बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद ऐसा लग रहा था स्थिति सामान्य हो जाएगी. पर जिस तरह मालदीव के तरीके से बांग्लादेश में भी इंडिया बॉयकॉट की मुहिम चल रही है उससे यही लगता है कि यह सब सोची समझी रणनीति के तहत कोई साजिश भारत के खिलाफ हुई है. क्योंकि आरक्षण का मसला अब बिल्कुल नहीं रहा. अब मामला सीधे-सीधे अवामी लीग के बहाने हिंदुओं पर हमले और हर भारतीय चीज के बहिष्कार पर पहुंच गई है. पहले मालदीव में भारत विरोधी माहौल क्रिएट करना फिर बांग्लादेश में भारत विरोधी माहौल. यह कोई संयोग नहीं है बल्कि प्रयोग है. क्योंकि मालदीव और बांग्लादेश दोनों एक तरीके से भारत के लिए काम करने वाले देश रहे हैं. पाकिस्तान और चीन पहले ही भारत के दुश्मन रहे हैं. अब दो देशों की संख्या और बढ़ गई है. शेख हसीना का भारत से एग्जिट प्लान जल्द ही एग्जिक्यूट नहीं हुआ तो भारत का पश्चिम से भी बिगाड़ हो सकता है. इस तरह बांग्लादेश का संकट दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है.
1- शेख हसीना को भारत में रखने की चुनौती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पिछले दो टर्म में ऐसी कोई चुनौती सामने नहीं आई, जिसका मुकाबला करने में उन्हें कोई परेशानी आई हो. बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद जिस तरह भारत सरकार ने तत्काल फैसला लेकर शेख हसीना को बाइज्जत बांग्लादेश से बाहर निकाला, वह मोदी सरकार की बहुत बड़ी सफलता रही है. ढाका में गुस्साए प्रदर्शनकारी कुछ भी कर सकते थे. 50 साल पहले कहानी बिलकुल अलग थी. याद करिए 15 अगस्त, 1975 को तख्तापलट करने वालों ने हसीना के पिता और बांग्लादेश में गणतंत्र के संस्थापक मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के अधिकांश लोगों की हत्या कर दी थी. जिसे भारत सरकार रोक नहीं पाई थी. दुनिया जानती है कि मुजीबुर रहमान भी भारत के दोस्त थे. 1992 में भी ऐसी ही कुछ हुआ था. जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूहों ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया. भारत के करीबी रहे राष्ट्रपति नजीबुल्लाह संकट में थे. और भारत सरकार उन्हें बाहर निकालने में असफल साबित हुई थी. तालिबान ने नजीबुल्लाह को काबुल के संयुक्त राष्ट्र दूतावास से बाहर निकाला और उसे लैंप पोस्ट से लटका दिया. लेकिन आज शेख हसीना को दिल्ली और मोदी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन चुकी हैं. हसीना को भारत से दूर करना भी मुश्किल होता और उनके विरोधियों से भिड़ना तो भारत को और मुश्किल में डाल सकता है. बांग्लादेश से डिमांड हो रही है कि शेख हसीना को भारत गिरफ्तार करके सौंप दे. बीएनपी अध्यक्ष खालिदा जिया ने धमकी दी है कि अगर भारत शेख हसीना के मामले में बांग्लादेश का सहयोग नहीं करता है तो भविष्य में भारत को भी बांग्लादेश का सहयोग मिलना मुश्किल है. भारत सरकार शेख हसीना के साथ बहुत अधिक जुड़ी हुईं थीं और उनके खिलाफ बढ़ती नफरत भारत के खिलाफ जरूर असर डालेगी. हसीना के समर्थन और घरेलू स्तर पर उनकी बढ़ती अलोकप्रियता के बीच तनाव पिछले कुछ सालों में स्पष्ट रूप से देखा गया है.
2-पड़ोसियों के साथ खराब होते संबंध
बांग्लादेश में जारी हिंसक प्रदर्शन और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के अपदस्थ होकर देश छोड़ने के बाद पड़ोसी मुल्क को लेकर भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं. पाकिस्तान की तरफ से पहले ही आतंकवाद का दंश झेल रहे भारत को अब बांग्लादेश से भी ऐसे ही खतरे की आशंका जताई जाने लगी है. वर्तमान में सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो क्या बांग्लादेश, भारत के लिए कांटा बन जाएगा? इस सवाल का जवाब तो अब आने वाला समय ही देगा, लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ी परेशानी ये है कि बीते कुछ वर्षों में वो अपने पड़ोसी और सहयोगी देशों को एक-एक कर खोता जा रहा है. भारत के पड़ोसी देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंध भी बिगड़ते जा रहे हैं.
पिछले पांच वर्षों में भारत ने अपने पांच सहयोगियों को खो दिया है. बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार भारत के लिए बड़ी सहयोगी थीं. लेकिन खालिदा जिया की अगर सरकार बनती है तो यह तय है कि वो चीन और पाकिस्तान के गुण गाएंगी. बीते दिनों मालदीव के साथ भी रिश्ते बिगड़ गए, जो पहले कभी भारत के भरोसेमंद हुआ करते थे. पड़ोसी देश नेपाल में भारत समर्थित सरकार भी गिर गई है. अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद अभी तक द्विपक्षीय संबंधों की शुरुआत भी नहीं हो सकी है. वर्तमान में भारत और भूटान के साथ रिश्ते काफी अच्छे हैं, लेकिन चीन के साथ बढ़ती भूटान की करीबी कभी भी चिंता का कारण बन सकती है. अक्टूबर 2021 में चीन और भूटान ने ‘थ्री-स्टेप रोडमैप’ के समझौते पर दस्तखत किए थे.
3-बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा
बांग्लादेश में हिंदू शेख हसीना की आवामी लीग के समर्थक माने जाते हैं, इस कारण उनके कारोबार और घरों पर हमले हो रहे हैं. वैसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले कोई नई बात नहीं है. 1971 में जब बांग्लादेश आजाद मुल्क बना तो यहां पर हिंदुओं की संख्या करीब कुल आबादी की करीब 30 प्रतिशत थी. वर्तमान में यहां हिंदू केवल 8 प्रतिशत रह गए हैं. लगातार हिंदुओं को टार्गेट किया गया है. जिसके चलते धीरे-धीरे बंगाली हिंदू बांग्लादेश छोड़कर दूसरे देशों में गए हैं. जब जब बांग्लादेश में अस्थिरता बढ़ती है, वहां हिंदुओं पर जुल्म होता है. और कुछ लाख हिंदू भारत आ जाते हैं. हालांकि 1971 में और उसके बाद बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मुसलमानों ने भी भारत में शरण ली है. यही कारण है कि पश्चिम बंगाल के बॉर्डर वाले कई जिले मुस्लिम बहुत हो चुके हैं. आसाम में भी बहुत बड़ी संख्या में बंगाली हिंदुओं और मुसलमानों का बांग्लादेश से पलायन हुआ है.
बांग्लादेश की नए अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस ने बांग्लादेशियों से अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने की अपील की है. इसके बाद भी भारत की सीमा पर लाखों की संख्या में हिंदू जमा हो गए हैं, जो पलायन कर भारत आने की कोशिश कर रहे हैं. बीएसएफ के जवान मानव श्रृंखला बनाकर उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे हैं. बीएसएफ के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल अमित कुमार त्यागी ने बताया कि भीड़ को कंट्रोल करने के लिए जवानों को हवा में गोलियां भी चलानी पड़ी है. दिक्कत यह है कि बांग्लादेश की भारतीय सीमा 4096 किमी के करीब है. भारत सरकार हिंदुओं पर अत्याचार होते देख भी नहीं सकती है और उन्हें भारत में शरणार्थी बनाकर रख भी नहीं सकती है. यूएन महासचिव के उप प्रवक्ता फरहान हक ने एक बयान में कहा कि संयुक्त राष्ट्र नस्ल के आधार पर हमले और हिंसा भड़काने के खिलाफ है और हम सुनिश्चित करना चाहते हैं कि बांग्लादेश में हिंसा को कंट्रोल किया जाए.