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शेख हसीना चली गईं, लेकिन शांति से कोसों दूर है बांग्लादेश

सैन्य दबाव के चलते बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के अचानक इस्तीफे के बाद बांग्लादेश में अराजकता फैल गई है.

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Sheikh Hasina
Sheikh Hasina

बांग्लादेश (Bangladesh) की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना सैन्य दबाव में अचानक सत्ता से बाहर हो गईं, जिसके बाद देश में अराजकता फैल गई है. देश भर में सत्तारूढ़ अवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्रतिशोध की लहर चल रही है. लोग सड़कों पर मारे जा रहे हैं. मारे गए लोगों में ज्यादातर अवामी लीग के लोग और पुलिसकर्मी थे, लेकिन कुछ सीमा रक्षक और कुछ हिंदू समुदाय के नेता भी पीड़ितों में शामिल थे. यह साफ है कि अवामी लीग अपनी जमीन खो चुकी है और अब ढाका में शेख हसीना के बाद आने वाली किसी भी सरकार में उसका नाम शामिल होने की संभावना नहीं है.

यह तब स्पष्ट हो गया कि जब सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने अंतरिम सरकार को अंतिम रूप देने के लिए देश के राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाया तो अवामी लीग से किसी को भी नहीं बुलाया गया. हालांकि, हाल ही में प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के नेता भी इसमें शामिल थे.

शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद जॉय ने साफ कर दिया है कि उनकी मां बांग्लादेश की सियासत में वापस नहीं आएंगी. इसके बाद अवामी लीग पूरी तरह से नेतृत्वविहीन हो गई है, बिना कप्तान के जहाज बन गई है. इसके ज्यादातर नेता अब अपने वजूद को लेकर फिक्रमंद हैं. 

शेख हसीना के बाद क्या होगा?

1991 में लोकतंत्र की बहाली के बाद से दो पूर्ण पांच-वर्षीय कार्यकालों के लिए बांग्लादेश पर शासन करने वाले राजनीतिक दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को बांग्लादेश में सरकार बनाने के लिए काबिल एकमात्र पार्टी के रूप में देखा जाता है. बीएनपी में मूड काफी आशावादी है क्योंकि उनका मानना ​​है कि अगर अपने दम पर नहीं, तो वे जमात-ए-इस्लामी जैसे सहयोगियों के साथ गठबंधन करके निश्चित रूप से शासन कर सकते हैं. शेख हसीना के शासन काल के दौरान जेल में बंद रहने वाली खालिदा जिया (बीएनपी अध्यक्ष) को सेना द्वारा कार्यभार संभालने के तुरंत बाद रिहा कर दिया गया.

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जमात नेताओं को बुलाए जाने के साथ-साथ खालिदा जिया को रिहा करने का फैसला इस बात का साफ इशारा है कि सेना को उम्मीद है कि हसीना के बाद के माहौल में बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी अहम भूमिका निभाएंगे. ऐसी खबरें हैं कि खालिदा के बेटे तारिक रहमान, जो कई गंभीर मामलों में सजा के बाद जेल से बचने के लिए लंदन में रह रहे हैं, आखिरकार बांग्लादेश लौटने की योजना बना रहे हैं.

2001-2006 के दौरान जब उनकी मां प्रधानमंत्री थीं, तब उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी. अगर बांग्लादेश में जल्द ही चुनाव होते हैं और बीएनपी जीत जाती है, तो तारिक टॉप पद के लिए सबसे आगे होंगे क्योंकि उनकी बीमार मां के पद से हटने की संभावना है.

मोहम्मद यूनुस का समर्थन कर रहे छात्र

बांग्लादेश की शक्तिशाली जनरेशन नेक्स्ट, प्रेरणादायक छात्र-युवा मंच स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन (Students Against Discrimination) के विचार शायद दूसरे हों और सेना भी उन्हें दूर नहीं कर सकती. 

कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की सबरीना करीम कहती हैं, "यह बांग्लादेश के लिए एक ऐतिहासिक दिन है, क्योंकि सिविल सर्विस कोटा सिस्टम को बदलने के लिए छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन एक क्रांति में बदल गया, जिसने शेख हसीना के 15 साल के शासन को उखाड़ फेंका. यह जेनरेशन जेड के नेतृत्व वाली पहली सफल क्रांति हो सकती है."

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छात्र नेताओं ने नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस को अंतरिम प्रशासन का प्रभार सौंपने की वकालत की, जिसे सेना भविष्य में हसीना शासन से निर्वाचित शासन के सुचारु संक्रमण के लिए स्थापित करना चाहती है. यूनुस ने 2006-08 के दौरान सेना समर्थित कार्यवाहक शासन के दौरान एक राजनीतिक पार्टी बनाने की कोशिश की थी. उन्हें अमेरिका और कई लोगों का समर्थन प्राप्त था, जो बांग्लादेश की राजनीतिक द्विआधारी व्यवस्था से अलग हटकर अवामी लीग या बीएनपी की सरकार बनाने की कोशिश कर रहे थे.

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कुछ लोग कहेंगे कि यूनुस अगर चाहें तो इस बांग्ला स्प्रिंग मोमेंट का इस्तेमाल खुद को सीधे राजनीति में उतारने के लिए कर सकते हैं. उन्हें छात्र मंच और पेशेवर वर्गों में अवामी विरोधी तत्वों का मजबूत समर्थन मिल सकता है और भारत और अमेरिका दोनों ही उन्हें बीएनपी-जमात से ज्यादा स्वीकार्य पा सकते हैं. 

एक और उम्मीद

क्या ऐसी संभावना है कि प्रदर्शनकारी छात्र एक नए बांग्लादेश के एजेंडे के साथ अपने खुद के राजनीतिक संगठन के साथ उभरें? जबकि बांग्लादेश या पश्चिम बंगाल में अब तक ऐसा कोई प्रयोग नहीं हुआ है. साल 1985 में इस तरह की घटना असम में हुई थी, विदेशी विरोधी आंदोलन के नेता अपने छात्रावासों से सीधे दिसपुर सचिवालय में चले गए और दो कार्यकालों तक राज्य पर शासन किया. हालांकि, नाहिद इस्लाम जैसे कुछ छात्र नेताओं को उनकी मौजूदा लोकप्रियता की वजह से अवामी लीग विरोधी दलों द्वारा भी शामिल किया जा सकता है.

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ये पार्टियां अवामी लीग के कुछ असंतुष्ट लोगों से भी संपर्क कर सकती हैं, जिनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और जन अपील थी, लेकिन शेख हसीना की सत्तारूढ़ मंडली ने उन्हें दरकिनार कर दिया. हालांकि, यह तत्काल के बजाय दूर के भविष्य के लिए विचार किए जाने की ज्यादा संभावना है. 

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सुबीर भौमिक (वरिष्ठ पत्रकार)

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