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सियासत के रणक्षेत्र में कैसे और कितनी मर्यादा दिखा पाएंगे टीवी के राम अरुण गोविल?

भारतीय जनता पार्टी ने इस बार मेरठ लोकसभा सीट पर टीवी के राम यानि अरुण गोविल को टिकट दिया है. सबसे बड़ा सवाल है यह कि क्या अरुण गोविल सियासत में टिक पाएंगे? वे खुद कई बार मीडिया के सामने ये कह चुके हैं कि मुझे राजनीति नहीं आती, न मैं राजनीति करूंगा. फिर वो क्या करेंगे?

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सियासत के रणक्षेत्र में कैसे और कितनी मर्यादा दिखा पाएंगे टीवी के राम अरुण गोविल?
सियासत के रणक्षेत्र में कैसे और कितनी मर्यादा दिखा पाएंगे टीवी के राम अरुण गोविल?

लोकसभा चुनाव में इस बार भी बीजेपी ने पूर्व नौकरशाहों के अलावा खेल और फिल्म जगत से आने वाले लोगों को चुनावी मैदान में उतारा है. पार्टी ने मेरठ सीट से टीवी के राम यानि अरुण गोविल पर दांव लगाया है. टिकट मिलने के बाद गोविल ने कहा कि मुझे राजनीति नहीं आती न ही राजनीति करेंगे. उनके बयान को सुनकर बाल गंगाधर का वो कथन याद आता है जिसमें वो कहते हैं- राजनीति साधुओं के लिए नहीं है.

बाल गंगाधर तिलक के इस कथन के दो मतलब निकलते हैं. एक तो वास्तव में जो साधु-संत हैं, राजनीति उनके लिए नहीं है. दूसरा ये कि राजनीति में सीधे-साधे भोले-भाले लोग नहीं चल पाएंगे. राजनीति करने के लिए झूठ, प्रपंच, छल, मक्कारी का सहारा लेना होगा. इससे पहले कि मेरठ से भाजपा के लोकसभा उम्मीदवार और टीवी के राम के रूप में घर-घर में लोकप्रिय अरुण गोविल की सियासी चुनौतियों पर नजर डालें, पहले 1990 के दशक की ओर ले चलते हैं.

बात वर्ष 1988 की है. रविवार का दिन था. रामानंद सागर का रामायण टीवी सीरियल देखने के लिए गांव के पड़ोसी घर पर जुटे थे. अचानक बहुत तेज आंधी-तूफान आ गया और बिजली चली गई. खंभे ऐसे टूटे कि अगले चार साल तक गांव में बिजली नहीं आई. बात बिहार के गोपालगंज जिले के एक गांव गौरा बाजार की है. तब ब्लैक एंड वाइट टीवी बैटरी से चलती थी. गांव वालों ने तोड़ निकाला. चार किलोमीटर दूर ही यूपी की सीमा लगती है. वहां भेजकर बैटरी चार्ज कराई जाने लगी. अगले चार साल ऐसे ही रामायण देखी गई. 32 साल बाद कोरोना में जब लॉकडाउन लगा तो मार्च 2020 से दूरदर्शन पर रामायण फिर हिट हो गया. ये उस सीरियल की दीवानगी और उसके पात्रों से जनता का प्रेम था.

मेरठ से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं अरुण गोविल
जिस रामायण की चर्चा हम कर रहे हैं, उसके राम अरुण गोविल भाजपा के टिकट पर मेरठ से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. अरुण गोविल ऐसा चेहरा है कि भक्ति में डूबे लोग उनमें भगवान देखने लगते हैं. हाल ही में एयरपोर्ट का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक महिला अरुण गोविल को देख उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेती है. अरुण गोविल के प्रति जनता का यही अगाध प्रेम है जिसे बीजेपी चुनाव में भुनाना चाहती है. सवाल यही है कि टीवी के राम के लिए सियासत की राह कितनी आसान या मुश्किल होगी.

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नामांकन के दौरान अरुण गोविल- फोटो PTI
नामांकन के दौरान अरुण गोविल- फोटो PTI


भगवान राम का किरदार और सियासत बिलकुल जुदा हैं
अरुण गोविल ने जिस किरदार को जिया है और जनता में उनकी जो छवि है, मौजूदा जिम्मेदारी इससे बिलकुल उलट है. भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे जबकि मौजूदा दौर की सियासत झूठ, छल- कपट, धनबल-बाहुबल से चलती है. लोगों को 'राम' दिखने वाले अरुण गोविल कैसे करेंगे ये सब? या तो वो अपनी छवि से बिलकुल अलग काम करें, असली सियासी खिलाड़ी बन जाएं या फिर उनकी जो इमेज पहले से बनी है उसी पर कायम रहें. लेकिन दोनों में किसी एक चुनना होगा. दोनों साथ साथ नहीं चल सकते.   

दूसरों का सम्मान करना
भगवान राम को विष्णु का अवतार बताया गया है. भगवान राम ने हमेशा छोटों को स्नेह दिया और अपने से बड़ों का सम्माान किया. उन्हें जरा सा भी कभी घमंड नहीं हुआ. लेकिन राजनीति में रहकर सम्मान की बात बेईमानी हो जाती है. कई बार ऐसा देखा गया है कि नेता एक दूसरे के लिए ग़लीज़, अपशब्दों का प्रयोग कर देते हैं. कई बार बात मानहानि तक पहुंच जाती है. राजनीति में खुद का सम्मान बढ़ाने के लिए एक दूसरे का अपमान करने से भी नहीं चुकते. यहां फौरी तौर पर जिसमें फायदा हो वही किया जाता है. और वैसे भी कहा गया है, क्या बदनाम होंगे तो नाम न होगा? नाम कमाना है, चाहे जैसे भी हो. चाहे तो किसी के धर्म के प्रति बयान देकर. किस को भला बुरा कहकर. इसलिए सियासत में सम्मान की बात कोरी लगती है.
 

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अरुण गोविल ने नामांकन दाखिल किया, फोटो- PTI
अरुण गोविल ने नामांकन दाखिल किया, फोटो- PTI


भावनात्मक रूप से मजबूत
भगवान राम भावनात्मक रूप से काफी मजबूत थे. जीवन में कई चुनौतियां आईं, राज्याभिषेक होना था, नहीं हुआ. वनवास मिल गया. माता सीता का हरण हो गया. पिता राजा दशरथ की मृत्यु हो गई. इन सबके बावजूद वे भावनात्मक रूप से मजबूत रहे. लेकिन सियासत में तो आंसू का भी अपना महत्व है. कई बार यहां घड़ियाली आंसू बहा दिए जाते हैं. आंसू बहाने से अगर फायदा मिल रहा हो तो वो भी किया जाता है. कभी टिकट कटता है तो उम्मीदवार आंसू बहा देते हैं. कई बार दूसरे मसले पर भावनात्मक रूप से कैंडिडेट कमजोर हो जाते हैं. इस कड़ी में भी अरुण गोविल को परीक्षा देनी होगी. भोपाल के मशहूर शायर बशीर बद्र साहब लिखते हैं-
सियासत की अपनी अलग इक ज़बाँ है 
लिखा हो जो इक़रार, इंकार पढ़ना


मतलब यहां जो दिखता है वो होता नहीं है. कोई अगर आंसू बहा भी रहा है, भावनात्मक रूप से कमजोर भी हो रहा है, तो इसके पीछे उसका निजी फायदा है. सियासत में इक़रार को इंकार पढ़ा जाना चाहिए.

धैर्य का परिचय
भगवान राम के पूरे जीवन में धैर्य देखा जा सकता है. जीवन में कई चुनौतियां आने के बाद भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया और हर मुसीबत, मुश्किल का डटकर सामना किया. भगवान राम ने यह सिखाया कि जीवन में आने वाली चुनौतियों से लड़ने के लिए धैर्य एक बहुत बड़ा हथियार है. जिसके पास ये होगा जीवन सरल हो जाएगा. लेकिन, बात अगर राजनीति में धैर्य की करें, इसमें धैर्य दिखता नहीं. चुनाव जीतने के बाद राजनेता अहंकार में आ जाते हैं. उनके भीतर घमंड हो जाता है. बहुत जल्द अमीर बन जाने की चाहत होती है. लाव-लश्कर के साथ चलना चाहते हैं. किसी अधिकारी से अगर किसी मसले पर चर्चा हो रही है तो कई बार देखा गया है कि वह बहस में तब्दील हो जाती है. वहां राजनेताओं का धैर्य खो जाता है. कई बार अपशब्द बोलते हुए भी सुना गया है. रील लाइफ में धैर्य के परिचायक अरुण गोविल क्या रियल लाइफ में भी धैर्य दिखा पाएंगे, देखने वाली बात होगी.
 

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एक चौपाई अक्सर कही जाती है, “रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाय पर वचन न जाय”. यहां धर्म की बात है. वहीं सियासत में आसिम वास्ती का एक शेर है

मेरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मेरा ऐतबार मत करना


फिर बात राजनीति की हो रही है तो रघुकुल रीत सदा चली आई वाली बात गलत साबित हो जाती है. यहां, मैं आदमी हूँ मेरा ऐतबार मत करना... वाली लाइन सटीक बैठती है. भगवान राम सिखाते हैं कि स्थिति चाहे जो भी हो, जो वचन दिया है या जो वचन मिला है उसे पूरा करना है. कैकयी द्वारा 14 वर्षों का वनवास मांगना, राजा दशरथ द्वारा वन जाने की आज्ञा देना, भगवान राम रिश्तों का मान रखते हुए वचन व्रत को पूर्ण करने की भी सीख देते हैं. लेकिन राजनीति में इससे बिलकुल उलट बात होती है. राजनेता जो कहते हैं, या तो वो होता नहीं है, या कम ही होता है. सियासत में बात-बात पर बयान बदल दिए जाते हैं. राम के रूप में छवि विकसित कर चुके अरुण गोविल आखिर इन चुनौतियों से कैसे पार पाएंगे? ये विचारणीय है.   

शत्रु का भी रखा मान
मौजूदा दौर की सियासत में विपक्षी पार्टी के नेता को वो सम्मान नहीं मिल पाता जो मिलना चाहिए. अब राजनीति में विपक्षी पार्टी के नेताओं में मेल-जोल आपसी प्यार का अभाव है. बशीर साहब लिखते हैं...

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे 
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों


सियासत में भी दूसरे पार्टी के नेताओं को दोस्त के तौर पर देखा जाना चाहिए. इतनी मान-मर्यादा आपसी सम्मान बना रहे कि जब कभी सामने से गुजरें तो एक दूसरे से मुस्कुरा कर नजर मिला सकें. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है यह कि क्या अरुण गोविल सियासत में टिक पाएंगे? वे खुद कई बार मीडिया के सामने ये कह चुके हैं कि मुझे राजनीति नहीं आती, न मैं राजनीति करूंगा. फिर वो क्या करेंगे?

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