राजस्थान के कोटा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सीजेरियन डिलीवरी के बाद महिलाओं की तबीयत बिगड़ने का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है. अब तक 10 प्रसूताओं की किडनी फेल होने के मामले सामने आ चुके हैं, जबकि तीन महिलाओं की मौत हो चुकी है. लगातार बढ़ते मामलों के बाद अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा हुआ है. वहीं दोनों सरकारी अस्पतालों में भर्ती प्रसूताओं और उनके परिजनों के बीच दहशत का माहौल है.
ताजा मामला जेके लोन अस्पताल से सामने आया है, जहां एक और महिला की मौत हो गई. इसके साथ ही इस पूरे मामले में मृतकों की संख्या बढ़कर तीन हो गई है. सभी महिलाओं की हाल ही में सीजेरियन डिलीवरी हुई थी, जिसके कुछ समय बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने लगी. कई महिलाओं में हाथ-पैरों में तेज दर्द, सांस लेने में दिक्कत और यूरिन आउटपुट बंद होने जैसी गंभीर समस्याएं सामने आईं.

इससे पहले न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती छह महिलाओं की किडनी फेल होने का मामला सामने आया था. इनमें दो महिलाओं की मौत हो चुकी थी, जबकि बाकी मरीजों का इलाज नेफ्रोलॉजी वार्ड में चल रहा था. अब धीरे-धीरे ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 10 तक पहुंच गई है. कई मरीजों को डायलिसिस पर रखा गया है, जबकि कुछ महिलाओं की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है.
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26 साल की किरण का मामला भी चर्चा में है. परिजनों के मुताबिक, सीजेरियन डिलीवरी के बाद अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई. पहले हाथ-पैरों में तेज दर्द शुरू हुआ और फिर यूरिन आना बंद हो गया. आरोप है कि हालत गंभीर होने पर सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने जवाब दे दिया और निजी अस्पताल ले जाने की सलाह दी. फिलहाल महिला कोटा के तलवंडी स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती है, जहां उसका ऑक्सीजन सपोर्ट और डायलिसिस के जरिए इलाज चल रहा है.
घटना के बाद अस्पताल प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. परिजन इलाज में लापरवाही और इन्फेक्शन की आशंका जता रहे हैं. वहीं स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले की जांच में जुटा हुआ है. शुरुआती जांच में इन्फेक्शन, दवाइयों या ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल किए गए मेडिकल उपकरणों को लेकर भी आशंकाएं जताई जा रही हैं, हालांकि अभी तक आधिकारिक रूप से किसी एक कारण की पुष्टि नहीं हुई है.
मामले की गंभीरता को देखते हुए मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम बनाई है. मरीजों की लगातार निगरानी की जा रही है और स्वास्थ्य विभाग की ओर से रिपोर्ट तैयार की जा रही है. इन मामलों ने सरकारी अस्पताल में प्रसूताओं की सुरक्षा और इलाज को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.