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जयंती विशेषः रबींद्रनाथ ठाकुर की प्रेम कविताएं, गर्मी की रातों में जैसे रहता है पूर्णिमा का चांद

रबींद्रनाथ ठाकुर की गिनती संसार के श्रेष्ठतम गीति-कवियों में होती है. धरती को इतने प्राण-पण से प्यार करनेवाला कोई दूसरा कवि शायद कभी नहीं हुआ.

रबींद्रनाथ ठाकुर और जवाहर लाल नेहरूः साहित्य और सियासत के दो बेशकीमती नगीने एक साथ [फाइल फोटो ] रबींद्रनाथ ठाकुर और जवाहर लाल नेहरूः साहित्य और सियासत के दो बेशकीमती नगीने एक साथ [फाइल फोटो ]

गुरुदेव रबींद्रनाथ ठाकुर की जयंती मई के पहले पखवारे में पड़ती है. यह आश्चर्य की बात है कि देश के इस महान मानवतावादी विचारक, साहित्य, संगीत, कला और शिक्षा क्षेत्र की अनूठी प्रतिभा के जन्मदिन को लेकर कोई एक तिथि अब तक निर्धारित नहीं की जा सकी है. कहीं यह 6 मई, कहीं 7 मई और कहीं 9 मई को मनाई जाती है. पर साल को लेकर कोई भ्रम नहीं है. रबींद्रनाथ ठाकुर 1861 में कलकत्ता, अब कोलकाता के एक बेहद रईस परिवार में पैदा हुए. पिता देबेन्‍द्रनाथ ठाकुर ब्रह्म समाज के संस्थापकों में से एक थे.

रबींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी. इतना ही नहीं जब वह केवल सोलह साल के थे, तब सन् 1877 में उनकी प्रथम लघुकथा प्रकाशित हुई थी. वह भारत ही नहीं एशिया के पहले ऐसे व्‍यक्ति थे, जिन्‍हें प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया. साहित्य के क्षेत्र में इस महाद्वीप का तो यह पहला नोबेल था ही. खास बात यह कि गुरुदेव रबींद्रनाथ ठाकुर ने सीधे नोबेल पुरस्कार स्वीकार नहीं किया था. उनकी ओर से ब्रिटेन के एक राजदूत ने यह पुरस्कार लेकर उन्हें सौंपा. रबींद्रनाथ ठाकुर की गिनती संसार के श्रेष्ठतम गीति-कवियों में होती है. धरती को इतने प्राण-पण से प्यार करनेवाला कोई दूसरा कवि शायद कभी नहीं हुआ. इसीलिए साहित्य आजतक पर पढ़िए गुरुदेव की चुनिंदा श्रेष्ठ प्रेम कविताएं. एक कविता समुद्र पर भी है.

प्रेम -1

अगर प्‍यार में और कुछ नहीं
केवल दर्द है, फिर क्‍यों है यह प्‍यार ?
कैसी मूर्खता है यह
कि चूँकि हमने उसे अपना दिल दे दिया
इसलिए उसके दिल पर
दावा बनता है, हमारा भी
रक्‍त में जलती इच्‍छाओं और आँखों में
चमकते पागलपन के साथ
मरूथलों का यह बारंबार चक्‍कर, क्‍यों कर ?

दुनिया में और कोई आकर्षण नहीं उसके लिए
उसकी तरह मन का मालिक कौन है;
वसंत की मीठी हवाएँ उसके लिए हैं;
फूल, पंक्षियों का कलरव सब कुछ
उसके लिए है
पर प्‍यार आता है
अपनी सर्वग्रासी छायाओं के साथ
पूरी दुनिया का सर्वनाश करता
जीवन और यौवन पर ग्रहण लगाता

फिर भी न जाने क्‍यों हमें
अस्तित्‍व को निगलते इस कोहरे की
तलाश रहती है ?
***

प्रेम -दो

गर्मी की रातों में
जैसे रहता है पूर्णिमा का चांद
तुम मेरे हृदय की शांति में निवास करोगी
आश्‍चर्य में डूबे मुझ पर
तुम्‍हारी उदास आंखें
निगाह रखेंगी
तुम्‍हारे घूंघट की छाया
मेरे हृदय पर टिकी रहेगी
गर्मी की रातों में पूरे चांद की तरह खिलती
तुम्‍हारी सांसें, उन्‍हें सुगंधित बनातीं
मेरे स्‍वप्‍नों का पीछा करेंगी.
***

प्रेम - तीन

मेरे प्‍यार की ख़ुशबू
वसंत के फूलों-सी
चारों ओर उठ रही है.
यह पुरानी धुनों की
याद दिला रही है
अचानक मेरे हृदय में
इच्‍छाओं की हरी पत्तियाँ
उगने लगी हैं...

मेरा प्‍यार पास नहीं है
पर उसके स्‍पर्श मेरे केशों पर हैं
और उसकी आवाज़ अप्रैल के
सुहावने मैदानों से फुसफुसाती आ रही है.
उसकी एकटक निगाह यहाँ के
आसमानों से मुझे देख रही है
पर उसकी आँखें कहाँ हैं
उसके चुंबन हवाओं में हैं
पर उसके होंठ कहाँ हैं ...
***

प्रेम - चार

रास्‍ते में जब हमारी आँखें मिलती हैं
मैं सोचता हूँ मुझे उसे कुछ कहना था...
पर वह गुज़र जाती है
और हर लहर पर बारंबार टकराती
एक नौका की तरह
मुझे कंपाती रहती है-
वह बात जो
मुझे उससे कहनी थी...
यह पतझड़ में बादलों की अंतहीन तलाश
की तरह है या संध्‍या में खिले फूलों-से
सूर्यास्‍त में अपनी खुशबू खोना है

जुगनू की तरह मेरे हृदय में
भुकभुकाती रहती है
निराशा के झुटपुटे में अपना अर्थ तलाशती-
वह बात जो मुझे उसे बतानी थी...
***

कविता- 5
समुद्र के लिए

वे तुम्‍हें
संपदा का समुद्र कहते हैं
कि तुम्‍हारी अंधेरी गहराईयों में
मोतियों और रत्‍नों का खजाना है, अंतहीन।

बहुत से समुद्री गोताखोर
वह खजाना ढूंढ रहे हैं
पर उनकी खोजबीन में मेरी रूचि नहीं है

तुम्‍हारी सतह पर कांपती रोशनी
तुम्‍हारे हृदय में कांपते रहस्‍य
तुम्‍हारी लहरों का पागल बनाता संगीत
तुम्‍हारी नृत्‍य करती फेनराशि
ये सब काफी हैं मेरे लिए

अगर कभी इस सबसे मैं थक गया
तो मैं तुम्‍हारे अथाह अंतस्‍थल में
समा जाउंगा
वहां जहां मृत्‍यु होगी
या होगा वह खजाना. (सौजन्यः कविता कोश)

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