राजस्थान में फर्जी डॉक्टरों के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जहां राजस्थान मेडिकल काउंसिल (RMC) के तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ. राजेश शर्मा समेत 18 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. यह कार्रवाई एसओजी द्वारा की गई है. इस मामले को उजागर करने में आजतक की दो दिन तक चली सीरीज भी अहम रही, जिसके बाद सरकार ने जांच कमेटी गठित की थी.
एसओजी ने बताया कि फर्जी एमबीबीएस डिग्री और प्रमाण पत्र के आधार पर डॉक्टर बनकर मरीजों का इलाज करने वाले गिरोह के खिलाफ नौ जिलों की पुलिस के साथ समन्वय कर 22 से अधिक टीमों ने एक साथ दबिश दी. इस संयुक्त कार्रवाई में RMC के तत्कालीन रजिस्ट्रार और अन्य कर्मचारियों की संलिप्तता सामने आई है.
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अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एसओजी, राजस्थान जयपुर विशाल बंसल के अनुसार, फर्जी FMGE प्रमाण पत्रों की शिकायत मिलने के बाद प्राथमिक जांच में मुकदमा संख्या 34/2025 दर्ज किया गया था. जांच के दौरान सामने आया कि आरोपी पीयूष त्रिवेदी फर्जी एमबीबीएस प्रमाण पत्र के आधार पर करौली में इंटर्नशिप कर रहा था.
फर्जी डिग्री से इंटर्नशिप और रजिस्ट्रेशन
पीयूष त्रिवेदी की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में खुलासा हुआ कि उसे फर्जी प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने में देवेंद्र, शुभम और भानाराम की भूमिका रही. पुलिस ने इन सभी आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया. आगे की जांच में यह सामने आया कि एक संगठित गिरोह फर्जी एमबीबीएस प्रमाण पत्रों के जरिए RMC से अवैध इंटर्नशिप और रजिस्ट्रेशन दिलवा रहा था.
जांच के दौरान RMC के तत्कालीन रजिस्ट्रार और कर्मचारियों की दलालों के साथ मिलीभगत उजागर हुई. इसके आधार पर एक अलग मामला मुकदमा संख्या 08/2026 दर्ज किया गया. अब तक 90 से अधिक ऐसे डॉक्टरों की पहचान की जा चुकी है, जिन्होंने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर इंटर्नशिप और पंजीयन हासिल किया.
एसओजी की टीमों ने दिल्ली, जयपुर, उदयपुर और जोधपुर समेत कई शहरों में एक साथ कार्रवाई करते हुए आरोपियों को पकड़ा. इस ऑपरेशन में डीआईजी एसओजी परीस देशमुख और पुलिस अधीक्षक कुंदन काँवरिया के नेतृत्व में 21 से अधिक टीमों ने संयुक्त रूप से दबिश दी.
20-25 लाख में बिक रही थी डिग्री
इस कार्रवाई में RMC के तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ. राजेश शर्मा और नोडल अधिकारी अखिलेश माथुर समेत कुल 18 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. उदयपुर से पकड़े गए आरोपी डॉ. यश पुरोहित द्वारा फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर निजी अस्पताल में डॉक्टर के रूप में सेवाएं देने का मामला भी सामने आया है.
प्राथमिक जांच में खुलासा हुआ है कि यह गिरोह प्रत्येक अभ्यर्थी से 20 से 25 लाख रुपये लेकर फर्जी इंटर्नशिप और रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र उपलब्ध कराता था. इसमें से करीब 11 लाख रुपये RMC के अधिकारियों और कर्मचारियों को दिए जाते थे, जबकि बाकी रकम दलालों के बीच बांटी जाती थी।.
यह पूरा मामला एक बड़े संगठित अपराध की ओर इशारा करता है, जिसमें सिस्टम के अंदर बैठे लोग ही इस फर्जीवाड़े को बढ़ावा दे रहे थे. फिलहाल पुलिस इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है और आगे और गिरफ्तारियों की संभावना जताई जा रही है.