किसान आंदोलन, महिला पहलवानों का प्रोटेस्ट, जाटों का परंपरागत साथ... आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ हरियाणा में कांग्रेस के पास ताकत की कमी नहीं थी. आम आदमी पार्टी से गठबंधन भी हो ही गया था. ऐसे में JJP के साथ गठबंधन टूटना क्या बीजेपी की मुश्किलों में इजाफा कर रहा है. जी नहीं, बीजेपी ने हरियाणा पर अपने कब्जे को मजबूत करने के लिए बस एक री-सेट का बटन दबाया है. उसने एक ऐसा राजनीतिक दांव चला है, जिसमें बीजेपी और JJP दोनों का फायदा है. और इस खेल में यदि दुष्यंत चौटाला भी भागीदार हों, तो आश्चर्य मत करियेगा. राजनीति में नूरा कुश्ती का अपना स्थान रहा है. हरियाणा में हुई सियासी उठापटक को सिर्फ मनोहरलाल खट्टर की जगह नायब सैनी के सीएम बनने की खबर तक सीमित रहकर देखना भूल होगी.
क्यों हजम नहीं हो रहा गठबंधन का टूटना-
-सरकार गिरने का खतरा नहीं, तो किसे फायदा?
-गठबंधन टूटा, लेकिन दोनों ओर से कोई नाराजगी भरे बयान नहीं?
-JJP के लिए लोकसभा सीटों की जिद इतनी बड़ी नहीं हो सकती कि वो राज्य की सत्ता पर से अपनी पकड़ गंवा दे.
-लोकसभा चुनाव में JJP के पास भाजपा से बड़ा एडवांटेज नहीं है.
-और सबसे अहम, भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे चौटाला परिवार का फायदा बीजेपी से दूर जाने में नहीं है.
कल तक हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला प्रधानमंत्री मोदी के साथ मंच साझा कर रहे थे. शाम को वे जेपी नड्डा के साथ हरियाणा की दो लोकसभा सीटों हिसार और भिवानी पर अपनी हिस्सेदारी की बात कर रहे थे. फिर अचानक सुबह खबर आती है कि JJP-BJP का गठबंधन टूट गया है और सीएम मनोहर लाल खट्टर ने इस्तीफा दे दिया है. और शाम तक उनकी जगह नायब सैनी को सीएम बना दिया जाता है.
इस आपाधापी के बीच सबसे दिलचस्प बात है बीजेपी और जेजेपी की ओर से बरती जाने वाली चुप्पी. आमतौर पर सत्ता से जुड़ा गठबंधन टूटने पर काफी शोरशराबा होता है. जैसा कि हमने हाल ही में बिहार में देखा. RJD और JDU ने एक-दूसरे को क्या क्या न कहा. ऐसे में कई कारण हैं, जो गले नहीं उतरती BJP और JJP के बीच की खटास.
1. भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा चौटाला परिवार कैसे लेगा बीजेपी से दुश्मनी?
दुष्यंत चौटाला के पिता अजय चौटाला और दादा ओमप्रकाश चौटाला को दिल्ली हाईकोर्ट ने 2013 में शिक्षक भर्ती घोटाले में दस साल की सजा सुनाई थी. दो साल पहले आय से अधिक संपत्ति के मामले में उनके दादा ओमप्रकाश चौटाला को चार साल की और सजा सुना दी गई. और वे 87 साल की उम्र में तिहाड़ जाने वाले सबसे बुजुर्ग कैदी बन गए. इतने आरोप और इतनी सजा भोग रहा चौटाला परिवार क्या भाजपा से दुश्मनी लेकर अपनी राजनीति कर सकता है. हरियाणा के जाट बेल्ट में जेजेपी ने दस सीटें जरूर जीतीं, लेकिन वे जल्द ही भाजपा के खेमे में चले गए. भाजपा की गैर-जाट राजनीति के बावजूद. किसान आंदोलन के दौरान भी वो भाजपा के साथ जमे रहे, फिर अब अलग होने की क्या जरूरत आन पड़ी?
2. किसान आंदोलन और महिला पहलवानों के प्रोटेस्ट के कारण JJP असहज हो रही थी बीजेपी के साथ रहने में
बीजेपी का सहयोगी संगठन होने के कारण JJP को किसान आंदोलन के दौरान काफी भला-बुरा सुनने को मिला था. आंदोलन में सक्रिय जाट पंचायतों ने दुष्यंत चौटाला को तरह तरह के उलाहने भी दिये. लेकिन, चौटाला जहां के तहां बने रहे. महिला पहलवानों के आंदोलन को कांग्रेस ने खुलकर समर्थन दिया, लेकिन चौटाला तब भी गठबंधन धर्म से बंधे रहे. अब जबकि चुनाव नजदीक आ रहा है, तो उन्हें डर था कि बीजेपी के साथ बने रहने में उन्हें जाटों के गुस्से का शिकार होना पड़ सकता है. जो उनका कोर वोट बैंक है.
3. लोकसभा चुनाव JJP अकेले लड़ेगी तो कांग्रेस को नुकसान, भाजपा को फायदा होगा
पिछले दस साल में हरियाणा की राजनीति जाट बनाम गैर-जाट में बंट गई है. जहां हुड्डा परिवार के नेतृत्व वाली हरियाणा कांग्रेस ने जाट वोट साध रखे हैं, तो उनके विरोधी समुदाय का ध्रुवीकरण भाजपा की ओर होता है. जिसमें गैर-जाट ओबीसी, यादव और पंजाबी समुदाय प्रमुख रूप से शामिल हैं. इसी एंटी-जाट ध्रुवीकरण के चलते दस साल से भाजपा हरियाणा की सत्ता पर काबिज है. अब जबकि JJP भाजपा से अलग हो गई है तो वह अपने जाट मतदाताओं के बीच कान्फिडेंस के साथ जा सकती है. भाजपा की बी-टीम बनकर नहीं. ऐसा करके JJP अपने जनाधार पर पकड़ कायम रख सकती है. वहीं जाट वोटों को एकतरफा कांग्रेस की तरफ जाने से रोक सकती है. भाजपा का इससे इतना तो फायदा है कि जाट वाटों में जितना बिखराव होगा, उतना ही भाजपा उम्मीदवारों की जीत का मार्जिन बड़ा होता जाएगा.
4. लोकसभा चुनाव के बाद फिर से सरकार में शामिल हो सकती है JJP
एक विशुद्ध क्षेत्रीय दल होने के नाते JJP के ऊपर विचारधारा का झंडा ऊंचा रखने का दबाव नहीं है. JDU की तरह वह अपनी सुविधा के अनुसार अपना गठबंधन साथी चुन सकती है. सत्ता से नजदीकी का फायदा लेने के लिए उसने 2019 विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा से नाता जोड़ लिया था. आगामी लोकसभा चुनाव और फिर थोड़े ही दिन बाद होने वाले हरियाणा विधानसभा चुनाव में उसे भाजपा की फिर जरूरत पड़ी तो वह फिर से भाजपा का दामन थाम सकती है. बिहार की राजनीति के मुकाबले तो ऐसे यू-टर्न फीके ही होंगे. बीजेपी और JJP के दोबारा गठबंधन होने की संभावना इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि दुष्यंत चौटाला की पार्टी के कई विधायक आज भी भाजपा की ओर झुकाव रखते हैं. ऐसे में पार्टी टूटने के बजाय पूरी पार्टी ही एक तरफ झुक जाए तो क्या बुरा है? दुष्यंत अपने विधायकों को यही समझा रहे होंगे कि थोड़ा धैर्य रख लो, अच्छे दिन फिर आएंगे.
5. JJP और बीजेपी में कथित 'तकरार' की खबर से कांग्रेस चुनावी सीन के हाशिये पर
हरियाणा में प्रमुख पार्टियां भले भाजपा और कांग्रेस रही हों, लेकिन क्षेत्रीय दल खेल बनाने और बिगाड़ने का काम बखूबी निभाते आए हैं. अब जबकि बीजेपी और JJP का गठबंधन टूट गया है, तो अचानक दुष्यंत चौटाला सबके लिए रहस्यमय किरदार बन गए हैं. भाजपा तो सरकार बना रही है, लेकिन दुष्यंत का अगला कदम क्या होगा, कोई नहीं जानता. अभी सस्पेंस है कि वे अलग चुनाव लड़ेंगे या कांग्रेस के साथ गठबंधन करेंगे. बुधवार को जेजेपी की एक रैली है, जिसमें पार्टी के नेता अजय चौटाला और दुष्यंत चौटाला अपनी आगे की रणनीति साफ करेंगे. तमाम उठापटक को कांग्रेस पार्टी मूकदर्शक बनी देख रही है. भाजपा भी यही चाहती है कि हरियाणा में कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई में वोटरों को हुड्डा परिवार के साथ चौटाला भी नजर आएं.