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सबरीमाला केसः तीन दिन सुनवाई में भोग-प्रसाद से परंपरा तक, दी गईं दलीलें जानिए

सबरीमाला मामले की सुनवाई सीजेआई की अगुवाई वाली संविधान पीठ कर रही है. तीन दिन की सुनवाई के दौरान अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से लगायत तमाम मंदिरों की परंपराओं का भी उल्लेख हुआ.

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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का मामला (Photo: PTI)
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का मामला (Photo: PTI)

केरल के सबरीमाला की पहाड़ी पर स्थित भगवान अय्यप्पा स्वामी के मंदिर यानी सबरीमाला मंदिर में खास उम्र वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक है. इससे जुड़े विवाद और इसे लेकर उपजे संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संविधान पीठ सुनवाई कर रही है. तीन दिन की सुनवाई पूरी हो चुकी है और चोथे दिन की सुनवाई 14 अप्रैल को होनी है. शुरुआती तीन दिनों की सुनवाई में संविधान पीठ ने कानूनी पेच से जुड़े कई सवाल किए.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली संविधान पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्नता बी वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं. तीसरे दिन की सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि देश में ऐसे कई मंदिर हैं, जहां गर्भगृह या मुख्य मंदिर में पुरुषों को जाने की इजाज़त नहीं है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह मंदिर देवी भगवती के हैं.

उन्होंने तर्क दिया कि इससे कुछ खास धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. सुनवाई के दौरान दलील यह भी दी गई कि कुछ मंदिर ऐसे हैं, जहां पुरुष पुजारियों को धार्मिक तौर पर महिला भक्तों के पैर धोने का अधिकार है. पुष्कर मंदिर जैसे मंदिर भी हैं. यह देश में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का इकलौता  मंदिर है. यहां विवाहित पुरुषों को जाने की इजाज़त नहीं है. केरल में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां रिवाज है कि मर्द औरतों के कपड़े पहनकर अंदर जाते हैं. वह ब्यूटी पार्लर जाते हैं और वहां से सज-धज कर आते हैं. उनके परिवार की महिला सदस्य ही उन्हें साड़ी और दूसरे कपड़े पहनने में मदद करती हैं. वहां सिर्फ़ पुरुष ही जाते हैं, लेकिन महिला बनकर.

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तर्क दिया गया कि यह पुरुषों या महिलाओं पर आधारित धार्मिक मान्यताओं का सवाल नहीं है, लेकिन इस मामले में मुद्दा खास उम्र वर्ग की महिलाओं पर आधारित है. असिस्टेंट सॉलिसीटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज ने कहा कि संविधान के तहत धार्मिक अधिकार अनुच्छेद 25 और 26 के तहत अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं. इन्हीं से ये रेगुलेट भी किए जाते हैं. इन अधिकारों को सुरक्षित रखने, जोड़ने और रेगुलेट करने के लिए तीन-लेवल का सिस्टम है. आर्टिकल 25(1) का पहला हिस्सा एक व्यक्ति के अधिकार की गारंटी देता है. दूसरा हिस्सा, आर्टिकल 25(2), रेगुलेटरी सिस्टम देता है. आर्टिकल 26 इंस्टीट्यूशनल अधिकारों से जुड़ा है.

दलील दी गई कि आर्टिकल 25(1) और 26 आपस में जुड़े हुए हैं. आर्टिकल 26, आर्टिकल 25 में शामिल है और इसका उल्टा भी. जब आर्टिकल 26 लागू होता है, तो यह असल में आर्टिकल 25(1) से जुड़ जाता है. इसलिए, आर्टिकल 25 और 26 आपस में जुड़े हुए सिस्टम बनाते हैं. आर्टिकल 25(1) के तहत लोगों को अधिकार देते हैं और आर्टिकल 26 के तहत इंस्टीट्यूशनल अधिकार देते हैं. किसी की आस्था है, तो उसे अनुच्छेद 26 के तहत अधिकार है. किसी के पास कोई आस्था नहीं है, तो एक गैर-आस्तिक के रूप में उसे अनुच्छेद 26 के तहत कोई अधिकार नहीं है. अनुच्छेद 26 को अनुच्छेद 25(1) से जोड़ा जाना चाहिए.

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एएसजी नटराज ने कहा कि कई मंदिरों में सिर्फ़ शाकाहारी भोग प्रसाद ही परोसा जाता है. कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से या अपने मन से कह सकता है कि वह मांसाहारी खाना चाहता है, लेकिन वह किसी खास संप्रदाय के मंदिर में जाकर यह नहीं कह सकता कि उसे मांसाहारी खाना खाने का अधिकार है और इसलिए उसे यह परोसा जाना चाहिए. उसे उस संप्रदाय या धर्म के मानने वालों के अधिकारों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है. इसी तरह कुछ मंदिरों में शराब प्रसाद के तौर पर दी जाती है. कल, कोई यह कहकर एतराज नहीं कर सकता कि किसी खास मंदिर में शराब तीर्थ या प्रसाद के तौर पर नहीं दी जानी चाहिए.

किसी मंदिर जाते हैं, तो उस संप्रदाय को मानना होगा- वैद्यनाथन

सीनियर एडवोकेट सीएस वैद्यनाथन ने दलील दी कि हमारे यहां पोप, आर्कबिशप या बिशप का कोई सिस्टम नहीं है. हमारे यहां उस तरह का चर्च का ढांचा नहीं है. लेकिन अगर हिंदू किसी खास मंदिर में जाना चाहते हैं, तो उस मंदिर से जुड़े संप्रदाय को मानना ​​होगा. अब, अयप्पा का मामला ही ले लीजिए. हमारे यहां ऐसा कोई सख्त सिस्टम नहीं है. सभी हिंदू हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सबरीमाला में कोई फर्क नहीं किया जाता. ईसाइयों या मुसलमानों के आने पर कोई रोक नहीं है. वे भी जा सकते हैं, लेकिन उन्हें अयप्पा की दिव्यता में आस्था और विश्वास होना चाहिए. इसलिए भक्तों को 40-दिन का व्रतम यानी माला लेनी होती है. ब्रह्मचर्य का पालन, स्वपाकी भोजन, भूमि पर शयन और बिना जूते चप्पल के नंगे पैर रहना होता है.

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उन्होंने कहा कि जो भी रीति-रिवाज श्रद्धावान भक्तों के लिए बताए गए हैं, उन्हें मानना ​​होता है. यह व्रतम पूरा होने पर सबरीमाला के तीर्थाटन पर जाना होता है. किसी को भी इससे मना नहीं किया गया है, लेकिन बदकिस्मती से इस कॉन्सेप्ट को ठीक से नहीं समझा गया है. यह जरूरी नहीं है कि किसी धार्मिक पंथ का मतलब यह हो कि कोई व्यक्ति किसी खास धर्म से जुड़ा हो और वह उस धर्म की कोई ब्रांच या सब-ब्रांच हो. यह एक गलत समझ है. आप एक संप्रदाय से जुड़े हो सकते हैं या एक मठ को मानते हो सकते हैं, लेकिन आपको दूसरे मठ या दूसरे संप्रदाय के मंदिर में जाने से कोई नहीं रोक सकता.

सीनियर एडवोकेट वैद्यनाथन ने दिया गुरुवायुर मंदिर का उदाहरण

सीनियर एडवोकेट वैद्यनाथन ने कहा कि आपको उस संप्रदाय का सम्मान करना होगा. आर्टिकल 25 के तहत, आपकी अपनी मान्यता हो सकती है. आप उसके हकदार हैं, लेकिन अगर आप किसी खास संप्रदाय से जुड़े मंदिर या संस्था में जाना चाहते हैं तो आपको उस संप्रदाय में आस्था रखनी होगी, उसके तौर-तरीकों को मानना ​​होगा. सीजेाई सूर्यकांत ने कहा कि गुरुवायूर मंदिर में हमें अपनी शर्ट उतारनी पड़ती है. अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हमें अपना सिर ढंकना पड़ता है. ऐसे कई मंदिर हैं.

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जस्टिस नागरत्ना ने एडवोकेट सी एस वैद्यनाथन से कहा कि सबरीमाला विवाद को अगर अलग रखा जाए, तो आप कहते हैं कि सिर्फ़ एक खास ग्रुप के लोगों को ही इजाजत होनी चाहिए. सिर्फ़ उनको ही यहां आना चाहिए, जो उस विशेष मत को मानते हैं। यानी सांख्य दर्शन के मानने वालों को सिर्फ़ सांख्य मठों में जाना चाहिए. सांख्य के अनुयायियों को श्रृंगेरी नहीं जाना चाहिए. श्रृंगेरी के मानने वालों को कहीं और नहीं जाना चाहिए, तो यह असलियत नहीं है. ऐसा नहीं हो सकता. एक विशेष पंथ के लोगों को ही उस विशेष मंदिर में आना चाहिए. किसी और को नहीं. यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है.

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