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पुस्तक समीक्षा: एक रुका हुआ फैसला; मंदिर मामले के फैसले की कहानी

पेंगुइन प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक में प्रभाकर मिश्रा ने राम मंदिर मामले पर सुप्रीम कोर्ट की 40 दिनों की सुनवाई के बारे में विस्तार से लिखा है. साथ ही फैसले से जुड़ी कई अन्य दिलचस्प बातों का वर्णन भी किया है.

प्रभाकर मिश्रा की पुस्तक 'एक रुका हुआ फैसला: अयोध्या विवाद के आखिरी 40 दिन' का कवर प्रभाकर मिश्रा की पुस्तक 'एक रुका हुआ फैसला: अयोध्या विवाद के आखिरी 40 दिन' का कवर

'साल 1934 में अयोध्या में बड़ा हिन्दु-मुस्लिम संघर्ष हुआ जिसमें वैरागियों के नेतृत्व में हिन्दुओं की विशाल भीड़ ने बाबरी ढांचे पर आक्रमण कर दिया और उसके शिखरों को बहुत क्षति पहुंचाई थी. जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने मस्जिद के गुंबदों का नए सिरे से निर्माण कराया था. उस पुनर्निर्माण के समय इस ढांचे के गुंबदों का रूप हिन्दू-मंदिर शिखर से बदलकर गोलनुमा कर दिया गया. इस तथ्य की पुष्टि इससे होती है कि 6 दिसंबर 1992 को जब वह ढांचा ढहाया गया तो गुंबदों में इस्तेमाल की गई ईंटों पर 1930 खुदा मिला था. यह तथ्य उस समय समाचार पत्रों में ईंटों के चित्रों के साथ प्रकाशित हुआ था.' इस वाकये का जिक्र वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर कुमार मिश्र ने अपनी हाल में छपी किताब 'एक रुका हुआ फैसला : अयोध्या विवाद के आखिरी चालीस दिन' (Ek Ruka Hua Faisla: Ayodhya Vivaad Ke Aakhiri Chalees Din) में किया है.

पेंगुइन प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक में प्रभाकर मिश्रा ने राम मंदिर मामले पर सुप्रीम कोर्ट की 40 दिनों की सुनवाई के बारे में विस्तार से लिखा है. उन्होंने इस पुस्तक में फैसले के दिन कोर्ट के अंदर के माहौल के बारे में भी काफी स्पष्ट तरीके से वर्णन किया है.

इस पुस्तक में वो एक जगह कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए लिखते हैं, 'कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि मुसलमानों को गैर-कानूनी ढंग से उनके प्रार्थना स्थल यानी मस्जिद से निकाला गया था. मामला जब अदालत में लंबित था तो सुनियोजित तरीके से मस्जिद को ढहा दिया गया. इस तरह मुसलमानों को उनकी 450 साल से पुरानी मस्जिद को ढहा दिया गया. इस तरह मुसलमानों को उनकी 450 साल से पुरानी मस्जिद से वंचित किया गया. कोर्ट ने आगे लिखा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा विवादित जमीन को तीन हिस्से में बांटना कानून सम्मत नहीं था. यहां तक कि यह बंटवारा दोनों समुदायों के बीच शांति और भाई चारा स्थापित करने के लिहाज से भी उचित नहीं था.'

184 पन्ने और 12 पाठों में बंटी इस किताब में प्रभाकर कोर्ट के फैसले के 786  अंक के महत्व को भी अंगित करते हैं. उन्होंने लिखा है, 'सुप्रीम कोर्ट के 929 पन्नों के फैसले में कुल 806 पैराग्राफ हैं. इसके 786वें पैराग्राफ में कोर्ट ने विवादित जमीन पर मुस्लिम पक्ष के कब्जा होने के दावे की विस्तार से समीक्षा की है और यही पैराग्राफ कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार भी है.' आगे वो 786वें पैराग्राफ में लिखी बातों को विस्तार से बताते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक प्रभाकर मिश्रा अपनी किताब के साथ

'एक रुका हुआ फैसला : अयोध्या विवाद के आखिरी चालीस दिन' (Ek Ruka Hua Faisla: Ayodhya Vivaad Ke Aakhiri Chalees Din) किताब में अयोध्या में 1992 से पहले हुए एक दंगे का भी जिक्र किया गया है जिसे कोर्ट ने अपने फैसले में शामिल किया है. किताब के मुताबिक, 'फैसले में लिखा है कि 1856-57 में अयोध्या में दंगे हुए जिसमें जान-माल का नुकसान भी हुआ था. जब ब्रिटिश शासकों ने दोनों सम्प्रदायों के बीच शांति स्थापित करने के लिए उस स्थान पर रेलिंग लगवाई थी. रेलिंग के अंदर का हिस्सा मुसलमानों के लिए था और बाहरी हिस्सा हिन्दुओं की पूजा के लिए. यह रेलिंग सिर्फ शांति स्थापना के लिए थी.'

प्रभाकर मिश्र फैसले के आधार पर आगे लिखते हैं कि रेलिंग के बाद भी दोनों समुदायों की तरफ से कई केस दर्ज कराए गए. ''उनमें से एक मामला निहंग सिंह का था जिसने मस्जिद के भीतरी हिस्से में घुसकर एक चबूतरा बनाकर वहां भगवान की मूर्ति रखकर पूजा पाठ करना शुरू कर दिया था. मस्जिद की भीतरी दीवारों पर कोयले से चारों तरफ 'राम राम' लिख दिया गया.'' 

इस पुस्तक में मिश्र ने फैसले से जुड़ी कई अन्य दिलचस्प बातों का वर्णन भी किया है, जैसे सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर इस मामले में फैसला सुनाया और फैसले के बाद किसने फाइव स्टार होटल में पार्टी दी और किन लोगों को दी, फैसले की सुनवाई के दौरान 'हिंदू तालिबान' की चर्चा क्यों हुई. गहन शोध के साथ लिखी गई इस पुस्तक में ऐसी तमाम बातों का जिक्र मिलता है. इस किताब आम आदमी को सुप्रीम कोर्ट के 929 पन्नों के फैसले को समझने में काफी मदद मिल सकती है.

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पुस्तक: एक रुका हुआ फैसला : अयोध्या विवाद के आखिरी चालीस दिन
लेखक: प्रभाकर कुमार मिश्र
विधा:  राजनीतिक इतिहास
भाषा: हिंदी
प्रकाशक: पेंगुइन
मूल्य: 250 रुपए
पृष्ठ संख्या: 184

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