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ना खुशहाली, ना संपन्नता... बीमारियों की पोटली है मोटापा और बाहर निकलती तोंद, अंगों करती है खोखला

क्या आप भी निकली हुई तोंद को खाते-पीते घर की निशानी मानते हैं तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं. बढ़ा हुआ पेट आपके महत्वपूर्ण अंगों पर दबाव डालकर डायबिटीज और हार्ट अटैक जैसी जानलेवा बीमारियों को दावत देता है.

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पेट की चर्बी बीमारियों की निशानी (Photo: ITG)
पेट की चर्बी बीमारियों की निशानी (Photo: ITG)

भारत में पुराने समय से लेकर आजतक निकले हुए पेट यानी तोंद को समृद्धि और संपन्नता से जोड़कर देखा जाता है. बड़े-बुजुर्ग इसे खाते पीते घर की निशानी कहकर गर्व महसूस करते रहे हैं. लेकिन विज्ञान की नजर में यह निकला हुआ पेट कोई स्टेटस सिंबल नहीं बल्कि शरीर के अंदर पनप रही बीमारियों की एक पोटली है.

स्टेटस सिंबल या साइलेंट किलर ?

लगातार बाहर निकलता पेट विसरल फैट (आंतरिक अंगों के आसपास चर्बी) नामक कंडीशन है जो डायबिटीज, दिल के रोग और हाई ब्लड प्रेशर का कारण बन सकती है. रिसर्च बताती हैं कि भारतीयों में विसरल फैट यानी अंगों के आसपास जमा चर्बी, जेनेटिक और डाइट संबंधी कारणों से ज्यादा होती है. 

भारतीय फिल्मों में भी तोंद को आलसी या भ्रष्ट पुलिस वाले के तौर पर दिखाया जाता है जबकि कार्टूनों में नेताओं का मजाक उड़ाने के लिए मोटे पेट का खूब इस्तेमाल होता रहा है. लेकिन जिसे कभी नजरअंदाज किया जाता था, या ज्यादातर सेलिब्रेट किया जाता था, वही मोटी तोंद अब खतरे की घंटी बजा रही है. वास्तव में स्टेटस सिंबल मानी जाने वाली तोंद हमारी सोच से कहीं ज्यादा बड़ी विलेन हो सकती है.

मोटापे के मामले में टॉप देशों में शामिल है भारत

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रिपोर्ट के अनुसार, भारत में साल 2021 में अधिक वजन वाले या मोटापे से ग्रस्त वयस्कों की संख्या दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा थी, जहां 18 करोड़ लोग इससे प्रभावित थे. लैंसेट की एक नई रिपोर्ट चेतावनी देती है कि साल 2050 तक यह संख्या बढ़कर 45 करोड़ तक पहुंच सकती है जो कि देश की अनुमानित आबादी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा होगा.

वैश्विक स्तर पर भी हालात चिंताजनक हैं. माना जा रहा है कि तब तक दुनिया के आधे से अधिक वयस्क और एक-तिहाई बच्चे और किशोर भी मोटापे की इसी समस्या का सामना कर रहे होंगे.

इसे कम करने के लिए जंक फूड छोड़ें, फाइबर से भरपूर आहार लें, सुबह गुनगुना नींबू पानी पिएं और रोजाना तेज चलने या कार्डियो जैसे व्यायाम करें. 

भारत में मोटापे की इस समस्या की मुख्य जड़ तोंद है जिसे डॉक्टरी भाषा में 'एब्डोमिनल ओबेसिटी' (Abdominal Obesity) यानी पेट का मोटापा कहा जाता है.

मोटापे का यह रूप मुख्य रूप से पेट के चारों ओर जमा होने वाली अतिरिक्त चर्बी को दर्शाता है. डॉक्टरों का कहना है कि यह केवल दिखने में खराब नहीं लगता, बल्कि यह सुंदरता से कहीं बड़ी चिंता का विषय है. 1990 के दशक से ही कई शोध यह साफ कर चुके हैं कि पेट की चर्बी और टाइप 2 डायबिटीजदिल की बीमारियों जैसी गंभीर समस्याओं के बीच एक सीधा और गहरा संबंध है. 

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आखिर पेट की चर्बी इतनी बड़ी समस्या क्यों है?

इसकी एक प्रमुख वजह है 'इंसुलिन रेजिस्टेंस'. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हमारा शरीर इंसुलिन हार्मोन के प्रति सही तरीके से प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है. इंसुलिन वही हार्मोन है जो ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करता है. पेट की चर्बी इंसुलिन के काम करने के तरीके में बाधा डालती है जिससे ब्लड शुगर को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है.

शोधों से पता चला है कि भारतीयों सहित दक्षिण एशियाई लोगों और पश्चिमी देशों के लोगों के बीच तुलना की जाए तो एक समान BMI (Body Mass Index) होने के बावजूद भारतीयों के शरीर में श्वेत लोगों की तुलना में फैट की मात्रा अधिक होती है. 

यहां मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि आपके शरीर में कितना फैट है बल्कि यह है कि वह फैट कहां जमा हो रहा है. दक्षिण एशियाई लोगों में फैट अक्सर धड़ के आसपास और त्वचा के ठीक नीचे जमा होता है.

हालांकि, कुछ मामलों में दक्षिण एशियाई लोगों में अंगों (जैसे लिवर और पैन्क्रियाज) के आसपास जमा होने वाला जिद्दी विसरल फैट कम हो सकता है लेकिन अध्ययन बताते हैं कि उनकी फैट कोशिकाएं आकार में बड़ी और कम कुशल होती हैं. इस कारण वो त्वचा के नीचे फैट को सही ढंग से स्टोर नहीं कर पातीं. नतीजा यह होता है कि एक्स्ट्रा फैट रिसते हुए उन महत्वपूर्ण अंगों में चला जाता है जो मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करते हैं. जैसे लिवर और पैन्क्रियाज. यही प्रक्रिया डायबिटीज और दिल की बीमारियों के खतरे को तेजी से बढ़ा देती है.

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आखिर किया क्या जाना चाहिए?

विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीयों को पश्चिमी देशों के मानकों के मुकाबले अपनी जीवनशैली में कहीं अधिक कड़े बदलाव करने की जरूरत है. शोध बताते हैं कि जहां यूरोपीय पुरुषों के लिए सप्ताह में 150 मिनट की कसरत पर्याप्त है, वहीं दक्षिण एशियाई लोगों (जैसे भारतीयों) को 250 से 300 मिनट साप्ताहिक व्यायाम की जरूरत होती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीयों का मेटाबॉलिज्म धीमा होता है और हमारा शरीर चर्बी को उतनी कुशलता से स्टोर नहीं कर पाता जिससे बीमारियां जल्दी घेर लेती हैं.

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