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नीतीश के राज्यसभा जाने के मायने, ये 5 सवाल आपके मन भी उठ रहे होंगे

नीतीश कुमार इस तरह खामोशी से बिहार का सीएम पद छोड़कर राज्यसभा में जाना किसी को पच नहीं रहा है. आम तौर पर ये नौबत तब आती है जब पार्टी में किसी नेता के खिलाफ असंतोष हो और नेता को लगे कि वो विधानसभा में अपना बहुमत नहीं साबित कर पाएगा. पर यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं है.

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नीतीश कुमार के राज्यसभा नामांकन के पहले गृहमंत्री अमित शाह ने उनसे मुलाकात की.
नीतीश कुमार के राज्यसभा नामांकन के पहले गृहमंत्री अमित शाह ने उनसे मुलाकात की.

नीतीश कुमार ने राज्यसभा में जाने के लिए नामांकन भर दिया है. उनके साथ जद(यू) के रामनाथ ठाकुर, भाजपा के नितिन नवीन व शिवेश कुमार तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा ने भी नामांकन किया है. अभी तक जो खबर आ रही है उसके अनुसार स्वयं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मौके गवाह बनने पटना पहुंचे हुए हैं. नामांकन के बाद एनडीए नेताओं के साथ बैठक कर वो नई सरकार के गठन पर चर्चा भी कर सकते हैं. यह खबर सिर्फ एक नेता के संसद पहुंचने की नहीं, बल्कि बिहार की 20 साल पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के अंत और नए सत्ता समीकरण की शुरुआत की है. नीतीश कुमार 75 वर्ष के हो चुके हैं. नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने भारी जीत हासिल की. भाजपा अकेले 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जद(यू) ने 85 सीटें जीतीं.  चुनाव परिणामों को नीतीश कुमार की बेहद लोकप्रियता का परिणाम माना गया.  चुनाव के बाद नीतीश कुमार दसवीं बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन मात्र चार महीने बाद यह फैसला सुनकर हर कोई अचंभित है. जेडीयू के लोग इसे नीतीश की अपनी मर्जी बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे राज्य की राजनीति से सम्मानित विदाई के रूप में देखा जा रहा है. पर विपक्ष का सीधा आरोप है कि बीजेपी ने अपने एक और सहयोगी दल को निगल लिया. जाहिर है कि सबकी निगाहें अब इस पर लगी हैं कि नीतीश कुमार को राष्ट्रीय भूमिका में क्या मिलता है.अमित शाह की मौजूदगी और नई सरकार गठन की चर्चा स्पष्ट संकेत है कि अब बिहार में भाजपा अपना मुख्यमंत्री देखना चाहती है. 

1- क्या नीतीश अपने बेटे के लिए ऐसा कर रहे हैं

नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना उनके राजनीतिक करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ है, लेकिन इसमें उनके बेटे निशांत कुमार की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है. सूत्रों के अनुसार, नीतीश 75 वर्ष की उम्र और स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राज्य राजनीति से दूर हो रहे हैं, ताकि भाजपा को मुख्यमंत्री पद देने का रास्ता साफ हो सके. इस बीच, निशांत को उप-मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, जो उनकी राजनीतिक शुरुआत का संकेत है. पहले खबरें थीं कि निशांत को राज्यसभा भेजा जाएगा, लेकिन अब नीतीश खुद जा रहे हैं, शायद बेटे को राज्य स्तर पर स्थापित करने के लिए. पर यह कहना सिर्फ कयासबाजी ही हैं. नीतीश हमेशा परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं. अगर उन्हें अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करना होता तो पहले ही कर चुके होते. पार्टी कार्यकर्ताओं के दबाव में और जद(यू) के भविष्य को देखते हुए निशांत की राजनीति में एंट्री को वो सहमति दे सकते हैं. पर ये कहना अतिशयोक्ति ही होगा कि अपनी कुर्सी त्याग कर वो अपने बेटे को राजनीति में स्थापित कर रहे हैं. क्योंकि जहां तक अपने बेटे को मंत्रिमंडल में शामिल करने की बात है, वो यह काम बिना कुर्सी छोड़े भी कर सकते थे. 

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2- नीतीश कुमार के वोट बैंक का क्या होगा

नीतीश कुमार का वोट बैंक मुख्य रूप से कुर्मी-कोइरी (लव-कुश), अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी), महादलित और महिलाओं को मिलाकर बनता है. राज्यसभा जाने से उनका व्यक्तिगत प्रभाव कम हो सकता है, लेकिन अगर बेटा निशांत उप-मुख्यमंत्री बनता है, तो यह वोट बैंक जद(यू) के पास बना रह सकता है. नीतीश ने ईबीसी को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए, जैसे कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर को राज्यसभा में रखना. भाजपा अब इस वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की कोशिश करेगी, खासकर सवर्ण जातियों और दलितों को जोड़कर. 2025 के चुनाव में एनडीए की जीत, नीतीश की छवि पर टिकी थी, लेकिन अब भाजपा की निगाह नीतीश कुमार की कुर्सी की तरह उनके वोट बैंक पर भी होगी. आरजेडी और कांग्रेस भी नीतीश कुमार के इस वोट बैंक के लिए दावेदार बनकर उभरेंगे. पर बीजेपी जिस तरीके से नीतीश को विश्वास में लेकर उनकी विदाई कर रही है उससे साफ लगता है कि जेडीयू के वोट बैंक को बीजेपी अपना वोटबैंक बनाने में सफल हो जाएगी. 

3- नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू का क्या होगा

जद(यू) का भविष्य नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से अनिश्चित हो गया है. नीतीश पार्टी की धुरी हैं, उनके बिना नेतृत्व संकट गहरा सकता है. नीतीश कुमार ने अपने अलावा पार्टी में किसी को उभरने नहीं दिया. जाहिर है कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी में और कोई ऐसा है भी नहीं जिससे पार्टी के बंटने का भी खतरा हो. नीतीश की करिश्माई छवि पर पार्टी चुनावी राजनीति में सफलता हासिल करती रही है. अब जेडीयू के लोगों के सामने ऑप्शन यही होगा कि वे या तो बीजेपी की छत्रछाया में रहें या बीजेपी जॉइन कर लें. अगर निशांत उप-मुख्यमंत्री बनते हैं, तो पार्टी कुछ दिन उनके नाम पर एकजुट रह सकती है. संजय झा जैसे नेता अंतरिम कमान संभाल सकते हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म की लीडरशिप के लायक पार्टी में कोई भी नहीं  दिख रहा है. इस तरह भविष्य में पार्टी का विलय बीजेपी में हो जाए तो कोई अचंभित करने वाली बात नहीं होगी. वैसे भी बीजेपी लगातार ईबीसी-कुर्मी वोट बैंक के बीच मजबूती से अपनी पहुंच बना रही है. 

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4- नीतीश कुमार को सीएम पद छोड़ने के एवज में हासिल क्या होगा?

नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना बिहार राजनीति में बड़ा बदलाव है. पर एक सवाल हर किसी के मन में उठ रहा होगा कि नीतीश कुमार के इस फैसले से उन्हें हासिल क्या होगा. आम तौर पर नेता अपनी कुर्सी तब तक नहीं छोड़ते जब तक उनकी सांस चलती रहती है. ऐसे तमाम उदाहरण हैं कि नेता मृत्युशैया पर होने के बाद भी रिजाइइन देने से बचते रहे हैं. जेल में महीनों बिताने के बाद भी एक नेता ने सीएम का पद नहीं छोड़ा. विधानसभा में बहुमत न होने के बाद भी मुख्यमंत्रियों को ये भरोसा रहा है कि वे अंतिम समय में कोई न कोई विकल्प निकाल ही लेंगे. पर नीतीश कुमार के साथ ऐसी कोई बात नहीं है. वो आराम से कुछ साल और निकाल सकते थे. जाहिर है कि सवाल तो उठेगा ही कि नीतीश कुमार ऐसा क्यों करने जा रहे हैं. तो क्या ये समझा जाए कि उन्हें कोई संवैधानिक पद मिल रहा है? पर जिस तरह की राजनीति इस समय देश में चल रही है उससे ये साफ दिख रहा है कि उन्हें भविष्य में कम से कम राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का पद तो नहीं ही मिलने वाला है. हां, केंद्रीय मंत्री का पद उन्हें जरूर मिल सकता है. पर फिर वही सवाल उठता है कि किसी स्टेट का राज्यपाल बन जाना या केंद्रीय मंत्री बनने के आश्वासन पर कोई मुख्यमंत्री का पद खुशी-खुशी छोड़ता है क्या?

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5- क्या नीतीश कुमार ने ये फैसला दबाव में लिया होगा

नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना और मुख्यमंत्री पद छोड़ना क्या दबाव में लिया गया फैसला है? हालांकि जद(यू) इसे नीतीश कुमार की ही 'मर्जी' बता रही है. पर किसी को यकीन नहीं हो रहा है. बीजेपी के बारे में कहा जाता रहा है कि वह अपने सहयोगी पार्टियों को निगल जाती रही है. क्या नीतीश कुमार का सीएम की कुर्सी छोड़कर केंद्र की राजनीति में जाना भी बीजेपी की राजनीति की उसी थियरी को प्रूव कर रही है. बिहार की राजनीति में भाजपा एनडीए में जेडीयू को अपना बड़ा भाई बनाकर राजनीति करती रही है. 2025 के चुनावों में भी जेडीयू और बीजेपी ने बराबर सीटों पर ही चुनाव लड़ा. पर चार सीटें अधिक जीतकर बीजेपी एक बार फिर जेडीयू के मुकाबले राज्य की राजनीति में अपने महत्व को जता दिया था.  2020 और 2025 दोनों ही विधानसभा चुनावों में जदयू की कम सीटें होने के बावजूद बीजेपी के पास इतना कॉन्फिडेंस नहीं था कि वो अपना सीएम राज्य में बना सके. जाहिर है कि इस बात का मलाल तो बीजेपी नेताओं को रहा ही होगा. 

भाजपा लंबे समय से बिहार में ड्राइविंग सीट चाहती थी पर मौका नहीं मिल रहा था. अब नीतीश की बीमारी का बहाना बनाकर बीजेपी अपनी इस महत्वकांक्षा को अंजाम दे सकती है. अमित शाह की पटना यात्रा और नई सरकार के गठन की बैठक स्पष्ट संकेत है कि भाजपा का दबाव काम कर गया है. 

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