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'कहने में जो छूट गया' में शामिल है नरम अहसासों की खुशबू और तल्ख तजुर्बों के अहसासात

जाने-माने शायर फ़रहत अहसास के संपादन में एक चयन आया है 'कहने में जो छूट गया' नाम से, जिसमें समकालीन उर्दू शायरी के पांच अहम शायरों मनीष शुक्ल, मदन मोहन दानिश, शारिक कैफ़ी, खुशवीर सिंह 'शाद' व फ़रहत एहसास की ग़ज़लें शामिल हैं.

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कहने में जो छूट गया का आवरण चित्र [ सौजन्यः राजपाल एंड संस] कहने में जो छूट गया का आवरण चित्र [ सौजन्यः राजपाल एंड संस]

ग़ज़लों की दुनिया गए कुछ दशकों से लगातार विकसित हो रही है. देखते-देखते जो विधा उर्दू के हवाले थी वह हिंदी में घटाटोप बन कर छा गयी है. मुशायरों के मंच से लेकर ग़ज़ल के तमाम पाठकों के बीच देवनागरी में छपी ग़ज़लों का अब एक बड़ा खजाना मौजूद है. इसे लोग पढ़ रहे हैं, गा रहे हैं और ग़ज़लगोई में हाथ रवां कर रहे हैं. यह ग़ज़लों की लोकप्रियता ही है कि आज वह गायकों की पहली पसंद है, तो पाठकों की भी. जाने-माने शायर फ़रहत अहसास के संपादन में एक चयन आया है 'कहने में जो छूट गया' नाम से, जिसमें समकालीन उर्दू शायरी के पांच अहम शायरों मनीष शुक्ल, मदन मोहन दानिश, शारिक कैफ़ी, खुशवीर सिंह 'शाद' व फ़रहत एहसास की ग़ज़लें शामिल हैं. ये शायर इधर ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं.
कुल जमा एक सौ पच्चीस पन्‍नों के इस संकलन में फरहत एहसास की एक प्यारी भूमिका भी है, जो इन ग़ज़लों के साथ ग़ज़लों की पूरी परंपरा को समझने में मदद करती है. यह भूमिका 'मुझको मेरी याद आ रही है' नाम से है. फ़रहत लिखते हैं: ''जब लफ्ज नहीं थे तो ये स्मृति द्वीप, हाफ़िजे के जज़ीरे सिर्फ कल्पना के पानियों में बुलबुलों से बनते और बिगड़ जाते होंगे. शब्द ईजाद हुए तो यादों को रूप रंग हासिल हुआ. अब यादों की आवाजों, शक्लों और हरकतों को महफूज़ किया जा सकता है.'' वे इस संदर्भ में भूले हुए की याद, 'हम', 'मैं' के सारे ओर छोर को छूते हुए 'आत्मन्' से होते हुए दर्शनों चिंतन सरणियों से गुजरते हुए उस रचनाकार 'मैं' की बात करते हैं जिसने ''परमात्मा या खुदा की मेज के सामने दूसरी तरफ अपनी कुर्सी लगा रखी है और परमात्मा या खुदा के चाक के बराबर ही अपना चाक भी चला रखा है.'' वे कहते हैं, ''इस रचनाकार मैं यानी ग़ज़लगो शायर के अंदर की खामोशी का साज़ चुप नहीं होता, बाहर संवेदनहीनता और बेहिसी की चाहे जितनी भी बर्फबारी हो, उसके अंदर संवेदनाओं का अलाव सर्द नहीं पड़ता, बाहर चाहे जितने भी हाथ, खंजरों की तरह दूसरों के गले पर लपक रहे हों, उसके हाथ हमेशा अपने महबूबों को और दुनिया की सारी मख्लूकात और सारी सृष्टि उसके महबूबों में शामिल है, अपने आगोश में लाने पर आमादा रहते हैं.'' कहा जाए तो इस पूरे संकलन में वे हर शायर में इस 'मैं' को बहुत बारीकी से खोजते नजर आते हैं. वे इस का एक खूबसूरत उदाहरण मनीष शुक्ल की शायरी से देते हैं. 
मुख़ालिफ़ीन को हैरान करने वाला हूं 
मैं अपनी हार का ऐलान करने वाला हूं.
अपनी हर कामयाबी पर जश्न मनाने के आदी मनुष्य की प्रवृत्ति कहीं किसी भी सूरत में हार मानने की नहीं होती है, पर यह शायर अपनी शिकस्त को सेलिब्रेट कर रहा है यह एक नई बात है. फरहत लिखते हैं, ''मनीष शुक्‍ल का ये शेर किसी संघर्ष के दौरान अचानक अस्तित्व बोध की एक नई रणनीति को लफ्ज देता है जो इस संघर्ष के पूरे व्याकरण को तहस नहस करने वाली है.'' मनीष शुक्ल उन्नाव में जनमे लेकिन अंतत: अवधी अदब और सभ्य‍ता के मरकज़ लखनऊ में रहते हैं. उनकी ग़ज़लगोई की अपनी तासीर है. उनमें क्लासिकी की मिठास है तो आज के यथार्थ से वाबस्ता अहसासात भी. 
उनके कुछ अशआर-
नाखुदाओं की सरपरस्ती  में
जी रहे हैं खुदा की बस्ती में

लोग पत्थर के हो गये देखो
इतना डूबे हैं बुत परस्ती में
*
तुमको दुनिया का तलबगार नहीं होना था
पास जाना था गिरफ्तार नहीं होना था. 

तुम पे पत्थर न उठा लें ये ज़माने वाले 
तुम को मजनूँ का तरफ़दार नहीं होना था.

क्या सादाबयानी है उनकी ग़ज़लों में, एक ग़ज़ल के उनके चंद अशआर देखें-
सब हिसाबात साफ थे मेरे 
लोग फिर भी खिलाफ़ थे मेरे

मैंने पत्थर से दोस्ती कर ली
आईने सब खिलाफ़ थे मेरे 

खुद से जद्दोजेहद का एक खूबसूरत उदाहरण उनकी यह गजल है. 'मैं' और 'तू' के बीच का द्वंद्व कितना हावी रहता है मनुष्य की जिन्दगी में कि वह उसकी हदों से निकल नहीं पाता. उनके ये अशआर इस द्वंद्व को समझने में मदद करते हैं-
तू मुझको सुन रहा है तो सुनाई क्यूँ नहीं देता
ये कुछ इल्ज़ाम हैं मेरे सफाई क्यूँ नहीं देता 

खुद अपने आपको ही घेर कर बैठा है तू कब से
अब अपने आपसे खुद को रिहाई क्यूँ नहीं देता 

मदन मोहन दानिश ग़ज़ल के चंद चर्चित हस्ताक्षरों में आते हैं. बलिया उप्र से ताल्लुक रखने वाले दानिश अब ग्वालियर रहते हैं तथा बोलचाल की शायरी के उस्ताद माने जाते हैं. आम हिंदुस्तानी लहजा उनके पास है जिसके अर्थ समझने के लिए किसी शब्दकोश की शरण में जाने की जरूरत नहीं है. उनके कुछ अशआर हैं- 
बहुत भरोसा ल़फ़्जों पर मत किया करो
कहने में जो छूट गया है, सुना करो. 

पेड़ के नीचे बैठ के साये में दानिश 
धूप से अच्छी अच्छी  बातें किया करो.
*
सफर का था, सफ़र का हो गया हूं 
मैं चलते चलते रस्ता हो गया हूं

कहानी पर करूंगा बात लेकिन 
अभी तो इसका हिस्सा हो गया हूं 

'मैं' के इस किरदार को वे अनेक रूपों में परखते रचते हैं. एक ग़ज़ल के दो अशआर देखें-

हाय हम कैसे हुआ करते थे
जिन दिनों उससे मिला करते थे

ओढ़ ली उसने भी चुप्पी दानिश
जिससे हर बात किया करते थे  -मदन मोहन दानिश

शारिक़ कैफ़ी उर्दू अदब के बेहतरीन शायरों में शुमार किए जाते हैं. उनके 'मैं' और 'हम' के बीच भी खासा द्वंद्व चलता है. उसके बीच खासा दूरियां नजर आती हैं. उनकी शायरी मनुष्य के मन के रोशन गलियारों में जाती है और इंसानी रिश्तों की बारीक पड़ताल करती है. कई संग्रहों के शायर शारिक़ ने शायरी को बहुत आसान बना दिया है कि वह बहते हुए जल की तरह स्वाभाविक लगे और जिन्दगी को नया मानी दे. उनकी ग़ज़ल जिस बोलचाल की जबान को अपना दोस्त बनाए हुए है उसके उदाहरणस्वरूप कुछ अशआर-
थाल पर थाल सजाने से नहीं जाती है 
भूख अंदर हो तो खाने से नहीं जाती है

तार ही घर के तसव्वुर से जुड़ें हों जिसके
वो उदासी कहीं जाने से नहीं जाती है.

दुनिया की अफ़रा तफ़री को नुमायां करते हुए उनके कुछ अशआर 
यहां दश्त में सब मिरे लोग हैं
सभी घर से भागे हुए लोग हैं

इन्हें किस नदी में बहाऊँगा मैं 
जो काग़ज़ पे लिक्खे हुए लोग हैं

यहीं ढूढ़ लूँ एक कोना कहीं
यहां प्यार करते हुए लोग हैं  -शारिक़ कैफ़ी

खुशबीर सिंह 'शाद' की शायरी में अपनी पहचान है जिसकी खुशबू अंतर्राष्ट्रीय फलक पर फैल चुकी है. उनके यहां इस 'मैं' का तन्हाई से क्या रिश्ता है, इसे देखना हो तो उनकी शायरी की ओर रुख किया जा सकता है. लंबी बहर के इस शायर के पास लफ्जों को मानी देने का हुनर है. मुलाहिजा हो उनकी ग़ज़ल के चंद अशआर-
नींद के जब हमराह ज़रा सी बेदारी भी होती है
ख्वाब को गहरा होने में कुछ दुश्वारी भी होती है

तन्हाई में खुद से मिलना अच्छा लगता है लेकिन
तन्हाई में खुद से अक्सर बेजारी भी होती है

जिसके इक खाने में कुछ बोसीदा यादें रक्खी हों
हर घर के इक कमरे में वो अल्मारी भी होती है - खुशवीर सिंह 'शाद'  

फ़रहत अहसास खुद एक बड़े शायर हैं. उनकी भूमिका बताती है कि शायरी की परख के लिए उनकी अपनी कसौटियां हैं. उनके लिए ग़ज़ल में न तात्कालिक अखबारी यथार्थ मायने रखता है न बहुत पुरातन की लीक पर चलने की जिद. वहां इंसानियत के भीतर उमगते द्वंद्व हों तो भाषा का एक अलग स्थापत्य और लहजा भी जो लुभाए और चिंतन की गहराई में आहिस्ता आहिस्ता ले चले. 'मैं' और 'हम' के अहसासात को दर्शन और चिंतन की जिस बुनियाद पर आंकते हैं वह उनकी आलोचना की खूबी है. उनकी एक ग़ज़ल के ये अशआर देखें कि किस सलीके से वे जिन्दगी की आमदरफ्त को बयान करते हैं-

मैं तो आगे निकल आया हूं पर मेरी परछाईं
जिस्म के डूबते साए से अभी लिपटी है 

रुह के डर से कभी खोल के देखा ही नहीं
ज़िन्दगी जिस्म की पुड़िया में बँधी रखी है

अंदर के हादिसों पे किसी की  नज़र नहीं 
हम मर चुके हैं और हमें इसकी ख़बर नहीं. 

आबाद इस तरह हैं कि वीरान हैं ये शहर 
घर इस तरह बसाए गए हैं कि घर नहीं. - फ़रहत एहसास

कहने में जो छूट गया- में नरम अहसासों की छुवन के साथ जिन्दगी के तल्ख तजुर्बो के हवाले भी हैं. हर शायर का अंदाज ग़ज़ल कहने का अपना है पर किसी न किसी छोर पर इनके भीतर की अंतर्धारा एक-सी है, बेशक अंदाजेबयां जुदा है. इन्हें पढ़ते-गुनगुनाते हुए शायरी और कविता की ताकत का पता चलता है. 
***
पुस्तकः कहने में जो छूट गया
चयन और संपादन: फ़रहत एहसास
भाषाः हिंदी 
प्रकाशक: राजपाल एंड संस
पृष्ठ संख्याः 128
मूल्यः 225 रुपए

# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

 

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