बूंद-बूंद से घड़ा भरता है... यह मुहावरा तो आपने कई बार सुना होगा लेकिन मध्यप्रदेश के धार जिले में एक गांव ऐसा है जहां के लोग रोज बूंद-बूंद से ही अपनी प्यास बुझाते हैं. इस गांव की महिलाएं रोजाना कठोर चट्टानों से भरी करीब 50 फीट गहरी खाई में उतरकर बूंद-बूंद पानी भरने को मजबूर है और धार जिले के इसी उटावा गांव में उनके इसी संघर्ष की मेरी आंखों देखी आप भी पढ़िए
धार जिले के उटावा गांव पहुंचते वक्त मुझे अंदाजा था कि यहां पानी की समस्या है. लेकिन जो मैंने वहां देखा, वह सिर्फ जल संकट नहीं था, बल्कि व्यवस्था और जमीनी हकीकत के बीच की खाई थी. एक ऐसी खाई जो सचमुच 50 फीट गहरी है. दोपहर का वक्त था. तापमान 43 डिग्री के पार जा चुका था. गांव की महिलाएं सिर पर खाली बर्तन रखे एक सुनसान घाटी की ओर जा रही थीं. मैं भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा. कुछ दूर पैदल चलने के बाद सामने ऊंची चट्टानों और गहरी खाई का दृश्य था. महिलाओं ने बताया कि पानी नीचे मिलता है.
ऊपर खड़े होकर नीचे झांकना ही डर पैदा करने के लिए काफी था. लेकिन इन महिलाओं के लिए यह रोजमर्रा का रास्ता है. मैंने भी उसी रास्ते से नीचे उतरने का फैसला किया. चट्टानों को पकड़कर, फिसलन भरे पत्थरों पर कदम संभालते हुए जब मैं नीचे पहुंचा तो समझ आया कि पानी की एक बाल्टी के लिए यहां कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है.
नीचे कोई कुआं नहीं था, कोई हैंडपंप नहीं था. सिर्फ जमीन से रिसती हुई बूंदें थीं. उन बूंदों से एक छोटा सा गड्ढा भरता था और फिर महिलाएं उसी पानी को अपने बर्तनों में जमा करती थीं. पानी इतना कम था कि गड्ढा खाली होने के बाद दोबारा भरने में करीब दो घंटे लग जाते हैं. तब तक महिलाएं चुपचाप अपनी बारी का इंतजार कर रही थीं. पानी भरने आई सुषमा से मैंने बात की तो उसने बताया कि मजबूरी है, इसलिए यहां नीचे सुनसान घाटी में उतरकर आते हैं. देखें VIDEO:-
थोड़ी दूरी पर गिरे एक पुराने सूखे पेड़ को दिखाते हुए सुषमा ने बताया कि यहां आना बहुत डराता है क्योंकि पिछले साल मेरी ननद भी यहां पानी भरने आई थी लेकिन उसके उपर यह पेड़ गिर गया था. पानी भरकर जाते समय भी बहुत ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि एक बार पैर फिसला तो सीधे नीचे आकर पत्थरों पर गिरेंगे. 2 घंटे बाद गड्ढा पानी से फिर भरा तो बची हुई महिलाओं ने बर्तनों में पानी डाला और अंधेरा होने से पहले घर वापसी की तैयारी शुरु की. देखें VIDEO:-
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी. पानी भरने के बाद महिलाओं ने अपने बर्तन सिर पर रखे और वापस उसी खड़ी चढ़ाई की तरफ बढ़ने लगीं. खाली हाथ नीचे उतरना जितना मुश्किल था, सिर पर कई लीटर पानी लेकर ऊपर चढ़ना उससे कहीं ज्यादा खतरनाक था। एक छोटी सी चूक सीधे पत्थरों पर गिरा सकती थी. इसी दौरान मेरी नजर लगभग 70 साल की एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी. उम्र के इस पड़ाव में भी वह सिर पर पानी का भारी कनस्तर लेकर चढ़ाई कर रही थीं. कुछ पल तक मैं उन्हें देखता रहा, फिर खुद को रोक नहीं पाया.
मैंने उनसे कहा, “अम्मा, ये मुझे दे दीजिए”. मैंने उनका कनस्तर उठाया और कुछ दूर तक चढ़ाई की. उस वजन ने मुझे कुछ मिनटों में ही थका दिया. तब एहसास हुआ कि गांव की महिलाएं हर दिन यह संघर्ष करती हैं. उनके लिए यह कोई विशेष परिस्थिति नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुका है
सबसे हैरानी की बात यह थी कि गांव में जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन बिछ चुकी है. असिस्टेंट इंजीनियर विनोद महाजन ने मुझे बताया कि उटावा गांव में एक करोड़ 17 लाख रुपये की लागत से जल जीवन मिशन की योजना पूरी कर ग्राम पंचायत को सौंप दी गई थी. लेकिन इस साल जलस्तर कम होने की वजह से पानी की समस्या पैदा हुई है और नया नलकूप भी अपेक्षित पानी नहीं दे पा रहा है इसलिए समस्या है.
अब विभाग करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा तो कर रहा है लेकिन हकीकत यही है कि नलों से पानी नहीं आता. नतीजा यह है कि महिलाएं आज भी धरती की दरारों से रिसती बूंदों पर निर्भर हैं.
उटावा गांव से लौटते वक्त मेरे जूते धूल से भरे थे, शरीर थका हुआ था, गर्मी और प्यास से गला सूख रहा था लेकिन मन में सबसे ज्यादा भारी वह सवाल था जो उस खाई के किनारे खड़ा रह गया. अगर सचमुच हर घर तक जल पहुंच चुका है, तो फिर उटावा की महिलाएं आज भी अपनी प्यास बुझाने के लिए 50 फीट गहरी खाई में उतरने को क्यों मजबूर हैं?