सोशल मीडिया और खबरों में आज के समय में अक्सर लग्जरी लाइफस्टाइल, महंगी कारें, बड़े घर और करोड़ों की शादियां देखने को मिलती हैं. आमतौर पर लोग सोचते हैं जो लोग अमीर हैं वो ज्यादा खुश हैं, मॉर्डन वर्ल्ड में यह मान लिया जाता है कि ज्यादा पैसा और ज्यादा सामान ही असली खुशी देता है. मगर इस बात में कितनी सच्चाई है, यह कोई नहीं जानता है. इस बारे में हाल ही में नई स्टडी हुई है, जिसने इस सोच को चुनौती दे दी है.
नई स्टडी में हुआ खुलासा
न्यूजीलैंड की ओटागो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने पाया कि सिंपल लाइफ जीने वाले लोग ज्यादा खुश और संतुष्ट महसूस करते हैं. इस स्टडी में 1,000 से ज्यादा लोगों के डेटा को एनालाइज किया गया, जिनमें पुरुष और महिलाएं लगभग बराबर संख्या में शामिल थे.
रिसर्च में सामने आया कि जो लोग जरूरत से ज्यादा चीजें खरीदने या दिखावे से दूर रहते हैं, वे अपनी जिंदगी से ज्यादा संतुष्ट होते हैं. इस तरह की जिंदगी को वॉलंटरी सिम्प्लिसिटी यानी अपनी इच्छा से सादा जीवन अपनाना कहा जाता है.
रिसर्च के अनुसार, जब लोग कम चीजों में जीना सीखते हैं, तो उनके पास रिश्तों और समाज के लिए ज्यादा समय होता है. वे कम स्ट्रेस महसूस करते हैं और छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढ लेते हैं. उदाहरण के तौर पर, ऐसे लोग कम्युनिटी गार्डन, सामान शेयर करने की अरेंजमेंट और आपसी सहयोग जैसी एक्टिविटी में हिस्सा लेते हैं. इससे उनका सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता है.
स्टडी की सह-लेखिका लीह वॉटकिन्स के मुताबिक, आज की मैटेरियलिस्टिक सोच हमें यह सिखाती है कि ज्यादा पैसा और ज्यादा सामान ही खुशी की कुंजी है. लेकिन हकीकत यह है कि भौतिक चीजें हमें लंबे समय तक खुशी नहीं दे पातीं.
रिसर्च में यह भी पाया गया कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में सादा जीवन ज्यादा अपनाती हैं. हालांकि इसके पीछे के कारण अभी पूरी तरह साफ नहीं हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 से 2019 के बीच दुनिया में रिसोर्सेज की खपत 66 प्रतिशत तक बढ़ी है. बढ़ती खपत का असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है. ऐसे में सिंपल लाइफस्टाइल अपनाना सिर्फ पर्सनल खुशी ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के लिए भी जरूरी है.
प्रोफेसर रॉब एटकन के मुताबिक, सादा जीवन का मतलब यह नहीं है कि आप हर चीज छोड़ दें. असली बात यह है कि खुशी हमें रिश्तों, समाज से जुड़ाव, और जीवन के उद्देश्य से मिलती है न कि महंगी चीजों से.