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दिल्ली में 'ऑड-ईवन' लागू करने से पहले केजरीवाल सरकार को इन 6 सवालों का जवाब देना चाहिए

दिल्ली सरकार को अगर लगता है कि ऑड ईवन लागू करके दिल्ली के लोगों को जहरीले धुएं से बचा सकते हैं तो उसे यह योजना जरूर लागू करनी चाहिए पर इन छह सवालों का जवाब भी जरूर देना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे.

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दिल्ली में हर सर्दियों में एयर पलूशन की यही है कहानी
दिल्ली में हर सर्दियों में एयर पलूशन की यही है कहानी

दिल्ली सरकार ने एक बाऱ फिर गैस चैंबर बन चुकी दिल्ली से मुकाबले के लिए ऑड ईवन लागू करने का फैसला किया है. यानि एक दिन शहर में ऑड नंबर वाली कारें चलेंगी तो दूसरे दिन ईवन नंबर वाली कारें ही सड़कों पर दौड़ सकेंगी. यह कुछ उसी तरह का इलाज है कि कैंसर के पेशेंट को भयंकर दर्द में कोई साधारण सी दर्द निवारक दवा दे दी जाए. जिससे दर्द तो कम नहीं होगा पर पेशंट को यह अहसास जरूर होगा कि मेरा ध्यान रखा जा रहा है और दवा लिए हैं तो कुछ असर तो करेगा ही. तात्कालिक रूप से पेशंट खुश और तीमारदार भी खुश हो जाता है पर बाद में यह दोनों के लिए घातक होता है. शायद यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट  ने भी मंगलवार को दिल्ली सरकार को आड़े हाथों लेते हुए जमकर लताड़ लगाई है. इसके बाद दिल्ली सरकार ने कहा है कि कोर्ट के आदेश का अध्ययन किया जा रहा है उसके बाद फैसला लिया जाएगा कि ऑड-ईवन किस तरह लागू किया जाए. 
 
वायु प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से दिल्ली में इसके पहले तीन बार ऑड-ईवन लागू किया जा चुका है. पर कार राशनिंग की इस योजना से कितना फायदा हुआ इसके अलग-अलग दावे हैं. पर अधिकतर का मानना है कि यह ऊंट के मुंह में जीरा है. इसके साथ पब्लिक को परेशान करने वाला अव्यवहारिक उपाय है . शायद न्यायाधीशों की नाराजगी का कारण भी यही पहलू है. देश में पहली बार ऑड ईवन का प्रयोग दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने ही 1-15 जनवरी 2016 में किया था. दूसरा राउंड उसी वर्ष 15-30 अप्रैल तक था. तीसरी बार साल 2019 में 4 नवंबर से 15 नवंबर तक ऑड-ईवन फिर से लागू किया गया .अब चौथी बार 13 सितंबर से 20 सितंबर तका लागू करने का प्लान है. दिल्ली सरकार को अगर लगता है कि ऑड ईवन लागू करके दिल्ली के लोगों को जहरीले धुएं से बचा सकते हैं तो उसे यह योजना जरूर लागू करनी चाहिए पर इन छह सवालों का जवाब भी जरूर देना चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे.

पहला सवाल-अब तक के जितने भी ऑड-ईवन रहे उन पर हुए रिसर्च कहते हैं कि कोई खास सफलता नहीं मिली फिर लागू करने का क्या मतलब है?

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में लागू किए ऑड-ईवन नियम के प्रभाव पर दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) में एक अध्ययन किया गया और रिसर्च के अनुसार वायु गुणवत्ता में उतना सुधार नहीं हुआ, जितनी की उम्मीद की जा रही थी. 2019 में जब फिर ऑड ईवन लागू किया गया तो भी कुछ खास फायदा नहीं हुआ.काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरमेंट एंड वॉटर की स्टडी के मुताबिक 2019 में ऑड-ईवन से कोई खास फायदा नहीं हुआ. 

दूसरा सवाल-अगर ऑड-ईवन से प्रदूषण कम होता है तो वह इसे नवंबर से जनवरी तक सर्दियों के तीनों महीनों के लिए लागू क्यों नहीं करते?

मान लिया कि ऑड-ईवन से व्यापक तौर पर हवा साफ हो जाती है. अगर ये सही है तो फिर हवा के जहरीले होने का इंतजार क्यों करती है सरकार. अगर कुछ कारों को चलने से रोक देने से दिल्ली की आबोहवा सही हो जाती है तो फिर देर किस बात की. कम से तीन महीने के लिए दिल्ली की आधी कारें रोकी जा सकती हैं. पर दिल्ली सरकार जानती है कि दिल्ली में कार से हर रोज चलने वालों में आधे से अधिक लोगों के पास एक से अधिक कारें हैं. सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जिसके पास ऑड नंबर वाली कार है वह दूसरी कार खरीदे तो उसका भी नंबर ऑड ही हो . नहीं तो दिल्ली में पैसे वाले लोगों की कमी नहीं है कि मालूम हुआ कि हर शख्स एक ऑड नंबर वाली कार खरीद लेगा. दूसरा ईवन नंबर वाली रख लेगा. पिछली बार का ऑड ईवन के दौरान सेकंड हैंड कारों की बिक्री बढ़ गई थी. 

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तीसरा सवाल -दुपहिया वाहनों पर क्यों नहीं लागू होता नियम? क्या राजनीतिक इरादे के चलते नहीं लगाई जाती रोक?

2017 में जब ऑड ईवन के नियम को लागू किया गया तो राजधानी की हवा में कोई सुधार देखने को नहीं मिला, जिसकी सरकार उम्मीद कर रही थी.दिल्ली में सबसे अधिक दोपहिया वाहनों की संख्या है. परिवहन विभाग के अनुसार दिल्ली में करीब 80 लाख दोपहिया वाहन हैं,  35 लाख के करीब कारों की संख्या है. आईआईटी कानपुर ने 2017 में ऑड-ईवन नियम पर अध्ययन किया और चौंकाने वाला खुलासा किया.बताया गया कि दिल्ली में वाहन प्रदूषण में दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी लगभग 56 प्रतिशत के करीब है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपने वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए फैसले लेती है. दूसरे शब्दों में वोटों के ध्रुवीकरण करने के चक्कर में ऐसे फैसले लेती हैं. 

चौधा सवाल- अगर ऑड-ईवन से प्रदूषण 10-13 प्रतिशत कम हो जाता है , जैसा कि आम आदमी पार्टी का दावा रहा है, तो उन्होंने 2018 में जब चुनाव होने थे उस साल ऑड ईवन क्यों नहीं लागू किया ?

आम आदमी पार्टी सरकार का दावा रहा है कि ऑड ईवन से करीब 10 से 13 प्रतिशत पलूशन कम हो जाता है. अगर ऐसा ही है तो चुनावी साल 2018 में इस तरह का एक्शन सरकार ने क्यों नहीं लिया? क्या चुनावी मजबूरी थी ? क्या जनता के नाराज होने का डर था ?क्योंकि फिर दूसरे साल 2019 में फिर सरकार ने ऑड ईवन को लागू किया. उसके बाद तो खैर कोविड के चलते बहुत कुछ बदल गया.

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पांचवा सवाल- क्या प्रदूषण दिल्ली सरकार से पूछकर आता है, इसलिए पहले से ही दिन निर्धारित कर दिए जाते हैं कि इस दिन से इस दिन तक ऑड-ईवन लागू किया जाएगा

सरकार कहती है कि ऑड-ईवन केवल चरम प्रदूषण वाले दिनों के लिए है. तो यह कैसे निर्धारित हो जाता है कि  13 से 20 नवंबर तक चरम प्रदूषण वाले दिन रहने वाले हैं? कई बार ऐसा होता है कि आज प्रदूषण बिल्कुल भी नहीं है तो सुबह-सुबह एक्यूआई 500 के ऊपर हो जाता है. हाई एक्यूआई दिन मौसम के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं और   रातोंरात भारी बदलाव हो सकता है. ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान के अनुसार, जब प्रदूषण का स्तर 48 घंटे या उससे अधिक समय तक "गंभीर प्लस" श्रेणी में रहता है, तो निजी वाहनों के लिए ऑड-ईवन स्वचालित रूप से लागू हो जाना चाहिए. 

छठां सवाल- क्या पंजाब की पराली का अब कोई दोष नहीं है?

यह बड़ा सवाल है कि दिल्ली की हवा को खराब करने में क्या पंजाब में जलने वाली पराली का दोष अब खत्म हो गया. क्योंकि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने तक दिल्ली की हवा में जहर घोलने का सबसे बड़ा कारण पंजाब के खेतों में जलने वाली पराली थी. पर अब ऐसा नहीं है . आम आदमी पार्टी के नेताओं का कहना है कि पंजाब में पराली जलने में कमी आई है. पर पिछले दिनों गूगल पिक्स में साफ दिखा रहा था कि पंजाब में बड़े पैमाने पर पराली जलाई जा रही है. पर आप नेता गोपाल राय कहते हैं यूपी और हरियाणा के चलते दिल्ली में प्रदूषण फैल रहा है.  

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सुप्रीम कोर्ट ने ने पंजाब सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि ये राजनीतिक लडाई का मैदान नहीं है. यहां राजनैतिक ब्लेम गेम को रोकें, ये लोगों की हेल्थ की हत्या के समान है. आप इस मामले को दूसरों पर नहीं थोप सकते. आप पराली जलाने को क्यों नहीं रोक पाते? पंजाब सरकार के वकील ने कहा था कि पंजाब में 40 फीसदी पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है. जबकि सीआरबी इन्फॉर्मेशन एंड मैनेजमेंज सिस्टम की एक रिपोर्ट बताती है कि नवंबर के पहले हफ्ते में पंजाब में करीब 35 परसेंट की बढोतरी पराली जलाने के मामले में हुई है.

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