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तो इन किताबों से रौशन हुआ था साल 2020 का कथा जगत

कोरोना की विश्वव्यापी व्याधि के बावजूद हिंदी लेखन की दुनिया ठिठक कर बैठी नहीं थी. सोशल मीडिया पर सक्रियता के साथ-साथ प्रकाशन गृहों ने अपना कारोबार भी संभाला. कथा साहित्य की दुनिया जिन छपे शब्दों से गुलजार हुई, साहित्य आजतक ने उनका एक जायजा लिया.

कोरोना भी धूमिल नहीं कर सका साल 2020 में जिन किताबों की चमक को कोरोना भी धूमिल नहीं कर सका साल 2020 में जिन किताबों की चमक को

कोरोना ने मार्च से पूरी दुनिया को तबाह कर रखा है. एक दूसरे से समुचित दूरी, संक्रमण से बचाव में लगी पूरी व्यवस्था, तालाबंदी और अर्थव्यवस्था की चरमराती हालत ने पूरी दुनिया की रफ्तार मंद कर दी है. आवाजाहियां सीमित हैं. धीरे-धीरे अनलॉकिंग की प्रक्रिया के शुरू होने के बाद भी कोरोना ने अपने पंजे ढीले नहीं किए हैं. लेकिन इस बुरे दौर में भी जीवन चल रहा है. उसमें पहले जैसा उल्लास भले न हो. लिखने-पढ़ने वालों की दुनिया भी प्रकाशन से चलती है, सो जब प्रकाशन संकट में हो तो लेखन भी संकट में होता है. गए साल शुरू में होने वाले विश्व पुस्तक मेले तक इस साल की बहुत सी पुस्तकें आ चुकी थीं, किन्तु कुछ पुस्तकें प्रकाशन प्रक्रिया में थीं, जो मार्च के बाद आतीं कि कोरोना ने प्रकाशनों की गति मंद कर दी. इसके बावजूद किस्सागोई या कथा साहित्य‍ की पड़ताल करें तो पाते हैं कि मंद-मंद ही सही, लिखने-पढ़ने का काम होता रहा है और यह भी कम आश्वस्तिदायी नहीं है.

युवा लेखकों की औपन्यासिक तहरीरें
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साल की शुरुआत युवा लेखकों के कुछ अच्छे उपन्यासों से हुई. राजपाल एंड संस से ज्ञानपीठ पुरस्कृत युवा उपन्यासकार अम्लेंदु तिवारी का बेहतरीन उपन्यास 'विरक्त' आया. आत्मकथात्मक उपन्यास श्रृंखला की यह दूसरी कड़ी अपने रुचिर गद्य और किस्सागोई से बांधे रहती है. 'विरक्त' 2016 में छपे और भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से पुरस्कृत उपन्यास 'परित्यक्त' की अगली कड़ी और 'विरक्त-परित्यक्त-अनुरक्त' की त्रयी का हिस्सा है. 'विरक्त' एक ऐसे इंसान की नियति का दस्तावेज़ लिखने की असमाप्त जद्दोजेहद है जिसकी किस्सागोई की सघनता हमें भाषाई अध्यात्म के विरल प्रकाश में खो जाने का अवसर देती है.

'वैधानिक गल्प' ऐसा ही प्रखर युवा कथाकार चंदन पांडेय का पहला उपन्यास है जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक होते संघी समय को बहुत बारीकी से पकड़ा है. चंदन पांडेय ने इसे वैधानिक गल्प की संज्ञा दी है तो यह कहीं न कहीं इस व्यवस्था पर तंज भी है. कैसा वैधानिक गल्प है यह जहां हर चीज के पीछे अवैधानिकता है. कानून हाथ में लेने की स्वतंत्रता है. सांस्कृ‍तिक पुलिसिंग में ही समाज का लुंपेन वर्ग लगा है. चंदन की भाषा में अमूर्तन किस्म की बंदिशें नहीं हैं, हालात को बूझने समझने और एक लेखकीय संवेदना से आंकने की कोशिश दिखती है. हम इसे आज के समय का यथार्थ कह सकते हैं. बेशक यह कोई मेगा नैरेटिव नहीं है किन्तु एक लकवाग्रस्त होते समाज की स्कैनिंग तो है ही जिसकी बुनियाद में हिंसा जुगुप्सा और घृणा का वायरस भरा है.

तरूण भटनागर जैसे कहानीकार का उपन्यास 'बेदावा-एक प्रेमकथा' भी इस साल के चर्चित उपन्यासों में शुमार किया जा रहा है. पिछले कुछ सालों में कविता के अलावा उपन्यास विधा में भी दखल के साथ उपस्थि्त अनामिका का नया उपन्यास 'आईनासाज' और वंदना राग का पहला उपन्यास 'बिसात पर जुगनू' इस साल के बेहतरीन उपन्यासों में हैं.जहां आईनासाज के सेंट्रल स्प्रेड पर अमीर खुसरो के जीवन को मूर्तरूप दिया गया है वहीं आजादी के पहले जंग के सूरतेहाल इस उपन्यास को इतिहास के आईने में बुना गया है.  

हर बार की तरह अपनी तरह के विषय पर कुछ अलग लिखने वाली अलका सरावगी का उपन्यास 'कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए'- भी यादगार उपन्यासों में गिना जाएगा. कुलभूषण एक ऐसे पहचान खोते शख्स का नाम है जो अपने भीतर अनुभव की सुदीर्घ दास्तान सहेजे हुए है. वह जैसे जीवन-त्रासदियों से गुजरा हुआ शख्स लगता है. बांग्लादेश से हुए विस्थापन और शरणार्थियों की समस्या से ऊभ चूभ होते हालात को जिस बेदखली के मार्मिक अहसास से अलका ने देखा है वह इस चरित्र को उदयप्रकाश के मोहनदास की तरह हमारे भीतर जीवंत कर देता है. हाल ही में राजपाल एंड संस से आया गीताश्री के उपन्यास 'राजनटनी' की भी खासी चर्चा रही है, यद्यपि यह छपने के साथ ही एक मैथिल लेखक के नाटक से कथित विषय-साम्य के कारण विवादों में आ गया था. 'राजनटनी' मीनाक्षी और बंग राजकुमार बल्लालसेन की प्रणय-गाथा है तथा देश के लिए अपने को निछावर कर देने वाली एक राजनर्तकी की जीवन गाथा भी है. एक नटिनी जो अपने अद्भुत कला-कौशल और सौंदर्य से राजनटिनी बनती है, समय आने पर अपनी सूझ-बूझ और वीरता का परिचय देते हुए मिथिला और उसके साहित्य को बचा लेती है. उपन्‍यास बेहद रोचक बन पड़ा है, तथापि, राजनटनी को राजनटिनी कहा गया होता तो भाषाई चलन की दृष्टि से पुस्तक का नाम शायद ज्यादा सटीक होता. उनकी एक और पुस्तक वाणी प्रकाशन से 'वाया मीडिया: एक रोमिंग कॉरस्पॉडेंट की डायरी' नाम से आई. इस पुस्तक में हिंदी प्रिंट में 1990 से लेकर 2005 तक के कालखंड में आई लड़कियों की कथा समेटने की कोशिश की गई है.

प्रियदर्शन का उपन्यास 'ज़िंदगी लाइवः 26/11 की वह रात जो खत्म नहीं ही' वाणी प्रकाशन से छपकर आया. कथा लेखिकाओं में प्रज्ञा को उनके इसी साल आए उपन्यास धर्मपुर लॉज ने खासी शोहरत दी है. नाइन बुक्स से वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन की किताब 'एफ. ओ. ज़िंदगी' ने भी काफी शोहरत बटोरी. जयंती आजकल दबंग विषयों को अपनी कथा में जगह देती हैं. शची मिश्र का उपन्यास 'चाय काफी उर्फ तीसरी दुनिया' रोचक तहरीर का परिचायक है. दया दीक्षित ने ईसुरी को केंद्र में रख कर फाग लोक के 'ईसुरी' जीवनाधारित उपन्‍यास लिखा है.

वरिष्ठ कथाकारों के हस्तक्षेप
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वरिष्ठ कथाकारों में उषा किरण खान उपन्यासों में अरसे से हमारी संस्कृति व परंपरा के अनेक प्रसंगों को औपन्यासिक आख्यानों में उठाती आ रही हैं, पर पहली बार उन्होंने राजनीतिक उपन्यास का बेहतरीन ताना बाना बुना है. सीमांत कथा उनका नया उपन्यास हैं. बिहार की हिंसक राजनीति के कुत्सित और आपराधिक चेहरे को उजागर करते हुए दो युवकों के माध्यम से 1974 के जेपी आंदोलन के फलितार्थ को खूबसूरती से मूर्त किया है उन्होंने. महेंद्र मधुकर का नया उपन्यास 'कस्मै देवाय' भी अपनी थीम और ट्रीटमेंट में उपन्यास की गतानुगतिकता से अलग है. कथासिद्ध लेखक संजीव का 'अहेर' फिर उनकी औपन्यासिकता की एक नई लकीर खींचता है. जिस तरह पिछले कुछ उपन्यासों में यथार्थ और तथ्य के सुव्यवस्थित डाक्यूमेंटेशन के आधार पर वे उपन्यास की अंतर्वस्तु का निरुपण करते आ रहे हैं वह जीवन के ज्यादा करीब ले जाता है. जिस तरह सदियों से शिकार करते करते आदमी खुद अहेरी बनता गया, इससे हमारी सभ्यता में अनेक थोथी मर्यादाओं के नाम पर जिस तरह शिकारी वृत्ति फैल रही है, यह उपन्यास उसका एक जीता जागता उदाहरण है.   

मिथिलेश्वर गांव की पृष्ठ भूमि के निष्णात कथाकार हैं- ''संत न बॉंधे गॉंठड़ी' किस्सागोई में उनकी पैठ को पुनरस्थापित करता है. अपने पहले उपन्या‍स की तरह त्रिलोकी नाथ पांडेय फिर अपने ढंग के अलग उपन्यास 'चाणक्य के जासूस' से चर्चा में हैं. भारतीय भाषाओं के साहित्य की सजग प्रहरी के रूप में एक बड़ी भूमिका निभा रहे प्रभा खेतान फाउंडेशन की संस्थापक प्रभा खेतान का उपन्यास 'तालाबंदी' पुनर्प्रकाशित होकर आया है. व्यावसायिक-जगत को कथा की धूरी बनाकर लिखा हुआ यह उपन्यास पहली बार सन 1991 में सरस्वती विहार दिल्ली से प्रकाशित हुआ था. 'तालाबंदी` उपन्यास प्रभा खेतान का आत्मकथांश है। उपन्यास का नायक 'श्याम बाबू` प्रभा स्वयं ही हैं। औपन्यासिक बदलाव के लिए मात्र कुछ मिथक जरूर गढ़े गए हैं, भी पढ़ने योग्य होगा. अमन प्रकाशन ने महेंद्र भीष्म का उपन्यास 'आखिरी दरख्त' छापा है तो हरि जोशी का उपन्यास 'नारी चिंगारी' तथा हाल में दिवंगत हुए कवि विष्णुचंद्र शर्मा का उपन्यास 'आजादी की विडंबना' भी. कम लेकिन चुनिंदा लिखने वाले नवीन जोशी का उपन्यास 'टिकटशुदा रुक्का' की भी इस साल खासी चर्चा रही है. 'नींद नहीं जाग नहीं', कवि कथाकार अनिरुद्ध उमट का लघु उपन्यास है- भाषा और किस्सागोई में एक नई दीप्ति का परिचायक.

सुपरिचित उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने हर बार एक नई और ज्वलंत सामाजिक समस्या को अपने उपन्यासों में उठाया है. उनके नए उपन्यास 'वंचना' में बलात्कार के मुद्दों और स्त्री शोषण के अनेक पहलुओं को केंद्र में रखा गया है जहां पुरुष वर्चस्व के छलात्कारों की आड़ में हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मो की स्त्रियों की वंचना सामने आती है. इसी साल उनका एक और उपन्यास भी स्त्री विषयक समस्या पर 'शकुंतिका' नाम से आया. यह उपन्यास भारतीय समाज की उस अवधारणा को शिद्दत से उठाता है, जिसके तहत बेटी को पराया धन माना जाता है. ऐसा पराया धन, जिसे विवाह के समय वधू के रूप में वर रूपी, लगभग एक अपरिचित व्यक्ति को दानस्वरूप सौंप दिया जाता है. उनके दोनों ही उपन्यास राजकमल प्रकाशन से आए हैं.

कथा-पौराणिक: किस्सागोई की पारंपरिक प्रविधि
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हाल के दिनों में मिथकीय पात्रों या पौराणिक पात्रों पर उपन्यास लिखने का चलन बढ़ा है. पौराणिक, महाभारत एवं रामायण आधारित नरेन्द्र कोहली के औपन्यासिक प्रयोगों से उत्साहित होकर इस संदर्भ में अनेक पात्रों पर वाणी प्रकाशन से पिछले दिनों कई उपन्यास आए हैं: 'अश्वत्थामा' जो एक गुजराती उपन्यास का हिंदी अनुवाद है, साथ ही 'शकुनि' पर आशुतोष नाडकर व नरेन्द्र कोहली का 'शिखंडी' इसी कोटि के उपन्यास हैं.
हिंद युग्म से सौरभ कुदेशिया का महाभारत आधारित पौराणिक रहस्य गाथा उपन्यास दो खंडों में 'आह्वान' और 'स्तुति' नाम से आया.

वाणी प्रकाशन से महर्षि अरविंद के जीवन पर आधारित राजेंद्र मोहन भटनागर के दो उपन्यास 'नीलचंद्र' और 'आनंद पथ' भी आए तो अंग्रेजी में माधव हाडा का 'मीरा' भी छपकर आया. इसी प्रकाशन से सुजाता द्वारा लिखी कथात्मक पुस्तकों में 'नोआखाली' और 'नीलांचल चंद्र' उल्लेखनीय हैं. इन उपन्यासों की पठनीयता और लोकप्रियता बताती है कि पाठकों का मनोजगत ऐसे उपन्यासों की ओर लौटना चाहता है जो यथार्थ से दूर अतीत के किसी पुराख्यान में ले जाए--'मेरे नाविक धीरे धीरे' वाले भाव से. इन उपन्‍यासों की लोकप्रियता से अचरज नहीं कि आने वाले दिनों में ऐसे उपन्यासों की मॉंग बढ़े.

लोकप्रियता का सूचकांक
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इधर बेस्ट सेलर ने पुस्तकों को लगभग एक व्‍यावसायिक उत्पाद में बदल दिया है. देखा जाता है कि एक वर्ग किसी भी पुस्‍तक या विधा  के लोकप्रिय होते ही उस पुस्तक या विधा को स्तररहीन मान लेता है किन्तु अब नियामक और निर्णायक शक्‍ति शक्ति पाठक के हाथ है. यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वह किन चीजों को अपने पठन पाठन में प्रश्रय देगा. एका-वेस्टलैंड से आई एक ऐंकर की हत्या पर आधारित वरिष्ठ मीडिया पत्रकार संजीव पालीवाल के देखे सुने अनुभवों की दास्तान 'नैना' पढ़ते हुए दुष्यंत की ग़ज़ल का एक शेर कौंधता है: मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ वह ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ. ऐसे क्राइम थ्रिलर को बारीक तारों को किस्सागोई में गूँथना जितना सहज लगता है उतना ही यह चुनौतीपूर्ण है जिसे पालीवाल ने संभव कर दिखाया है. हिंदयुग्म से आए बेस्ट सेलर उपन्यासों में दिव्य प्रकाश दुबे की इस साल 'इब्ने बतूती' तूती बोलती रही. आभासी जीवन की वास्तविकता पर आधारित मानव कौल के उपन्यास 'अंतिमा' ने भी काफी सुर्खियां बटोरीं. अन्य उपन्यासों में सत्य व्यास का 'उफ़्फ़ कोलकाता', निखिल सचान का 'पापा मैन' लोक्रप्रियता और विक्रय की पायदान पर उल्लेखनीय रहे. बाप-बेटी के रिश्ते पर निखिल सचान का कौशल उनके उपन्यास में बोलता है जब कि सत्य व्यास ने अपने उपन्‍यास में डरावने हास्य की एक नई प्रविधि ही ईजाद की है, जो उपन्यास की रोचकता को खोने नहीं देती. निखिल सचान का 'पापा मैन' व साल के आखिर में जया जादवानी का कथा संग्रह 'अनकहा आख्यान' भी छप कर आ चुका है. मनीषा तनेजा द्वारा अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित दो उल्लेखनीय किताबें भी इसी दौर में 'बंदूक दीप' और 'इंदिरा' नाम से आईं.


उल्लेखनीय रही कहानियों की आमद
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जहां तक कहानियों का ताल्लुक है, इस साल कुछ गहमागहमी कम रही. तथापि अमन प्रकाशन से आया सुपरिचित कथाकार राजेंद्र राव का संग्रह 'पोलो विक्ट्री में गाइड', रामदरश मिश्र का संग्रह 'जिन्दगी लौट आई थी', नरेंद्र नागदेव का संग्रह 'हाउस आफ लस्ट', व अवधेश श्रीवास्तव का संग्रह 'अपनी अमीरी दुनिया', राजपाल एंड संस से प्रकाशित आकांक्षा पारे का संग्रह 'पिघली हुई लड़की', लंबी कहानियों के सिद्ध कथाकार प्रवीण कुमार का संग्रह 'वास्कोडिगामा की साइकिल' व कंचन सिंह चौहान का संग्रह 'तुम्हारी लुंगी' अच्छे संग्रहों में हैं.

चरण सिंह पथिक की कहानियां अरसे से जिस लोकेल को बुनती रही हैं, उसने उन्हें यथार्थवादी कथाकारों के बीच खासी चर्चा दी है. 'दो बहनें' संग्रह इसका प्रमाण है. उमाशंकर चौधरी का कविता व कथा दोनों का पलड़ा संतुलित है, नया संग्रह 'दिल्ली में नींद' उनके कथा नैरेटिव का बेहतरीन विन्यास रचता है. मँजे हुए किस्सागो अनिल यादव का 'गौसेवक' और मनोज कुमार पांडेय का संग्रह 'बदलता हुआ देश और स्वर्णदेश की लोक कथाएं', विनोद भारद्वाज का संग्रह 'फेसबुकिया लव', सूर्यनाथ सिंह का संग्रह 'कोई बात नहीं' व राकेश तिवारी का संग्रह 'चिट्ठी जनानियां' कहानी की दुनिया में जीवंतता भरते हैं.

रूपसिंह चंदेल जाने पहचाने किस्सागो हैं. उनका 'जुलूस में आदमी' और अंजू शर्मा का संग्रह 'सुबह ऐसे आती है' इसी साल आए हैं. साल की शुरुआत में आए योगिता यादव 'गलत पते की चिट्ठियां', नीला प्रसाद का 'मात और मात' तथा सुशांत सुप्रिय का 'पॉंचवी दिशा' कहानी संग्रह भी चर्चा में रहे. कुछ सालों से कहानी में सक्रिय दिव्या शुक्ला का संग्रह 'ठौर की कहानियां' बेहद पठनीय अवश्य लगीं किन्तु इसके आते ही इसकी आखिरी कहानी पर वसुंधरा पांडेय की संस्मरणात्मक कहानी के नकल का आरोप भी लगा. मानव कौल के कहानी संग्रह 'चलता फिरता प्रेत' और सुभाषचंद्र कुशवाहा के संग्रह 'लालबत्ती  और गुलेल' तथा सुषमा गुप्ता के संग्रह 'तुम्हारी पीठ पर लिखा मेरा नाम' की कहानियों ने पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया. मानव कौल ने दो कहानी संग्रहों के बाद अब तक कथा-नैरेटिव की अपनी एक अलग शैली विकसित कर ली है.

कुल मिलाकर कोरोना के कारण कुछ महीनों के लिए स्‍थगित रही प्रकाशन गतिविधियों के बावजूद हिंदी की औपन्यासिक दुनिया और प्रकाशन मशीनरी हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठी रही जिसके फलस्‍वरूप इस साल भी पढ़ने की मेज पर अच्छे उपन्यासों की आमद बनी रही. गंभीर किस्म के उपन्यासों के साथ नई हिंदी के युवा पाठकों के लिए भी कई बेहतरीन उपन्यास इस साल आए. कहानियों का पलड़ा भी कोई कम हल्का नहीं रहा.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com

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