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35 साल पहले आबकारी कांस्टेबल ली थी 500 रुपये की रिश्वत, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला, अब आया ये फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 1990 के 500 रुपये रिश्वत मामले में उत्तराखंड के एक पूर्व आबकारी कांस्टेबल की सजा बरकरार रखते हुए जेल अवधि कम कर दी है. कोर्ट ने माना कि दोषसिद्धि सही है, लेकिन आरोपी की उम्र 75 वर्ष होने और पहले ही दो महीने से अधिक जेल में रहने को देखते हुए सजा दो साल से घटाकर एक साल कर दी.

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500 रुपये की रिश्वत का मामला (Photo: Screengrab)
500 रुपये की रिश्वत का मामला (Photo: Screengrab)

करीब साढ़े तीन दशक पुराने एक छोटे से रिश्वत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के एक पूर्व आबकारी कांस्टेबल की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, लेकिन उसकी सजा कम कर दी है. शीर्ष अदालत ने माना कि निचली अदालत और हाई कोर्ट का फैसला सही था, हालांकि आरोपी की उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए सजा में राहत दी जा सकती है.

यह मामला 1990 का है जब एक पूर्व आबकारी कांस्टेबल को 500 रुपये रिश्वत लेते हुए ट्रैप कार्रवाई के दौरान पकड़ा गया था. इस घटना के बाद उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी.

मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस पी बी वराले की पीठ कर रही थी. अदालत पूर्व कांस्टेबल की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उसने उत्तराखंड हाई कोर्ट के 2012 के आदेश को चुनौती दी थी. हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी थी.

35 साल पुराने 500 रुपये रिश्वत मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

ट्रायल कोर्ट ने 2006 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. बाद में जब आरोपी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी तो वहां से भी उसे राहत नहीं मिली. हाई कोर्ट ने 2012 में ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए उसकी अपील खारिज कर दी थी.

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इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैसले के खिलाफ अपील दायर की. सुप्रीम कोर्ट में यह मामला कई सालों तक लंबित रहा. इस दौरान आरोपी जनवरी 2013 से जमानत पर बाहर था.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 13 मार्च के आदेश में कहा कि हाई कोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है. अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी की दोषसिद्धि सही है और इसे बदला नहीं जा सकता.

ट्रैप कार्रवाई में 1990 में पकड़ा गया था आबकारी कांस्टेबल

हालांकि अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी की उम्र अब 75 साल हो चुकी है और वह पहले ही दो महीने से अधिक समय जेल में बिता चुका है. इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने सजा की अवधि में संशोधन करने का फैसला किया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा दी गई सजा को न्यूनतम सजा तक सीमित किया जा सकता है. इसके बाद अदालत ने आरोपी की सजा दो साल से घटाकर एक साल कर दी.

इस मामले की शुरुआत 19 जून 1990 को हुई थी जब आरोपी को 500 रुपये रिश्वत लेते हुए ट्रैप कार्रवाई में पकड़ा गया था. इसके बाद अगले वर्ष इस मामले को सेशन कोर्ट को सौंप दिया गया था. लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद सेशन कोर्ट ने 2006 में आरोपी को दोषी ठहराया था.

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75 साल की उम्र और दो महीने जेल काटने को देखते हुए राहत

इस तरह करीब 35 साल पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ एक लंबी कानूनी प्रक्रिया का अंत हो गया. अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में आंशिक राहत दी है.

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