कहानी - हम नहीं थे बेवफ़ा
राइटर - जमशेद क़मर सिद्दीक़ी
“कितना हुआ भैय्या” ऑटो से उतरते ही सुहानी ने बिना देर किये अपना बैग कंधे से उतारते हुए पूछा। ऑटो वाले ने कहा, “दो सौ बयालीस हुए लेकिन आप दो सौ चालीस भी दे…” वो इतना ही कह पाया था कि सुहानी 250 रुपए उसके हाथ पर रखकर आगे चली दी। सुहानी की ज़िंदगी वैसे तो कोई परफेक्ट ज़िंदगी नहीं थी... लेकिन हां टाइम को लेकर उसका परफेक्शन सब लोग मानते थे। और जिस दिन वो ऑफिस के लिए लेट हो जाती थी, तो ऐसी हड़बड़ाई हुई भागती थी जैसे पुरानी फिल्मों में हीरो मां के लिए खून की बोतल लेकर अस्पताल की तरफ भागता था। ऑफिस की बड़ी सी बिल्डिंग के मेन गेट से होते हुए, लिफ्ट से होकर वो जल्दी जल्दी अपनी डेस्क तक पहुंची। (बाकी की कहानी नीचे पढ़ें, या इसी कहानी को ऑडियो में सुनें। लिंक यहां दिए गए हैं)
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हैलो... हैलो... हाय... यार आज फिर से मेड ने छुट्टी कर ली... टिफिन बनाने में टाइम लग गया। तो क्या हो रहा है?
उसने अपनी डेस्क के आसपास बैठे उसके कुलीग्स खासकर उसकी बेस्ट फ्रेंड इंशा से पूछा। इंशा बोली, साढ़े तीन बजे सर ने मीटिंग बुलाई है... प्रिंट आउट्स निकाल लेना... और हां, न्यू ज्वाइनिंग भी है आज...
- न्यू ज्वाइनी... थैंक गॉड.. सुहानी ने उनकी बे में एक खाली सीट की तरफ देखते हुए कहा। असल में कुछ महीनों पहले उनकी टीम की एक लड़की कादंबनी ने रिज़ाइन किया था और उसके बाद से अब तक कंपनी ने किसी को हायर नहीं किया था। टीम में एक आदमी की कमी की वजह से सुहानी पर एक्स्ट्रा वर्क प्रेशर आता था। वो खुश थी कि नई ज्वाइनिंग हो रही है।
- हैलो एवरीवन... तभी एक आवाज़ से सुहानी चौंकी और पलट कर देखा तो एचआर टीम की एक मेंबर वहां खड़ी थी। बोली, आज आपकी टीम में एक नया मेंबर ज्वाइन कर रहा है। होप यू गाइज़ विल हेल्प हिम इन दिस न्यू एटमॉसफियर.. प्लीज़ वेलकम रोहित
नीली कमीज़ और काली पैंट पहने हुए, लंबा चौड़ा एक लड़का जिसके चेहरे पर हल्की दाढ़ी के साथ मुस्कुराहट थी सामने आया। टीम के सभी लोगों ने ताली बजाई, पर सुहानी के चेहरे बुझ गया था। वो उस लड़के के चेहरे को हैरानी से देख रही थी। ऐसा लग रहा था कि वक्त एक बीत चुकी कहानी को फिर से सुनाने की तैयारी मे था।
रोहित को देखते ही सुहानी के आंखों के सामने वो वक्त फिर से गुज़रने लगा जब 6 साल पहले उसने अपने घर पर रोहित को आखिरी बार देखा था। वो अक्टूबर का तीसरा हफ्ता था। मौसम ज़रा बदलने लगा था। सुहानी अपने सजे हुए कमरे में बैठी थी, जहां ढोलक पर कुछ औरतें लोकगीत गा रही थीं। घर में तमाम मेहमान थे, चहल-पहल थी। घर की दीवारों पर बिजली की लड़ियां सजी थीं। अगले दिन सुहानी की शादी होनी थी... अमितेश से। पिता जी के चेहरे पर इंतज़ाम की फिक्र थी, वो कभी हलवाई से फोन पर बात करते, कभी टेंट वाले से... कभी किसी को झिड़क देते। पर ठीक उसी वक्त घर के बाहर एक गाड़ी आ कर रुकी। गाड़ी से सुहानी के होने वाले ससुर साहब और एक नौजवान लड़का निकले। ये लड़का अमितेश का दोस्त था। ये लड़का था रोहित... वही जो आज सुहानी के दफ्तर में आया था।
अरे आप इस वक्त... आइये... आइये... कहते हुए सुहानी के पिता ने अमितेश के पिता को अंदर बुलाया। रोहित भी साथ-साथ अंदर आया। अमितेष के पिता यानि चौधरी साहब... कुछ उलझे उलझे से लग रहे थे। वो लोग एक कमरे में गए... और जब बाहर निकले तो सुहानी के पिता के चेहरे पर से हवाइयां उड़ रही थीं। दरअसल होने वाले दूल्हे अमितेश के पिता ये बताने आए थे कि ये शादी अब नहीं हो पाएगी। क्योंकि अमितेश घर से भाग गया है। वो ये शादी नहीं करना चाहता था। उसे किसी और से प्यार था। सुहानी की ज़िंदगी इस एक पल में बदल गयी थी। ऐसा लगा जैसे किसी ने उस पर मनो मिट्टी फेंक कर उसे बोझ में कहीं दबा दिया हो। घर में रोना पीटना मच गया। पिता जी आंगन में वहीं सर पर हाथ रखकर बैठ गए। सुहानी को उस वक्त की एक बात बहुत अच्छे से याद थी और वो थी कमरे से निकल कर आंगन से होते हुए, बाहर निकलते हुए रोहित की नज़र... सुहानी बालकनी से आंगन में झांक रही थी और आंगन से जाते हुए रोहित ने उसे एक बार रुक कर देखा। रोहित की आंखों में दुनियाभर की मायूसी, गम और तकलीफ सिमट आई थी।
यूं तो इस बात को गुज़रे ज़माना हो गया था। और इसके बाद सुहानी ने शादी न करने का फैसला कर लिया था। उसने खुद को काम में इतना डुबा लिया था कि कुछ और सोचने का वक्त भी नहीं मिलता था। पर ये कहना एक झूठ है कि उसे इस सब का ख्याल नहीं था। वो आज भी दुनिया से छुप के कई रातों को अकेली, उन यादों के तूफानों से गुज़रती थी। और अब... अब तो ऑफिस में कोई ऐसा आ गया था, जिसका चेहरा उसे रोज़ाना वो मनहूस बात याद दिलाने वाला था।
काफी देर तक अपनी सीट से रोहित को देखने के बाद, बहुत मुश्किल से वो अपने काम पर ध्यान दे पाई। पर अब तो ये रोज़ का सिलसिला होने जा रहा था। अगले कुछ दिनों तक सुहानी को रोहित से ना चाहते हुए बात करनी पड़ती। कभी कोई डॉक्यूमेंट चाहिए होता, तो कभी ऑफिस की कोई पॉलिसी समझानी होती। यहां रोहित की कैफियत भी कुछ अजीब सी थी। भले ही अमितेश और सुहानी की शादी टूटने के बाद, उसने सुहानी के बारे में अलग से कभी न सोचा था... लेकिन अब जब वो उसके सामने आती, न रोहित उसे जिस नज़र से देखता उसमें थोड़ा सा अफसोस भी शामिल होता। इस वजह से उसने कभी पुरानी जान पहचान का ज़िक्र नहीं किया। वो शायद सुहानी से हमेशा दूर ही रहता, अगर एक दिन वो वाकया न होता।
सुहानी और रोहित को एक ऑफिस में काम करते हुए हफ्तों गुज़र चुके थे। दोनों ने काम के सिलसिले में कई बार एक दूसरे से बात की थी, लेकिन उसके अलावा, एक मुस्कराहट तक नहीं बांटी थी। एक रोज़ रोहित कैंटीन की तरफ जा रहा था तो उसने सीढ़ियों के पास सुहानी को फोन पर बात करते सुना।
सुहानी थोड़े गुस्से में अपनी मां से बात कर रही थी, “मम्मी आपके लिए क्या ज़िंदगी में इससे ज़्यादा कोई बात और ज़रूरी नहीं है... अरे नहीं करनी है मुझे शादी... प्लीज़... फिर उधर से आती आवाज़ सुनकर वो और झल्लाई और बोली.... आप ने मुझसे पूछा था? नहीं न... तो मैं क्यों आऊं... मुझे नहीं मिलना है किसी से... आपको मुझसे पूछना चाहिए था। रोहित ठहर गया। सुहानी ने आगे कहा, “हां हो रही हूं 30 की.. 40 की भी हो जाऊंगी, तो क्या... नहीं करनी है मुझे शादी। फिर से अपना तमाशा नहीं बनवाना सबके सामने।” फिर फोन काट दिया। गुस्से से उसका चेहरा लाल हो रहा था, और आंसू भी आने लगे थे। जिन्हें साफ करते हुए वो मुड़ी तो सामने रोहित था।
उसे ऐसा देखते ही रोहित हड़बड़ाकर बोला, वो मैं ऐक्चुली कैफेटेरिया की तरफ... वो अपनी बात खत्म भी नहीं कर पाया था कि सुहानी बोल पड़ी, “मेरी बातें सुन रहे थे? लगता है आपको भी मेरा तमाशा बनता देखने का बहुत शौक है।?” सुहानी की आंखों में नमी थी। उसने आंखों पर हथेली मली और वहां से चली गई। रोहित के पैर वहीं जम गए। बुरा लगा था उसे, लेकिन अपने से ज्यादा बुरा सुहानी के लिए लग रहा था। जो कुछ उसकी ज़िंदगी में हो रहा था, इस ऑफिस में कोई समझे या नहीं। उसे समझ आ रहा था।
इस घटना के बाद से अब रोहित सुहानी के बारे में कुछ ज्यादा ही सोचने लगा। उसकी सीट के पास से गुज़रते हुए, जब उसकी नज़र उसपर पड़ती तो वो उसे गौर से देखता। लेकिन हर बार उसे सुहानी नज़रें झुकाए हुए अपने काम में डूबी हुई दिखाई देती। कभी-कबार वो सोचता था कि काश एक बार उनकी नज़रें मिलें, और वो मुस्कुरा दे... ताकि उनके बीच जो कुछ हुआ वो थोड़ा थोड़ा पिघले। लेकिन सुहानी ने उसकी तरफ नहीं देखा। पर वो देखता था। डेस्क पर झुकी कर उलझे हुए बालों में उल्टा पेन चलाती सुहानी को... उसके झुकी पलकें... उसकी माथे पर जमी हुई सिलवटें... जैसे दुनिया भर की कशमकश उसकी दो आंखों के बीच समा गयी हों। सुहानी कोई बला की खूबसूरत लड़की नहीं थी, उससे कहीं ज्यादा अट्रैक्टिव लड़कियां थी ऑफिस में। पर उसकी सादगी, उसके बात करने करीका,और उसकी ख़ामोश आंखों का अंदाज़... रोहित की नज़र में, वो ऑफिस की सबसे अलग लड़की थी। रोहित को याद था कि यही बात उसने अमितेश से भी कही थी। जब अमितेश और सुहानी की शादी होने वाली थी। और सगाई की अंगूठी लेने वो अमितेश के साथ गया था, तब मज़ाक-मज़ाक में उसने कहा था, “भाई बहुत अच्छी लड़की पा गया है तू... तू है नहीं इस लायक वैसे... अगर तू पसंद नहीं करता सुहानी भाभी को, तो मैं कर लेता उनसे शादी।” बात याद आई तो वो सुहानी को कुछ और ग़ौर से देखने लगा। सुहानी की सीट दफ्तर की उस कांच की दीवार से लगी हुई थी। उसकी डेस्क पर कुछ प्लांट्स थे और सामने के सॉफ्ट बोर्ड पर मां और गुज़र चुके पिता की तस्वीरें। एक तस्वीर उसके बचपन की भी थी, जिसमें वो शायद 6-7 साल की होगी... ब्लैंक एंड व्हाइट तस्वीर थी वो,, जिसमें वो अपने पापा-मम्मी के साथ गेट वे ऑफ इंडिया के पास खड़ी मुस्कुरा रही थी। कितनी अजीब बात थी कि सुहानी उस तस्वीर से अब बहुत बदल गयी थी, लेकिन मुस्कुराहट बिल्कुल वही थी। ये तस्वीर आपकी है? पता होने के बावजूद एक रोज़ उसने सुहानी से बातचीत का बहाने पूछा। सुहानी ने नपातुला सा जवाब दिया येस... ये मैं हूं... और रोहित से बचते हुए काम करने लगी। रोहित बोला, मैं गेट वे ऑफ इंडिया पहली बार कब आया मुझे तो याद भी नहीं... पर मम्मी कहती हैं कि शायद यही उम्र मेरी थी। रोहित ने कहा.. पता है ये जो बिल्डिंग आपके पीछे है न... इसको देखिए। अब ये बिल्डिंग नहीं है। सुहानी देखने लगी... बात बात में दोनों ने ध्यान नहीं दिया कि वो तस्वीर देखने देखते करीब आ गए थे। अचानक इस बात का एहसास होती ही... सुहानी ने अपनी चेयर पीछे कर ली।
रोहित को सुहानी में कुछ तो खास दिखता था। इसीलिए वो उससे बात करने की कोशिश करता था। पर सुहानी बातचीत से कतराती थी। हालांकि उनके बीच की खामोशी अब टूट चुकी थी। अक्सर वो दोनों दफ्तरी बातचीत के अलावा भी यहां वहां की बात कर लेते थे।
एक दिन रोहित ऑफिस से घर जा रहा था। बारिश हो रही थी, और अंधेरा हो चुका था। रास्ते में एक जगह उसे सुहानी दिखी। अपने हैंडबैग को छतरी बनाएं वो बारिश से बचने की नाकाम कोशिश कर रही थी। अमितेश ने गाड़ी उसके पास रोकी और उससे बोला, “आइये मैं आपको छोड़ देता हूं। बारिश तेज़ है।” सुहानी बोली, “इट्स ओके। मैं... आटो का वेट कर रही हूं।”
रोहित ने कुछ नाराज़गी से कहा, “नो इट्स नॉट ओके। और मैं आपको ऐसे छोड़कर नहीं जा सकता। आइये, बैठिये अंदर।” रोहित ने इस बार न जाने किस हक से ये बात कही। सुहानी ने बहस नहीं की, और चुपचाप गाड़ी में आकर बैठ गई।
बारिश तेज़ थी, रेडियो पर गाने की आवाज़ धीमी। इन दोनों आवाज़ों के बावजूद अजीब सी ख़ामोशी थी। रोहित ने इस ख़ामोशी को तोड़ने की कोशिश की। “So... hows life?” सुहानी से मुख़्तसर सा जवाब दिया, “its good.” एक बार फिर कार के अंदर ख़ामोशी पसर गयी। रोहित ने फिर कोशिश की, “अम्म्म, एक बात बताइये, आपको मुझसे कुछ प्रॉब्लम है।” जवाब में सुहानी ने एक बार गर्दन मोड़कर रोहित की ओर देख भर लिया। रोहित समझ गया, प्रॉब्लम तो है। इतने में गाड़ी सुहानी के घर तक पहुंच गई। वो गाड़ी से उतर ही रही थी कि रोहित ने बोला, “Look, मैं जानता हूं आपको मुझे देखकर गुस्सा आता होगा। लेकिन मैं बस आपको ये बताना चाहता हूं कि सबकी तरह, मुझे भी कुछ नहीं मालूम था अमितेश के बारे में। मालूम होता, तो मैं आपके साथ उसे ऐसा न करने देता। Please, believe me. I know मेरी इस सफाई से कुछ चेंज नहीं होगा लेकिन जो नफरत मैं आपकी नज़र में अपने लिए देखता हूं... मुझे बुरा लगता है। I hope, u understand this.”
सुहानी ने कुछ कहा नहीं और कार से उतरकर चली गई। हालांकि, अगले कुछ दिनों में, रोहित को इसका अनकहा जवाब मिलने लगा था। अब कभी-कभी सुहानी उसकी मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुराकर दे देती थी। कड़वाहट गई तो नहीं थी, पर कम होने लगी थी। एक रोज़ रोहित कैंटीन में अकेला बैठा कॉफी पी रहा था। कोई और टेबल खाली नहीं थी, तो सुहानी वहां आ गई। ये सुहानी की तरफ से, रोहित की तरफ बढ़ाया पहला कदम था। कॉफी पर शुरू हुई हल्की फुल्की बातों में, दोनों का मन इतना लग गया कि पता ही नहीं चला, कब 15 मिनट का ब्रेक घंटेभर तक खिंच गया। उनके बातों में मुंबई का मौसम, यहां के लोगों के बोलने का तरीका, भोपाल का खाना, शाहरुख की नई फिल्म और पता नहीं क्या क्या टॉपिक खुलते गए... ऐसी ही कुछ मुलाकातों ने उनके बीच की मिट्टी को कुछ नर्म कर दिया था। बात यहां तक पहुंच गयी कि अब दोनों कभी-कबार लंच भी साथ कर लेते थे। ब्रेक में कॉफी पी लेते। इस दौरान दोनों एक दूसरे से कई-कई बातें करते। वो जान पहचान, जिसे कुछ साल पहले वक्त ने बढ़ने नहीं दिया था, आज वही वक्त दोनों में पल-पल पहचान बढ़ाता जा रहा था। सुहानी को अब रोहित का साथ होना अच्छा लगने लगा था। वो अक्सर शाम के कॉफी ब्रेक में अब रोहित की डेस्क पर खुद आती और बाहर चलने के लिए कहती। जहां वो दोनों ऑफिस में चल रही पॉलिटिक्स गॉसिप करते, और खूब हंसते। उनका रिश्ता धीरे-धीरे बेहतर हो रहा था लेकिन तभी एक झटका लगा।
एक दोपहर जब सुहानी रोज़ की तरफ अपने काम में मसरूफ थी, कि तभी उसकी कांच से बाहर की तरफ गयी। क्योंकि उसकी सीट से बाहर की सड़क साफ दिखती थी, उसने देखा कि रोहित बिल्डिंग से बाहर निकला और रोड क्रॉस करने लगा। लेकिन तभी... वो रोड के उस तरफ खड़े किसी शख्स से मिलने पहुंचा। सुहानी ने उस इंतज़ार कर रहे शख्स को ग़ौर से देखा तो वो हैरान रह गयी। ये कोई और नहीं अमितेश था। वही अमितेश जिससे सुहानी की शादी टूट गयी थी। to be continued...
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