कहानी - शकूर भाई नहीं रहे
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी
ज़िंदगी क्या है... क्या है... हैं ... अभी बैइठे... कहो तड़ से गिर जाएं पीछे... ख़त्म... अरे आज कल भरोसा है किसी की ज़िंदगी का। आदमी मार प्लैन व्लैन बनाए रहता है कि नवंबर में नैनीताल जाएंगे, फरवरी में गोवा ... अगले साल गांव वाली ज़मीन का बंटवारा करा के मालदीव्स घूमेंगे.. अरे भैय्या... यहां सांस ऊपर जाती है तो नीचे आएगी या नहीं इसका भरोसा भी नहीं है। (बाकी की कहानी नीचे पढ़ें)
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(बाकी की कहानी यहां से पढ़ें) अब जैसे उसी दिन का क़िस्सा ले लीजिए... शकूर भाई... हमारे मुहल्ले में रहते थे... अच्छे खासे आदमी थे... ये लहीम-शहीम... शहर में तीन बरफ के कारखाने थे उनके... अच्छी खासी मिलकियत थी... रोज़ दुआ सलाम होती थी... एक सुबह उठा तो पता चला नहीं रहे। हमारे पड़ोसी ही थे... सड़क के इस तरफ हमारा घर था... उस तरफ उनका। हमारे ताल्लुकात बड़े अच्छे थे। बकरीद में रान भेजते थे हमें... वो भी चांदी का वरक लगा कर... ख़ैर अब नहीं रहे बेचारे... अफसोस तो हमको हुआ।। पर वो ग़ालिब ने कहा है न कि – किसी की मौत का ग़म वो मनाए जिसे खुद मौत न आनी हो... भई मरना सभी को है... आज शकूर साहब गए ... कल हम जाएंगे... परसों आप... अरे मतलब... इक्ज़ैक्टली परसों ही नहीं... मतलब कभी न कभी... जाना तो है ही... तो सुबह सुबह शकूर साहब का जाना बड़ा दिल दुखा गया। हमनें अपनी बालकनी पर पड़ा पर्दा खिसकाया तो देखा कि शकूर भाई के घर के बाहर लाल प्लास्टिक की कुर्सियां लग गयी हैं... ऊपर कनातें सजी हैं। कुछ खास रिश्तेदार किनारे ख़ड़े थे और कुछ आने वालों को रास्ता समझा रहे थे –
अरे वही नीचे की तरफ से पुलिया कटी है, हां... बस बस बस... वहीं से निकल जाना... अमा नहीं... उधर कहां चले गए... इधर से आना... तालाब के किनारे किनारे... बौखल हो क्या पूरे... तीसरी गली है.. चौथा मकान.. आओ हम खड़े हैं
मुझे लगा कि नीचे मातमपुर्सी में शामिल होना चाहिए। मैं नीचे आया... सामने वाले ठेले पर मोती भाई खड़े थे जो शाम को घर के बाहर गोलगप्पे का ठेला लगाते थे और दिन भर उसकी तैयारी करते रहते थे। मैंने देखा कि वो मटर उबाल रहे थे, पानी में मिलाने के लिए चटनी बना रहे थे।
अमा गज़ब कर रहे हो यार मैंने कहा, सामने मौत हो गयी है तुम चटपटा पानी बना रहे हो
बोले, अब का करें भैय्या... काम तो करे का पड़ी...
अच्छा कितने बजे... ये ..
सुबह सवा चार का टाइम रहा होगा... आवाज़ आई अरे नहीं रहे... शकूर भाई नहीं रहे... पड़ोसी चब चिल्ला रहे थे...
हम्म... कहते हुए मैं आगे बढ़ गया और जाकर मरहूम शकूर भाई के घर सामने खड़ा हो गया। जहां तंबू कनात लगी थी और चाय का दौर चल रहा था। शकूर साहब वैसे आदमी अच्छे थे... एक दो बार उन्होंने मेरी बड़ी मदद भी की... एक बार नुक्कड़ पर रहने वाले अंसारी साहब से मेरी कहासुनी हो गयी। मामला बस ज़रा सा था... असल में जिस मकान में अंसारी साहब रहते थे, पहले उसमें मैं किराए पर रहता था... और काफी वक्त तक रहा। तो सभी सरकारी कागज़ और रिश्तेदारों के खत आज भी उन्हीं के घर आते थे... शुरु में तो वो मेरे खत मुझ तक पहुंचा देते थे... लेकिन फिर वो ज़रा नाक मुंह बनाने लगे। मैंने एक दो बार तकाज़ा कर दिया कि अंसारी साहब, वो अलीगढ़ से मामू का एक खत आया होगा आपके पास... आपने बताया नहीं, बताना चाहिए था।
बस वो नाराज़ हो गए... अरे तो क्या हम तुम्हारे नौकर लगे हैं, और कोई काम नहीं है क्या हमाए पास... कि तुमाए डाकिया बन जाएं... एक तो इतने खत आते हैं तुम्हारे... आज इधर से खत आ रहा है... कभी उधर से ... अपना पता बदलवा क्यों नहीं लेते... और ये बताओ तुम्हारे सब रिश्तेदार खाली बैठे रहते हैं क्या... इतना कौन खत लिखता है...
- ऐ अंसारी साहब, मुंह संभाल कर बात कीजिएगा... हमाए रिश्तेदारों के बारे में कुछ कहा तो अच्छा नहीं होगा... हमने कहा तो बात बिगड़ती चली गयी... बात हाथा पाई तक आ गयी... हमने भी उनकी दाढ़ी पकड़ ली... काफी मारपीट हुई... दोनों के कुर्ते फट गए... इतने लठ बजे कि उस दिन हम दोनों एक दूसरे का सर खोल देते... मगर उसी वक्त बेचारे शकूर साहब आए... और हम दोनों को छुड़ाया और समझा बुझा कर मामला खत्म किया।
बल्कि मुझसे तो ये भी कहा, आप फिक्र न कीजिए... आप के खत मैं अंसारी साहब से इतवार-इतवार ले लिया करूंगा और आपको पहुंचा दूंगा... मगर इस तरह कंजड़ों की तरह मोहल्ले में लड़िये मत.... हाय शकूर भाई... बड़ा याद आ रहे थे आज...
तो ख़ैर मैं उनके घर पहुंचा। मरहूम शकूर साहब के मकान के बाहर जो लोग खड़े थे उनसे हाथ मिलाते हुए... आगे बढ़ने लगा कि तभी नज़र गयी... अंसारी साहब पर... सीधी पल्ले वाली टोपी लगाए... अपनी शेरवानी की सिलवटें ठीक करते हुए अंसारी साहब मुंह घुमाए बैठ थे। मैने सोचा.... ये सुबह सुबह शेरवानी कौन पहनता है यार... इनको क्या मालूम था कि आज शकूर भाई का टिकट कटने वाला है जो इतना सजे धजे बैठे हैं... ख़ैर.... अब ऐसा मौका था कि मैंने उनकी तरफ हाथ बढ़ाया... उन्होंने लापरवाही से हाथ मेरी तरफ कर दिया... मैं हाथ मिलाकर खामोशी से उनके बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया।
थोड़ी देर बाद, मैं घर के अंदर चला गया। वहां देखा तो अजीब हाल था। चेहरे सबके रुआंसे लेकिन आंसू किसी की आंख में नहीं। वो खिचड़ी बाल वाला शकूर साब का बेटा, अनवर ... जो कभी-कबार आते-जाते मुझे सलाम करता था, बिस्तर पर उकड़ू बैठा तीली से दांत खोद रहा था, पास में बेंत वाली कुर्सी पर बैठे उनके समधी साहब आते जाते लोगों को उबासी लेकर आते-जाते लोगों को देख रहे थे... और पास में जहां अगरबत्ती लगी थी... वहां बैठी उनकी बीवी शकूर भाई की बॉडी के पास हाथ वाला पंखा इतने मरियल हाथों से झल रही थी कि मुझे लग रहा था कि कहीं शकूर भाई उठ कर पंखा अपने हाथ में न लें लें।
लेकिन असल में वो थक गयी थी। मामला ये था कि जो भी आता था पहले तो सुबकने की एक्टिंग करता था और फिर धीरे से बॉडी के पास बैठकर उसी से पूछता था... “भई बड़ा अफसोस हुआ हमें तो... वैसे अचानक कैसे हुआ ये.. कितने बजे” और फिर वो वही रटा रटाया जवाब देती... “बस अब क्या बताएं... शाम को कहने लगे... चिकन 69 खाना है... हमने चिकन मंगवा दिया... कहने लगे पीस ज़रा छोटे-छोटे रखना... हमने कहा ठीक है... फिर कहने लगे... उसमें थोड़ा कोयले से थोड़ा स्मोकी फ्लेवर कर देना... हमने कहा.. .ऐसा है... खुद ही कर लो जो करना है... मार चिकन नहीं हो गया... ताजमहल हो गया। बस हाथ पैर पड़ने लगे... मनाने लगे हमको,.. हमने भी फिर बना दिया... कहने लगे चलो तुम खाना निकाल कर रखो हम एक चक्कर हवा खा कर आते हैं... बस मोज़ा पहनने लगे... एक ही मोज़ा पहना था कि बस.... एक तरफ लुढ़क गए... बताइये... चिकन 69 भी रखा है पूरा”
मैंने वही बात दोहरा दी जो ऐसे मौकों पर कही जाती है... “अब क्या कहा जाए भई... ऊपर वाले की जो मर्ज़ी... ख़ैर तुम लोग हिम्मत रखो... और कोई ज़रूरत हो... कोई काम हो तो बेशक बताना ... अकेला मत समझना... अरे हमसाए हैं हम... पड़ोसियों का मर्तबा रिश्तेदारों से बड़ा होता है... वक्त ज़रूरत पर काम…”
- चच्चा सुनिए... तभी उनके बेटे अनवर ने मेरी बात काटी और कहा... आप एक मदद कर दीजिए बस
- हां हां बताओ...
- वो कफन दफन का इंतज़ाम आप देख लीजिएगा... हम लोगों को कोई तजुर्बा नहीं है न... आज तक कोई घर में मरा नहीं इससे पहले.... आप ज़रा देख लीजिए कि कैसे...
मैंने मन में सोचा... ज़लील आदमी... ऐसे कह रहा है जैसे हम हर जुमेरात मर जाते हैं। पीर बाबा की मज़ार पर जलती अगरबत्ती की राख चाट कर... अरे कहने के लिए कह दिया था कि कुछ काम हो तो बताना... ये तो सच में लेथन बन गया।
अरे मगर मैं तो... मैं बस इतना ही कह पाया था कि तभी एक मोहतरमा रोती हुई कमरे में दाखिल हो गयीं। वो शायद अनवर की फूफी थीं। आते ही शकूर भाई की डेड बॉडी के पास बैठ गयी और कुछ देर रोने के बाद ... फिर वही सवाल उनकी बीवी से पूछ लिया... जो मैंने पूछा था ... और जिसका जवाब देते देते वो थक गयीं थीं। - ये सब कैसे हुआ आपा। आपा पहले से ही झल्लाई हुई थीं। पंखा एक तरफ फेका और ये कहकर दूसरे कमरे में चली गयीं, ये लेटे हैं, इन्हीं से पूछ लो
कसम खुदा की ... मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। अरे कफन दफन का काम मैंने तो कभी किया नहीं... कैसे होगा.. मैं बाहर रखी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया। बगल में अंसारी साहब थे।
वहां अभी भी वही बातें चल रही थी। एक बोला “अरे साहब अब सब बहाना होता है, जिसकी आ जाती, आ जाती है।” दूसरे ने कहा “भैय्या, आदमी चला जाता है, सब यहीं रह जाता है...” तभी अंसारी जिनसे मेरा पुराना झगड़ा था, खुद को अहम दिखाते हुए बोले, “अरे अभी परसों मिले थे चौराहे पर... और क्या… बोले भई आप मुहल्ले में नए हैं लेकिन सबसे नेक हैं, मैंने शुक्रिया कहा भई और क्या कहता.. लेकिन क्या मालूम था कि.. ख़ैर...अल्लाह उनको जन्नत बख्शे”
तभी अंदर से आवाज़ आई “अरे अंसारी अंकल, ज़रा यहां आइये”
- आ रहा हूं बेटा... एक मिनट कहते हुए अंसारी साहब अंदर गए लेकिन लौटे तो चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। अनवर ने उनसे कह दिया था कि वो मेरे साथ मिल कर ये काम निपटा दें। वो भारी कदमों से आए और आकर मेरे बगल में बैठ गए।
मैं चाहता तो यही था कि उनके पैरों में गिर जाऊं और कह दूं “भाई देखिए ऐसा है कि जो हुआ वो भूल चूक लेनी देनी मे गया... अब आप ये मामला संभाल लीजिए...” लेकिन मैं जानता था कि अगर मैंने ये कहा तो फिर वो जानबूझ कर सारा काम मुझ पर डाल देगे.. इसलिए मुझे कॉनफिडेंट लगना था... मैं ज़रा और तन के बैठ गया।
अंसारी सफेद अपनी शेरवानी और टोपी संभालते हुए बगल वाली कुर्सी पर बैठते हुए कसमसाए.. जैसे बुज़ुर्ग लोग करते हैं अल्लाह तेरा शुक्र है फिर मेरी तरफ हिकारत से देखते हुए बोले “काम ले तो लिया है आपने.. हां हां कर लिया... मगर आता भी कुछ... अरे बहुत रिसपॉनसिबिल्टी का काम है... ज़रा सी ऊंच नीच हुई तो... ”
सच बताऊं तो अंसारी साहब के बारे में मेरी राय उस दिन तक यही थी कि इबलीस को मैंने कभी देखा तो नहीं है... लेकिन उसकी शकल अगर कुछ कुछ बनाए जाए तो ऐसी ही होगी... शैतान थे एक नंबर के... कहीं सड़क पर सांप दिखे या अंसारी साहब तो पहले अंसारी साहब के लाठी मारो... वो वाला मामला था... मगर उस दिन मैं उनकी बलाएं लेना चाहता था। शुक्र है उनको सब आता था... पता था कि कहां से कफन का कपड़ा मिलेगा... कहा से इत्र... लोबान किस तरह का लाना है... मुर्दे को नहलाया कैसे जाता है... किस तरफ मुंह करके कफन का सफेद कपड़ा पहनाया जाता है.. वगैरह वहैरह... उनको सब आता था। मैं अब सकुन से था।
एक दो घंटे गुज़र गए... सामान वगैरह की लिस्ट उन्होंने बना दी... कुछ मैं ले आया.. कुछ वो... फिर तैयारियां शुरु हो गयीं। घर के बाहर... पर जितने देर काम होता रहा.. अंसारी साहब कुछ कुछ मुझे झिड़कते रहे। अरे कपड़ा कटवाया था कि नहीं कफन का... पैर के अंगूठे काहे से बांधेगे... अमा दिमाग से पैदल वैदल हो क्या.... कब्र में छिड़कने वाला केवड़ा मंगवाया था तुम पुलाव में डालने वाला केवड़ा ले आए...
- अरे वो... गलती से ले आए... वो भी ले आए थे... लाल वाली पन्नी में है... देखिए मैं उनसे उलझना नहीं चाहता था। सो चुपचाप जो अंसारी साहब कहते रहे मैं सुनता रहा। आज इज़्ज़त बचानी थी।
to be continued...
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