scorecardresearch
 

वेनेजुएला की बरबादी क्यों एक सबक है दुनिया के तमाम विकासशील देशों के लिए

वैसे तो वेनेजुएला के साथ जो भी हुआ है वह सीधे तौर पर अमेरिकी दादागीरी है. पर अगर वेनेजुएला अपनी आर्थिक स्थितियों को कंट्रोल रखने में कामयाब हुआ होता तो ये स्थिति देखने की नौबत नहीं आती. जनता का अमेरिका के खिलाफ कोई विरोध प्रदर्शन ना करना यह दिखलाता है कि वहां की जनता अपने शासक से त्रस्त हो चुकी थी.

Advertisement
X
वेनेजुएला को लेकर अमेरिका की अलग रणनीति. (Photo: Reuters/File)
वेनेजुएला को लेकर अमेरिका की अलग रणनीति. (Photo: Reuters/File)

एक समय लैटिन अमेरिका का सबसे समृद्ध देश वेनेजुएला होता था. जहां प्रति व्यक्ति आय और ग्रोथ रेट दुनिया के टॉप देशों की जैसा था.. यहां के तेल के विशाल भंडारों की तुलना मध्य एशिया के देश भी नहीं कर सकते थे. आज भयानक गरीबी, हाइपरइन्फ्लेशन, बड़े पैमाने पर पलायन और मानवीय संकट से जूझ रहा है. फिर एक ऐसा मौका भी आ गया कि 3 जनवरी 2026 को अमेरिका अपने एक छोटे से सैन्य कार्रवाई में यहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तार करके अपने देश उठा ले जाता है. इतना ही नहीं मादुरो को एक अपराधी की तरह बंधे हाथ में अमेरिका ले जाया जाता है.अमेरिका की इस कार्रवाई की निंदा होनी चाहिए. पर वेनेजुएला की ये नौबत ही क्यों आई इ पर चर्चा जरूर होना चाहिए. कहा जाता कि कमजोर होना सबसे बड़ा पाप होता है. आज अमेरिका ने जो हालत इस देश की है उसके लिए इस देश का कमजोर होना ही जिम्मेदार है. इसके लिए इस देश के नेताओं को कभी माफ नहीं करेगी यहां की जनता. क्या वेनेजुएला जैसी कार्रवाई अमेरिका सऊदी या कतर के साथ कर सकता है. शायद नहीं. इस घटना ने दुनिया भर के देशों को सबक मिला है. 

यह घटना न केवल वेनेजुएला के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के विकासशील देशों के लिए एक गहरा सबक है. खासकर संसाधन-समृद्ध विकासशील राष्ट्रों के लिए चेतावनी और मार्गदर्शन दोनों का काम कर सकता है. 

1- पॉपुलिस्ट और अनियंत्रित आर्थिक नीतियां विनाशकारी साबित होती हैं

ह्यूगो शावेज़ ने 1999 में सत्ता संभाली तो तेल की ऊंची कीमतों का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर सामाजिक कार्यक्रम चलाए- मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन सब्सिडी. गरीबी घटी, लेकिन ये नीतियां दीर्घकालिक नहीं थीं. मूल्य नियंत्रण, मुद्रा नियंत्रण, बड़े राष्ट्रीयकरण और सरकारी खर्च में वृद्धि ने उत्पादकता को नष्ट कर दिया.

राज्य तेल कंपनी PDVSA को राजनीतिक नियुक्तियों से भर दिया गया, जिससे रखरखाव और निवेश रुक गया.जब तेल कीमतें गिरीं, तो सरकार ने घाटा भरने के लिए मुद्रा छापना शुरू किया. इससे हाइपरइन्फ्लेशन शुरू हुआ. जो 2018 में इतन बढ़ गया कि लोग भुखमरी के शिकार , बीमारियों के चलते पलायन की ओर बढ़ने लगे. 

Advertisement

अच्छे इरादे वाली पॉपुलिस्ट नीतियां (बड़े सब्सिडी, मूल्य नियंत्रण, बड़े सरकारी खर्च) अगर आर्थिक नियमों के खिलाफ हों, तो विनाश लाती हैं. अर्जेंटीना, तुर्की, जिम्बाब्वे जैसे देश जहां पॉपुलिज्म बढ़ रहा है, उन्हें सावधान रहना चाहिए. बजट घाटा मुद्रा छापकर नहीं भरना चाहिए.यह सबसे खतरनाक नीति है. 

2-प्राकृतिक संसाधनों की अधिकता अभिशाप बन सकती हैं

वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार हैं, लेकिन यही तेल उसका सबसे बड़ा अभिशाप साबित हुआ. 1990 के दशक तक अर्थव्यवस्था तेल पर 70-80% निर्भर थी, लेकिन शावेज़ और मादुरो के शासन में यह 95-98% तक पहुंच गई. जब 2014 में वैश्विक तेल कीमतें $100 से गिरकर $30-40 पर आईं, तो देश की कमर टूट गई. यह एक क्लासिक उदाहरण है, जहां एक संसाधन से होने वाली आय अन्य क्षेत्रों (कृषि, विनिर्माण, सेवा) को नष्ट कर देती है. मुद्रा मजबूत हो जाती है, निर्यात महंगा पड़ता है, और अन्य उद्योग प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते. वेनेजुएला में तेल से होने वाली आय ने सरकार को बड़े पैमाने पर सब्सिडी और खर्च करने की छूट दी, लेकिन विविधीकरण नहीं हुआ. 

दूसरी तरफ सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था भी तेल पर निर्भर है, लेकिन Vision 2030 योजना के तहत विविधीकरण (पर्यटन, तकनीक, मनोरंजन, गैर-तेल क्षेत्र) का तेजी से विकास हो रहा है. नॉन-ऑयल GDP अब कुल का 70-76% है. वेनेजुएला में तेल पर 95% से अधिक निर्भरता बनी रही, और गलत नीतियों (मूल्य नियंत्रण, मुद्रा छापना) ने अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया.

Advertisement

विकासशील देशों को तेल, गैस, खनिज या अन्य संसाधनों पर पूर्ण निर्भरता से बचना चाहिए. नॉर्वे जैसे देशों ने तेल से होने वाली आय को संप्रभु धन कोष (Sovereign Wealth Fund) में जमा किया, जो अब हजारों अरब डॉलर का है और अर्थव्यवस्था को स्थिर रखता है.

सऊदी अरब, नाइजीरिया, रूस, इंडोनेशिया जैसे देशों को तुरंत कृषि, पर्यटन, तकनीक, शिक्षा और विनिर्माण में निवेश बढ़ाना चाहिए. विविधीकरण से वैश्विक कीमतों के झटकों से बचा जा सकता है. वेनेजुएला दिखाता है कि संसाधन अमीरी नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता से अभिशाप बनते हैं. 

3- भ्रष्टाचार पर अंकुश और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान जरूरी 

वेनेजुएला में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया. PDVSA से अरबों डॉलर गायब हुए. नेता, सैन्य अधिकारी और उनके करीबी परिवारों ने लूट मचाई, न्यायपालिका, संसद और चुनाव आयोग पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण हो गया, विपक्ष का दमन, चुनाव धांधली और मीडिया पर सेंसरशिप ने निवेशकों को भागा दिया. 

मजबूत संस्थाएं (स्वतंत्र न्यायपालिका, संसद, चुनाव आयोग, मीडिया) लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. भ्रष्टाचार विरोधी कानून, पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी हैं. ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया जैसे देशों को भ्रष्टाचार पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए, क्योंकि कमजोर संस्थाएं किसी भी संकट को और गहरा कर देती हैं. वेनेजुएला में संस्थाओं का विनाश ही संकट को सालों तक बनाए रखने का मुख्य कारण रहा.

Advertisement

4- अत्यधिक नियंत्रित या सोशलिस्ट अर्थव्यवस्था से सावधानी बरतें

हुगो शावेज (1999-2013) और निकोलस मदुरो के शासन में अपनाई गई समाजवादी नीतियों—व्यापक राष्ट्रीयकरण, केंद्रीकृत योजना, मूल्य नियंत्रण और निजी क्षेत्र का दमन ने उत्पादकता को बुरी तरह प्रभावित किया.

शावेज ने विदेशी कंपनियों की संपत्ति जब्त की, PDVSA में हजारों योग्य कर्मचारियों को राजनीतिक आधार पर निकाला और अयोग्य लोगों को नियुक्त किया, इससे तेल उत्पादन 1998 में 3.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर 2017 तक 2.3 मिलियन रह गया. रखरखाव की कमी और निवेश न होने से उत्पादकता 59-72% तक गिर गई.

बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था, मजबूत संपत्ति अधिकार और निजी निवेश की कमी ने उत्पादकता को नष्ट कर दिया. क्यूबा और निकारागुआ जैसे देशों को इससे सबक लेना चाहिए. क्यूबा ने 1990 के दशक में कुछ बाजार सुधार (पर्यटन, विदेशी निवेश, स्व-रोजगार) अपनाए, लेकिन केंद्रीकृत नियंत्रण बरकरार रखा, जिससे विकास सीमित रहा. निकारागुआ में भी समान नीतियां उत्पादकता गिरा रही हैं. इन देशों को बाजार सुधारों पर ध्यान देना चाहिए: निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन, संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा, मुक्त व्यापार और निवेश वातावरण. वेनेजुएला की विफलता साबित करती है कि बड़े सरकारी हस्तक्षेप और निजी क्षेत्र का दमन लंबे समय में विकास को रोकता है.

5-आर्थिक स्थिति भले ही खराब हो, मजबूत सेना या सुरक्षा कवच आवश्यक है

Advertisement

आर्थिक चुनौतियों के बावजूद मजबूत सैन्य क्षमता और परमाणु हथियार राष्ट्रीय संप्रभुता की अंतिम गारंटी हैं. पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और भारत जैसे देशों ने आर्थिक कमजोरी के बीच भी परमाणु निरोधक (nuclear deterrence) बनाकर अपनी स्वतंत्रता सुरक्षित रखी है. यूक्रेन ने अपने परमाणु हथियारों का परित्याग कर दिया अन्यथा आज उसकी ये दुर्गति नहीं होती.

आज की तारीख में पाकिस्तान और उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था की बदहाली किसी से छुपी हुई नहीं है. लेकिन इनके तमाम कारनामे सिर्फ इसलिए छुप जाते हैं क्‍योंकि इनके पास परमाणु बम है.उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों से जूझ रही है, लेकिन उसके पास अनुमानित 50 परमाणु हथियार हैं (FAS और अन्य 2024-2025 अनुमान), साथ ही ICBM और टैक्टिकल हथियारों के विकास के चलते उन्हें किसी के हमले का डर नहीं है. इधर, पाकिस्‍तान में तो आर्मी चीफ आसिम मुनीर तो  एक भाषण में कह चुके हैं कि यदि भारत ने हम पर हमला किया तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा. क्‍योंकि हमारी हाल ट्रक जैसी है, जबकि भारत एक मर्सिडीज है.

जाहिर है कि पाकिस्‍तान और नॉर्थ कोरिया जैसे देश किसी से भिड़ने से पहले सोचते नहीं हैं कि उनका क्‍या होगा. सोचना उन्‍हें ही पड़ता है जिनके पास संपन्‍नता है. और नेतृत्‍व अपने नागरिकों के हितों के प्रति जवाबदेह है. ऐसे में सही संतुलन उसे ही माना जाएगा कि जहां संपन्‍नता और शक्ति का सही बैलेंस हो. क्‍योंकि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement