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60 साल का सत्ता-सूखा… तमिलनाडु सरकारों में DMK ने कैसे कांग्रेस को 'अछूत' बनाए रखा

भारतीय राजनीति के इतिहास में गठबंधन की जितनी परतें तमिलनाडु में देखने को मिलती हैं, उतनी कहीं नहीं. यहां सत्ताधारी डीएमके और कांग्रेस का गठबंधन ऐसी प्रेम-कहानी का नतीजा है जिसकी शुरुआत नफरत से हुई. फिर आई 'समझौते की मजबूरी' और अब ये रिश्ता ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहां जूनियर पार्टनर (कांग्रेस) अपनी पहचान और हिस्सेदारी के लिए तड़प रही है.

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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में गठबंधन में रहने के लिए कांग्रेस और डीएमके दोनों की मजबूरी है, लेकिन इसमें घाटा कांग्रेस का ही है.
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में गठबंधन में रहने के लिए कांग्रेस और डीएमके दोनों की मजबूरी है, लेकिन इसमें घाटा कांग्रेस का ही है.

कांग्रेस की प्रोफेशनल विंग के चेयरमैन प्रवीण चक्रवर्ती जब अपने तमिलनाडु काडर की बेचैनी बयां करते हैं तो उससे कांग्रेस के करीब 60 साल पुरानी छटपटाहट नजर आती है. कैसे द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) वह पहला क्षेत्रीय दल बना जिसने न सिर्फ कांग्रेस को तमिलनाडु की सत्‍ता से बाहर किया, बल्कि बाद के गठबंधनों के बावजूद उसे सरकार का हिस्‍सा नहीं बनाया. चार महीने बाद होने वाले तमिलनाडु चुनाव में अब कांग्रेस न सिर्फ ज्‍यादा सीटें मांग रही है, बल्कि सरकार में हिस्‍सेदारी की गारंटी भी. दबाव बनाने के लिए चक्रवर्ती तमिलनाडु सरकार की वित्तीय हालत की बदहाली उजागर करने से नहीं चूक रहे. खासतौर पर उसकी कर्ज की स्थिति को लेकर. कांग्रेस के इस दबाव से क्‍या डीएमके का दिल पिघलेगा? आखिर द्रविड़ पार्टियों की वो कौन सी रणनीति है, जिसके चलते वे राष्‍ट्रीय पार्टियों से गठबंधन तो करते हैं, लेकिन एक लक्ष्‍मण रेखा खींचकर.

कभी डीएमके के लिए कांग्रेस 'दुश्मन नंबर एक' थी

डीएमके का डीएनए कांग्रेस विरोध पर ही टिका था. 1949 में जब सीएन अन्नादुरै ने ईवी रामास्वामी 'पेरियार' से अलग होकर द्रमुक बनाई, तो उनके निशाने पर दिल्ली की सत्ता और 'हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान' का वह विचार था जिसे तब कांग्रेस का प्रतिनिधित्व माना जाता था.

दिलचस्प बात यह है कि डीएमके आज जिन मुद्दों पर भाजपा को घेरती है, जैसे स्‍टेट अटानॉमी, तमिल अस्मिता और 'नार्थ इंडिया के प्रभुत्व' का विरोध. यही तमाम तीर 60 के दशक में कांग्रेस के खिलाफ छोड़े जाते थे. 1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन वह निर्णायक मोड़ था, जिसने तमिलनाडु की धरती से कांग्रेस की जड़ें हिला दीं. 1967 के चुनाव में अन्नादुरै ने 'कामराज' जैसी दिग्गज शख्सियत वाली कांग्रेस को सत्ता से ऐसा बेदखल किया कि आज आधी सदी से ज्‍यादा बीत जाने के बाद भी कांग्रेस वहां वापसी नहीं कर पाई. और सत्ता के दरबान की हैसियत पर सिमट गई.

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इंदिरा का 'चाबुक' और करुणानिधि का लाइन पर आना

राजनीति में कोई हमेशा के लिए 'दुश्मन' नहीं होता. यह बात साफ हो गई जब सत्ता की जरूरत ने इंदिरा गांधी और करुणानिधि को एक साथ ला खड़ा किया. लेकिन यह रिश्ता बराबरी का नहीं था. 1976 में आपातकाल के दौरान जब इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार के आरोपों में करुणानिधि की सरकार को बर्खास्त किया, तो डीएमके को केंद्र की ताकत का एहसास हुआ.

यहीं से द्रविड़ राजनीति की कहानी बदल गई. करुणानिधि और बाद में एमजीआर (AIADMK) ने कांग्रेस जैसी राष्‍ट्रीय पार्टियों से एक अलिखित समझौता कर लिया. 'दिल्ली आपकी, चेन्नई हमारी.' डीएमके और एआईएडीएमके ने बारी-बारी से केंद्र की राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस और बाद में भाजपा) के साथ गठबंधन किया ताकि केंद्र में संरक्षण मिल सके, लेकिन राज्य की सत्ता में किसी भी राष्ट्रीय दल को 'जूनियर पार्टनर' से ज्यादा कुछ नहीं बनने दिया.

तमिलनाडु में कांग्रेस की हैसियत वोट ट्रांसफर मशीन से ज्‍यादा नहीं

पिछले तीन दशकों से तमिलनाडु में कांग्रेस का वजूद एक 'बैसाखी' जैसा रहा है. डीएमके उसे सम्मानजनक सीटें तो देती है, लेकिन सरकार की चाबी हमेशा अपने पास रखती है. जब उत्‍तर भारत का रुख करें तो यहां की क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को सरकार में शामिल करती रही हैं. जैसे, बिहार में कांग्रेस राजद के साथ सरकार में शामिल होती है, झारखंड में सत्ता का हिस्सा है. यहां तक क‍ि बेहद कम सीटें होने के बावजूद महाराष्‍ट्र की महाविकास अघाड़ी सरकार में उसे मंत्रिपद मिले. लेकिन तमिलनाडु में कांग्रेस केवल एक 'वोट-ट्रांसफर' मशीन बनकर रह गई है. डीएमके की रणनीति साफ रही है. कांग्रेस के पास राज्य में 8-10% का जो समर्पित वोट बैंक है, उसे गठबंधन के जरिए अपने पाले में करो. बदले में उसे दिल्ली की कुछ लोकसभा सीटें दे दो, लेकिन राज्‍य में ताज के करीब मत पहुंचने दो.

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दिलचस्‍प ये है क‍ि जब केंद्र में बनी दोनों यूपीए सरकारों में डीएमके ताकतवर मंत्रीपद हासिल किए, जबकि इसके उलट तमिलनाडु की सरकार में कांग्रेस को कुछ नहीं दिया. वजह ये थी कि केंद्र में संख्‍याबल की कमजोरी के कारण यह कांग्रेस की मजबूरी थी कि वह सरकार को मजबूती देने के लिए डीएमके की शर्त मान ले. जबकि डीएमके तमिलनाडु में कभी इतनी कमजोर नहीं हुई. डीएमके ही नहीं, कांग्रेस के साथ ये सुलूक जयललिता के नेतृत्‍व में बनी 1991 वाली तमिलनाडु सरकार में भी हुआ. कांग्रेस तब AIADMK के साथ गठबंधन में थी. उसने 65 में से 60 सीटें जीती भी, लेकिन मंत्रिपद एक न मिला. तमिलनाडु में कांग्रेस किस तरह हाशिये पर है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उसने पिछले 30 वर्षों के दौरान हुए चुनावी जीत के मामले में बमुश्किल दहाई सीटों का आंकड़ा पार किया है. 234 सीटों वाली विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को लड़ने के लिए 50 के आसपास सीटें ही दी जाती हैं.

तमिलनाडु चुनाव 2026: क्या इतिहास बदलेगा?

आज कांग्रेस के भीतर से यह मांग तेज हो रही है कि, सिर्फ समर्थन क्यों, हिस्सेदारी क्यों नहीं? राहुल गांधी की डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन के साथ केमिस्ट्री कितनी भी अच्छी क्यों न हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि तमिलनाडु कांग्रेस के कार्यकर्ता अब 'सत्ता के सूखे' से थक चुके हैं. वे देख रहे हैं कि उत्तर भारत में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ सत्ता साझा करती है, तो फिर तमिलनाडु में 'पांडिचेरी मॉडल' (जहां गठबंधन की सरकार हो) क्यों नहीं लागू हो सकता?

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लेकिन स्टालिन के लिए यह चुनौती आसान नहीं है. द्रमुक जानती है कि अगर उसने कांग्रेस को सरकार में शामिल किया, तो उससे राज्य में राष्ट्रीय पार्टियों के लिए फिर से दरवाजा खुल जाएगा. वही दरवाजा जिसे उनके पूर्वजों ने 1967 में बड़ी मशक्कत से बंद किया था. और इसी नजरिए के साथ AIADMK प्रमुख ई पलानीसामी भी आगे बढ़ रहे हैं. जयललिता के बाद उनकी पार्टी भले ही क‍ितनी कमजोर हुई हो, वे भाजपा के साथ गठबंधन तो कर रहे हैं. लेकिन हर मंच से यह जोर से कह रहे हैं कि यदि हमारा गठबंधन जीता तो भाजपा सत्‍ता में शामिल नहीं होगी. 

दोनों की अपनी अपनी मजबूरी, लेकिन कांग्रेस की ज्‍यादा

अस्मिता और अस्तित्व की जंग में सत्‍तारूढ़ डीएमके और कांग्रेस का रिश्ता एक ऐसे सौदे जैसा है जिसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे को नापसंद करते हुए भी साथ चलने को मजबूर हैं. कांग्रेस को डीएमके चाहिए ताकि वह भाजपा के खिलाफ एक 'सेकुलर फ्रंट' दिखा सके और अपनी लोकसभा सीटें बचा सके. डीएमके को कांग्रेस चाहिए ताकि वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रख सके और अल्पसंख्यक वोटों का बिखराव रोक सके.

लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस 'दोयम दर्जे' की भूमिका से संतुष्ट रहेगी? अगर कांग्रेस ने आने वाले विधानसभा चुनावों में 'सत्ता में हिस्सेदारी' की शर्त पर अड़ियल रुख अपनाया, तो यह द्रविड़ राजनीति का सबसे बड़ा दिलचस्प मोड़ होगा. क्या स्टालिन अपने पिता की उस विरासत को तोड़ेंगे जहां राष्ट्रीय दलों को सत्ता की चौखट के बाहर रखा जाता था? या कांग्रेस एक बार फिर 'मजबूरी के गठबंधन' में खुद को कुर्बान कर देगी?

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द्रविड़ राजनीति की इस कहानी का अगला चैप्‍टर 2026 के चुनावों में लिखा जाएगा, जहां मुकाबला केवल विचारधारा का नहीं, बल्कि 'हिस्सेदारी' और 'अस्तित्व' का भी होगा.

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