमेर पुलिस से जुड़ा है, जहां एक परिवार के कुछ सदस्यों को गिरफ्तार करने के बाद उनकी तस्वीरें ली गईं और उन्हें सोशल मीडिया व स्थानीय समाचार पत्रों में प्रसारित किया गया. इसको लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी. सुनवाई के दौरान न्यायाधीश फरजंद अली ने अधिवक्ता देवकीनंदन व्यास को न्याय मित्र नियुक्त किया.
गिरफ्तारी के बाद फोटो जारी करने पर कोर्ट का सख्त रुख
न्याय मित्र देवकीनंदन व्यास ने अदालत को बताया कि गिरफ्तारी के बाद तस्वीरें सार्वजनिक होने से संबंधित लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा. कोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए जैसलमेर पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए कि यदि किसी गिरफ्तार व्यक्ति की तस्वीरें या उससे जुड़ी सामग्री किसी भी ऑनलाइन मंच पर अपलोड की गई हैं, तो उन्हें तुरंत हटवाया जाए.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जोधपुर के उदयमंदिर थाना क्षेत्र के एक अन्य मामले का भी संज्ञान लिया, जिसमें अधिवक्ता मोहन सिंह रतनू को गिरफ्तार कर थाने के सामने बैठाकर उनकी तस्वीरें वायरल करने का आरोप है. अदालत ने जोधपुर पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया कि अधिवक्ता की सभी तस्वीरें 24 घंटे के भीतर हर प्लेटफॉर्म से हटाई जाएं और इसकी अनुपालना रिपोर्ट पेश की जाए.
भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए पुलिस को निर्देश
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता रजाक हैदर ने बताया कि जैसलमेर जिले में कई मामलों में महिलाओं और अविवाहित युवतियों की भी तस्वीरें जारी की गईं, जबकि किसी भी मामले में दोष सिद्ध नहीं हुआ. कोर्ट ने साफ किया कि दोष सिद्ध होने तक व्यक्ति आरोपी ही माना जाता है और गिरफ्तारी से उसकी गरिमा समाप्त नहीं होती. मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी 2026 को होगी.