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'को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ...', आस्था, अध्यात्म और अखाड़ा संस्कृति का अद्भुद संगम है महाकुंभ

प्रयागराज का यह त्रिवेणी संगम हिंदुओं के लिए पवित्रतम स्थल है तथा धर्म परंपरा के आधार पर आस्था का केंद्र है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए आचार्य शंकर ने सित (गंगा) और असित (यमुना) के संगम की प्रशंसा की और वेद सम्मत चिंतन को प्रचारित किया.

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संस्कृतियों का संगम है महाकुंभ
संस्कृतियों का संगम है महाकुंभ

कुंभ सृष्टि के सभी प्रबुद्ध संस्कृतियों का अनुपम संगम है. कुंभ व्यक्तिगत और सामूहिक आध्यात्मिक चेतना, मानवता, ऋषि संस्कृति एवं प्रकृति- जैसे वनों, नदियों और हिमालय का अद्वितीय प्रवाह है. कुंभ जीवन की गतिशीलता और मानव जीवन का परम संयोजन है. यह ऊर्जा का दिव्य स्रोत और आत्मप्रकाश का सनातनी मार्ग है.

आदि शंकराचार्य ने कुंभ मेले को दिया संगठित स्वरूप
आठवीं शताब्दी के महान संत और दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने कुंभ मेले को एक संगठित स्वरूप दिया. उन्होंने धर्म, संस्कृति और एकता को बढ़ावा देने के समग्र उद्देश्य से कुंभ मेले की शुरुआत की थी.

उन्होंने हर बारह वर्ष के पश्चात महाकुंभ तथा छह वर्षों के अंतराल पर आयोजित होने वाले अर्धकुंभ मेले के अवसर पर विभिन्न मतों, पंथों, मठों के संतों, महंतों और दशनामी संन्यासियों के मध्य विचार-विमर्श, शास्त्रार्थ, संवाद और सहमति की व्यवस्था दी. उस मंथन और संवाद से निकले अमृत रूपी ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने की दृष्टि, दिशा और संस्कृति का विकास किया.

कुंभ मेले में उभरती है लघु भारत की तस्वीर
यह उन जैसे अवतारी, अलौकिक एवं असाधारण साधकों के प्रयासों का ही सुखद परिणाम है कि हर कुंभ मेले पर लघु भारत का विराट स्वरूप उमड़ पड़ता है. अनगिनत श्रद्धालुओं का वहां एकत्र होना, पवित्र संगम में डुबकी लगाना, व्रत, उपवास, मर्यादा एवं अनुशासन का नियमित रूप से कल्पवास करना, तंबू-डेरा डालकर हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में कई-कई दिनों तक रहना, समस्त विश्व को मोहित और विस्मित कर देता है.

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वहां भाषा, जाति, प्रांत एवं पंथ-संप्रदाय आदि की सभी बाहरी एवं राजनीतिक प्रेरित कृत्रिम दीवारें अपने-आप ढह जाती हैं, और पारस्परिक एकता, सद्भाव, सहयोग एवं प्रेम का सजीव दृश्य उभरता है. वर्तमान पीढ़ी के लिए आद्य शंकराचार्य के विचार और दर्शन अत्यंत उपयोगी हैं. उन्हें जीने और आत्मसात करने की आज अधिक आवश्यकता है.

एक ऐसे दौर में, जब विभाजनकारी शक्तियां सक्रिय हों, निश्चय ही आद्य शंकर का जीवन और संदेश कुंभ के रूप में राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की भावना के संचार में सर्वथा सहायक है.

हिंदुओं के लिए पवित्र स्थल है त्रिवेणी संगम
प्रयागराज का यह त्रिवेणी संगम हिंदुओं के लिए पवित्रतम स्थल है तथा धर्म परंपरा के आधार पर आस्था का केंद्र है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए आचार्य शंकर ने सित (गंगा) और असित (यमुना) के संगम की प्रशंसा की और वेद सम्मत चिंतन को प्रचारित किया.

ऋग्वेद में विविध अर्थों के रूप में कुंभ शब्द का अनेक बार प्रयोग हुआ है, किंतु अथर्ववेद स्पष्ट रूप से कहता है कि दुग्ध, दधि एवं जल से पूर्ण चार कुंभों की रचना ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) ने की और लोगों के अभ्युदय एवं श्रेयस के लिए इन्हें चार दिशाओं में स्थापित किया.

चार स्थानों पर आयोजित होता है कुंभ
अथर्ववेद का यह विषय पुराणों में वर्णित देव और असुरों द्वारा समुद्र-मंथन से उत्पन्न अमृत कुंभ से साक्षात रूप में जुड़ा हुआ है. पुराणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इंद्र के पुत्र जयंत ने अमृत कुंभ को ले जाते समय चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिराई थीं। वे चार स्थान हैं: प्रयागराज (जहां हिंदू गणना के अनुसार माघ मास यानी जनवरी-फरवरी में, जब बृहस्पति मेष राशि में होता है और सूर्य एवं चंद्रमा मकर राशि में होते हैं), उज्जैन, हरिद्वार तथा नासिक.

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इन्हीं चार स्थानों पर तीन-तीन वर्षों के अंतराल पर कुंभ का आयोजन होता है. इनमें भी प्रयागराज में आयोजित होने वाला कुंभ सर्वाधिक पवित्र माना गया है, क्योंकि यह गंगा, यमुना और सरस्वती का त्रिवेणी संगम है.

कामा मैकलीन के अनुसार, "विभिन्न भागों के पवित्र लोगों को संगम पर मिलवाने और एकत्रित करने के उद्देश्य से अखाड़ों का कुंभ मेला प्रयाग में आदि शंकराचार्य द्वारा आठवीं शताब्दी में प्रारंभ किया गया."

क्या है अखाड़ा?
आदि शंकराचार्य और उनके शिष्यों ने संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर शाही स्नान की परंपरा शुरू की, जिसे कुंभ कहा जाता है. कुंभ में साधु-संतों के अखाड़ों की विशेष शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं. दरअसल, 'अखाड़ा' शब्द 'अखंड' से बना है, यानी अविभाज्य। कहा जाता है कि अखाड़ों की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य के समय हुई थी. उन्होंने सनातन धर्म की रक्षा के लिए सभी साधुओं के छोटे-छोटे समूहों को संगठित करने का प्रयास किया. उनके प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि अलग-अलग परंपराओं और विश्वासों को मानने वाले सभी संत एकजुट हुए और अखाड़ों की स्थापना हुई.

मान्यता के अनुसार, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में 13 अखाड़ों की स्थापना की थी. धर्म की रक्षा के लिए नागा साधुओं की एक सेना तैयार की गई, जिसे अखाड़ा कहा गया. इसमें नागा साधुओं को शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दी जाती है.

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कुल 13 अखाड़ों में 7 अखाड़े संन्यासी परंपरा के हैं, 3 वैष्णव परंपरा के, 2 उदासीन परंपरा के और 1 निर्मल अखाड़ा है. इनमें निरंजनी और जूना अखाड़े सबसे बड़े हैं.

1954 में कुंभ मेले के सुचारू संचालन के उद्देश्य से अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (ABAP) की स्थापना की गई. यह परिषद अखाड़ों के बीच समन्वय स्थापित करने और उनके विवादों को सुलझाने का कार्य करती है.

पुराणों के अनुसार, जब समुद्र मंथन से अमृत निकला, तो उसे पाने के लिए देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ. चार स्थानों (हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक) पर अमृत की बूंदें गिरीं. इन स्थानों को कुंभ के आयोजन के लिए विशेष महत्व दिया गया है.

कुंभ पर्व के आयोजन का ज्योतिषीय आधार है. जब बृहस्पति कुम्भ राशि में प्रवेश करता है और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब हरिद्वार में कुंभ का आयोजन होता है.

हर 12 साल बाद एक ही स्थान पर कुंभ का आयोजन होता है, जबकि प्रत्येक 144 वर्षों में प्रयागराज में महाकुंभ आयोजित किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि 144 वर्षों में एक बार स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है. इसी कारण उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का आयोजन किया जाता है.

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।
अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।

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कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।
करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।।
मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।।

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