तमिलनाडु का तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी क्षेत्र हाल के महीनों में राजनीतिक और सांप्रदायिक विवाद का केंद्र बन गया है. मदुरै जिले में भगवान मुरुगन का प्राचीन मंदिर और हजरत सुल्तान सिकंदर बदूशा औलिया की दरगाह आसपड़ोस मौजूद है. पर 2025-26 में कार्तिगई दीपम (Karthigai Deepam) उत्सव और संधनाकूडू (Santhanakoodu) उत्सव के बीच उभरे टकराव ने स्थानीय सद्भाव को खतरे में डाल दिया है. तिरुमंगलम के स्थानीय अधिकारियों ने 21 दिसंबर 2025 को संधनाकूडू उत्सव के लिए दरगाह को झंडा फहराने की अनुमति प्रदान की, जो 6 जनवरी 2026 तक चला.
सवाल यह उठता है कि दरगाह के पास ही स्थित 'दीपाथून' (Deepathoon) स्तंभ पर दीप जलाने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को DMK सरकार क्यों नहीं मान रही? सबसे खास बात यह रही कि दीप जलाने के आदेश देने वाले जज जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया, जबकि कोर्ट ने सरकार की पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी है. जबकि दरगाह में संधनाकूडू उत्सव को मिली अनुमति के खिलाफ स्थानीय स्तर पर जमकर विरोध हुआ . एक व्यक्ति ने विरोध में एक व्यक्ति ने आत्मदाह कर लिया, जो इस विवाद की गंभीरता को रेखांकित करता है.
तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी का इतिहास 2,300 वर्ष पुराना है, जहां जैन भिक्षुओं के शिलालेख मिलते हैं. छठी शताब्दी तक यह हिंदू मंदिर के रूप में विकसित हुआ, जिसमें शिव, मुरुगन और विष्णु के रॉक-कट मंदिर हैं. 14वीं शताब्दी में मदुरै सल्तनत के दौरान यहां सिकंदर बदूशा की दरगाह स्थापित हुई. 1920 में प्रिवी काउंसिल ने फैसला दिया था कि दरगाह क्षेत्र को छोड़कर पहाड़ी मुख्य रूप से सुब्रह्मण्यम स्वामी मंदिर की है.
कार्तिगई दीपम, प्रकाश के विजय का प्रतीक, परंपरागत रूप से उचिपिल्लैयार कोविल मंडपम पर जलाया जाता है. लेकिन 1994 से विवाद शुरू हुआ, जब याचिकाएं दाखिल हुईं कि सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपराओं को ध्यान में रखते हुए दीपाथून स्तंभ पर भी दीप जलाया जाए, जो दरगाह से 15 मीटर दूर है. 1996 और 2017 में हाईकोर्ट ने इसे खारिज किया, मंदिर प्रबंधन की स्वायत्तता को मान्यता दी. 2024-2025 में हिंदू तमिलर काची के राम रविकुमार की याचिका पर जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने 1 दिसंबर 2025 को आदेश दिया कि दीपाथून पर दीप जलाया जाए. पर स्टेट गवर्नमेंट ने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए इसे लागू नहीं किया.
संधनाकूडू उत्सव और अनुमति का विवाद
संधनाकूडू उत्सव, सूफी परंपरा का हिस्सा है. जिसमें चंदन की पेस्ट चढ़ाई जाती है, 21 दिसंबर 2025 से 6 जनवरी 2026 तक चला है. स्थानीय अधिकार शिवज्योति ने कुछ शर्तों के साथ झंडा फहराने की अनुमति दे दी पर मद्रास हाईकोर्ट ने 2 जनवरी 2026 को उत्सव को सीमित कर दिया. कोर्ट ने कहा कि 50 प्रतिभागी, कोई पशु बलि या मांसाहारी भोजन नहीं परोसा जाएगा.
लेकिन आम जनता में विरोध की ज्वाला धधक रही थी. क्योंकि दीपम के लिए सरकार सख्त थी, जबकि दरगाह उत्सव को अनुमति मिल गई थी. सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने अपनी पोस्ट्स में इसे 'मुस्लिम तुष्टिकरण' कहा.
कार्तिगई दीपम और न्यायिक आदेश
जस्टिस स्वामीनाथन का आदेश विवादास्पद रहा, क्योंकि यह 2017 के फैसले को उलटता था. सरकार ने अपील की, लेकिन 6 जनवरी 2026 को मदुरै बेंच ने इसे बरकरार रखा. बेंच ने DMK सरकार की कानून-व्यवस्था की दलील को 'कल्पित भूत' कहा और राजनीतिक एजेंडे के लिए राज्य को फटकार लगाई. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दीपाथून मंदिर की संपत्ति है, और एक दिन का दीप जलाना शांति भंग नहीं करेगा. लेकिन सरकार ने आदेश नहीं माना, सुप्रीम कोर्ट में अपील की.
महाभियोग प्रस्ताव: न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव?
DMK ने जज स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया, जिसमें 120 से अधिक INDIA ब्लॉक MPs के हस्ताक्षर थे. जज स्वामीनाथन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने राजनीतिक पूर्वाग्रह, न्यायिक अतिवाद, और गैर-धर्मनिरपेक्ष फैसला लिया. डीएमके नेता कनिमोझी ने लोकसभा स्पीकर को नोटिस दिया. भाजपा ने इसे न्यायपालिका पर हमला कहा, और 56 पूर्व जजों ने स्वामीनाथन का समर्थन किया. DMK ने कहा कि जज के फैसले सांप्रदायिक तनाव बढ़ाते हैं, लेकिन आलोचक इसे 2027 विधानसभा चुनावों से पहले हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने की साजिश बताते हैं.
आत्मदाह की दुखद घटना: विरोध की चरम सीमा
विवाद ने एक दुखद मोड़ लिया जब 18 दिसंबर 2025 को 40 वर्षीय पूर्णचंद्रन ने मदुरै में पुलिस बूथ में खुद को आग लगा ली. वह दीपम न जलाने से व्यथित था और विरोध में यह कदम उठाया. परिवार ने कहा कि उसने कभी दर्द साझा नहीं किया. VHP ने DMK सरकार को जिम्मेदार ठहराया. भाजपा अध्यक्ष एन नागेंद्रन ने परिवार से मुलाकात की. यह घटना सांप्रदायिक तनाव की गहराई दिखाती है, जहां धार्मिक भावनाएं राजनीति का शिकार बन रही हैं.
DMK सरकार के फैसले और सांप्रदायिक प्रभाव
मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने विवाद को 'सस्ती राजनीति' कहा, लेकिन उप-मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने भाजपा पर विभाजनकारी साजिश का आरोप लगाया. सरकार ने प्रोहिबिटरी ऑर्डर लगाए, पुलिस ने हिंदू प्रदर्शनकारियों को रोका. आलोचकों का कहना है कि संधनाकूडू को अनुमति देकर और दीपम पर सख्ती बरतकर DMK मुस्लिम तुष्टिकरण कर रही है.
सोशल मीडिया पर बहुत से लोग DMK को हिंदूफोबिक कहते हैं, जबकि दूसरा पक्ष भाजपा को विवाद पैदा करने वाला बता रहा है.2027 चुनावों से पहले यह मुद्दा DMK के लिए चुनौती है, क्योंकि हिंदू मुन्नानी ने हार की भविष्यवाणी की है.
उदयनिधि ईसाई धर्म को द्रविड़ परंपराओं के नजदीक मानते हैं
तमिलनाडु के उप-मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने गुरुवार को कहा कि तमिलनाडु के लोग भाजपा की विभाजनकारी साजिशों को कभी पूरा नहीं होने देंगे. शहर में द सिनोड ऑफ पेंटेकोस्टल चर्चेज द्वारा आयोजित क्रिसमस समारोह में भाग लेते हुए उदयनिधि ने कहा कि ईसाई सिद्धांतों और द्रविड़ विचारधारा के बीच कोई अंतर नहीं है. दोनों मानवतावाद, समानता और साथी मनुष्यों के प्रति करुणा पर जोर देते हैं.
सवाल यह है कि एक तरफ तमिलनाडु सरकार हाईकोर्ट के जज पर महाभियोग इस आधार पर लाना चाहती है कि जज चूंकि हिंदू हैं इसलिए हिंदुओं के पक्ष में बायस्ड हैं. पर उदयनिधि जो खुलकर अपने को क्रिश्चियन के नजदीक मानते हैं क्या इस विचारधारा वाले शख्स से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो सरकार में रहते हुए बायस्ड फैसले नहीं लेंगे?