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स्लो स्पीड से जिंदगी गुजारने की दौड़ से क्यों बाहर हो रहे सभी आयु वर्ग के भारतीय?

कुछ न करने की कला, यहां तक ​​कि भारत में भी ज्यादा ध्यान खींच रही है, क्योंकि लोग अपनी तेज-रफ्तार जिंदगी से बचने की कोशिश कर रहे हैं.

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स्लो लाइफ (फाइल फोटो)
स्लो लाइफ (फाइल फोटो)

साइकोलॉजिस्ट पूजा वेगेस्ना (Pooja Vegesna), जब आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अपने दादा-दादी के घर चली गईं, तो उनका एक ही मकसद था: अपने दादा-दादी के जीने के तरीके की तारीफ करना और अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए उनके सफर को दर्ज करना. उनके दादा-दादी, जो व्यस्त और गतिशील मेट्रो शहरों से दूर एक साधारण जिंदगी गुजारते थे, अब एक 'धीमी जिंदगी' जी रहे हैं और वह भी एक ऐसी जिदगी जीने की कोशिश कर रही हैं, जिसमें खुद से खाना बनाना, प्रकृति से जुड़ना और आध्यात्मिक होना शामिल है.

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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पूजा अकेली नहीं हैं. हाल ही में, पूजा की तरह सभी पीढ़ियों के कई भारतीय- जेन जेड, मिलेनियल्स, बूमर्स या जेन एक्स, जिंदगी के तरीके को बदल रहे हैं. यह बदलाव सोशल मीडिया, फैशन, रिश्तों या यात्रा के तमाम रुझानों में स्पष्ट है.

कुछ न करने की कला

हड़बड़ी. हफ्ते में 70 घंटे. 75 घंटे कड़ी मेहनत. अगर भारतीयों का एक ग्रुप है, जो दिन में 18 घंटे काम करना पसंद करता है, तो वहीं लोगों का एक और ग्रुप है जो नियमित 9 से 5 या अपनी भाग-दौड़ भरी जिंदगी को छोड़कर धीमी, टिकाऊ जिंदगी अपना रहा है. 

भारतीय अरबपति बिजनेसमेन और टेक कंपनी जोहो (Zoho) के संस्थापक श्रीधर वेम्बू इसका एक जाना-माना उदाहरण हैं. साल 2019 में, वे अमेरिका में अपनी हाई-प्रोफाइल नौकरी छोड़कर तमिलनाडु के तेनकासी जिले के एक गांव में चले गए. उन्होंने महानगर के बजाय मथालमपराई गांव में एक फैक्ट्री को अपना ऑफिस बनाया. NBT के मुताबिक, ज़ोहो कॉर्पोरेशन का रेवेन्यू 2022 तक 8,300 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया था और श्रीधर एक सफल टेक कंपनी चलाते हुए गांव के जीवन की शांति का आनंद ले रहे हैं.

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मानसिक स्वास्थ्य और संबंध विशेषज्ञ, ऑन्टोलॉजिस्ट, आश्मीन मुंजाल कहती हैं, "लोगों की पसंद की लाइफ स्टाइल में अहम बदलाव आया है. गतिशील और तनावपूर्ण जिंदगी से हटकर, लोग धीमी गति से जीने की ओर बढ़ रहे हैं."

स्लो मीडिया

सिद्धाश्रम, हिमालय में एक रहस्यमय और गुप्त भूमि है, जिसे हिंदू योगियों के लिए विश्राम स्थल माना जाता है. हालांकि, हिमालय में धीमी गति से जीवन जीने की अवधारणा सिर्फ हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है. इस इलाके में कई जगहें बौद्ध, जैन, सिख और मुसलमानों के लिए भी धार्मिक अहमियत रखती हैं. हाल ही में, जीवनशैली के रूप में धीमी गति से जीवन जीने ने कई लोगों की रुचि को बढ़ाया है.

मौजूदा वक्त में सोशल मीडिया ऐसे रुझानों से भरा पड़ा है, जो धीमी गति से जीने के सिद्धांतों को दर्शाते हैं.  चेरी सिन, अपनी स्लो लाइफ की वजह से सोशल मीडिया पर तेजी से मशहूर हुए. इंस्टाग्राम पर सिर्फ 581 पोस्ट के साथ, उनके 3.5 मिलियन से ज्यादा फलोअर्स हैं. 

slow life
स्लो ट्रेवेल (तस्वीर: Unsplash)

ट्रैवल कंपनी Agoda द्वारा हाल ही में की गई एक स्टडी से पता चला है कि भारतीय अहमदाबाद, गोवा और अयोध्या जैसी जगहों को एक्सप्लोर करना पसंद कर रहे हैं. Agoda में भारत और मालदीव के सीनियर कंट्री डायरेक्टर, कृष्णा राठी ने कहा, "धीमी गति से सफर आधुनिक यात्रियों के साथ गहराई से जुड़ा रहा है. ऐसी दुनिया में जहां जीवन तेजी से आगे बढ़ता है, धीमी गति से चलने और किसी गंतव्य से वास्तव में जुड़ने का मौका अमूल्य है."

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क्या कहते हैं आंकड़े?

भारत में सस्टेनेबल फैशन मार्केट 2021 से 2026 तक 10.6 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ लगातार बढ़ रहा है. निकोबार, ओखाई, इलामरा और अन्य जैसे इंडियन फैशन ब्रांड, रुझानों के निरंतर चक्र से दूर जाकर एक जगह बना रहे हैं. ऐसा ही एक नाम है, सब्यसाची मुखर्जी जो अक्सर भारतीय शिल्प की वकालत करते हैं और उनके कपड़े भी इसी बात की ओर इशारा करते हैं. 

Business Today के लिए लिखे एक आर्टिकल में वो लिखते हैं, "मैं बिना किसी हिचकिचाहट के कह सकता हूं कि भारतीय शिल्प कौशल अद्वितीय है. हमारे पास सस्ते कौशल नहीं हैं, बल्कि सस्ते श्रम हैं, जो संकीर्ण सोच वाले व्यापारिक निर्णयों के कारण सस्ते उत्पाद बनाते हैं."

वे आगे लिखते हैं, "कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं बहुत बढ़िया हैं, लेकिन कुछ चुनिंदा देशों के पास शिल्प और संस्कृति है. हो सकता है कि आज चीन ऐसी चीजें कर सकता है, जो भारत नहीं कर सकता. फिर भी, शिल्प के जरिए भारत को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ है. हमने अपने पारंपरिक कौशल को संरक्षित और सम्मानित किया है, जिससे उनकी निरंतरता सुनिश्चित हुई है. जब शिल्प और संस्कृति एक पीढ़ी को छोड़ देते हैं, तो वे कभी वापस नहीं आते. जब भारत 100 साल का हो जाएगा, तब विलासिता की वस्तुओं की मांग शिल्प और प्रामाणिकता से प्रेरित होगी."

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भारत में टिकाऊ फैशन को समर्थन देने वाले बहुत सारे थ्रिफ्ट स्टोर खुल रहे हैं. (तस्वीर: Unsplash)

परिधान और फुटवियर ब्रांड पब्लिक डिजायर के विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि स्लो फैशन के मामले में भारत विश्व स्तर पर नौवें स्थान पर है, जहां 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर या मार्केट का 8.491 फीसदी हिस्सा टिकाऊ फैशन के लिए समर्पित है.

स्लो स्पीड जिंदगी क्यों अहम है? 

मनोवैज्ञानिक और फ्रीडम फ्रॉम डायबिटीज के आंतरिक ट्रांस्फॉर्मेशन डिपार्टमेंट की प्रबंधक, डॉ. मयूरिका दास बिस्वास बताती हैं, "तेज गति से चलने वाली जिंदगी अक्सर कई शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की ओर ले जाती है. यह कम फायदेमंद होता है क्योंकि जीवन की गुणवत्ता कम हो जाती है, जिससे अनुभव कम संतोषजनक लगते हैं. भले ही दोस्त आस-पास रहते हों, लेकिन व्यस्त शेड्यूल के कारण उनसे जुड़ना और उनसे मिलना-जुलना मुश्किल हो सकता है. नतीजतन, कई लोगों को लगता है कि स्लो स्पीड की जिंदगी उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ है और लंबे, अधिक संतोषजनक जीवन के लिए जरूरी है," 

स्लो स्पीड की जिंदगी कैसे गुजारें?

अगर स्लो स्पीड लाइफ आजमाना चाहते हैं, तो आश्मीन मुंजाल जैसे एक्सपर्ट सुझाव देते हैं कि शुरुआत करने के लिए आपको बहुत ज्यादा बदलाव करने की जरूरत नहीं है.

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  • आश्मीन के मुताबिक, पहला कदम जिंदगी के उन पहलुओं की पहचान करना और उन्हें प्राथमिकता देना है, जो आपके लिए सबसे जरूरी हैं. अपनी ऊर्जा को गैर-जरूरी चीजों पर बर्बाद न करें. अपनी जिम्मेदारियों और गतिविधियों को कम करके अपने शेड्यूल को सरल बनाएं और आप धीरे-धीरे जीना शुरू कर सकते हैं.
  • माइंडफुलनेस का अभ्यास करें और अपने दिमाग और आत्मा को आराम देने के लिए नियमित रूप से अनप्लग करें. यह आपको मौजूदा वक्त का आनंद लेने और उस पल में रहने में मदद करेगा.
  • वह यह भी कहती हैं कि शहरों से दूर जाने के बजाय, उन लोगों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं. जिनके साथ आप वाकई रहना चाहते हैं.
  • वह कहती हैं, "अपनी जिंदगी के हर छोटे पल की हमेशा सराहना करना याद रखें, चाहे आपका वातावरण कैसा भी हो." 
  • डॉ. बिस्वास का सुझाव है कि छोटे शहर में स्थानांतरित होने से सफर का वक्त कम हो जाता है, जिससे आपको आराम करने, खुद में सुधार लाने या नींद पूरी करने के लिए हर दिन 2-3 घंटे एक्स्ट्रा मिल जाते हैं. 
  • वो आगे कहती हैं कि अगर जगह बदलना संभव नहीं है, तो घर से काम करने या सप्ताह में कुछ दिन दूर से काम करने पर विचार करें. इससे आपको सफर में बिताए गए अहम वक्त को वापस पाने में मदद मिल सकती है.
  • डॉ. बिस्वास के मुताबिक, खुद की देखभाल को प्राथमिकता देना भी अहम है. याद रखें कि ये कदम तब और भी अहम हो जाते हैं, जब आपकी नौकरी आपको 'धीमी गति से जीने' का वक्त नहीं देती.
  • वो कहती हैं, "हर दिन व्यायाम, योग और ध्यान के लिए वक्त निकालें, जो स्वाभाविक रूप से आपकी गति को धीमा कर सकता है और आपको उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है जो वास्तव में मायने रखती हैं."
     
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(रिपोर्ट- दृष्टि शर्मा)
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