कर्नाटक विधानसभा में आज केंद्र सरकार के खिलाफ एक कड़ा प्रस्ताव लाया गया. सरकार ने केंद्र के 'विकसित भारत-ग्रामीण रोजगार मिशन (VB-GRAM-G) को एकतरफा लागू करने के विरोध में ये कदम उठाया है. सदन का मानना है कि ये फैसला पंचायती राज व्यवस्था और सहकारी संघवाद के सिद्धांतों को नुकसान पहुंचा रहा है.
कर्नाटक सरकार के मुताबिक, केंद्र ने राज्यों से बिना सलाह किए मनरेगा के मूल ढांचे को बदल दिया है, जो ग्रामीण गरीबों की आजीविका पर खतरा है. इस प्रस्ताव के जरिए VB-GRAM-G योजना को वापस लेने की मांग की गई है.
राज्य सरकार ने अपने प्रस्ताव में कहा, 'ये सदन भारत सरकार के लिए गए उन फैसलों पर अपनी गंभीर चिंता जाहिर करता है जो पंचायती राज व्यवस्था और विकेंद्रीकरण के सिद्धांतों पर उलटा प्रभाव डालते हैं, जो भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ हैं. ये सदन मनरेगा को कमजोर करने की कड़ी निंदा करता है, जो ग्रामीण आजीविका की जीवनरेखा और ग्रामीण जीवन का एक अटूट हिस्सा रहा है.'
MNREGA और VB-GRAM-G में अंतर
सदन में रखे गए प्रस्ताव के मुताबिक, 2005 में शुरू हुई मनरेगा ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा की गारंटी थी. मनरेगा के तहत केंद्र सरकार मजदूरों की 100% मजदूरी का खर्च खुद उठाती थी. लेकिन अब केंद्र ने नई शर्त रख दी है कि राज्यों को इस लागत का 40% हिस्से का बोझ उठाना पड़ेगा. VB-GRAM-G 125 दिन काम देने का दावा करती है, लेकिन हकीकत में राज्यों को 50 दिनों की मजदूरी का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है.
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कर्नाटक की वित्तीय चिंताएं
प्रस्ताव में कर्नाटक के साथ हो रहे 'अन्याय' का भी जिक्र है. इसमें दावा किया गया है कि कर्नाटक देश के सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले राज्यों में शामिल है, लेकिन केंद्रीय टैक्स में उसकी हिस्सेदारी लगातार घट रही है. 14वें वित्त आयोग में ये हिस्सा 4.71% था, जो अब घटकर 4.131% रह गया है. सरकार का तर्क है कि जब केंद्र पहले ही राज्य का हिस्सा कम कर चुका है, तो अब VB-GRAM-G के बहाने 40% अतिरिक्त बोझ डालना कर्नाटक के विकास को रोकने जैसा है.
पंचायतों के अधिकारों के हनन का दावा
प्रस्ताव में केंद्र पर आरोप लगाया गया है कि वो दिल्ली में बैठकर योजनाएं बना रहा है, जिससे ग्राम सभाओं और पंचायतों की शक्तियां छीनी जा रही हैं. मनरेगा में काम मांगना मजदूर का कानूनी अधिकार था, लेकिन VB-GRAM-G इसे 'लक्ष्य-आधारित' बनाकर इसे केंद्र के नियंत्रण में ले आई है. अब पंचायतें अपनी जरूरत के हिसाब से काम नहीं चुन पाएंगी.
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सामाजिक और आर्थिक असर
सदन ने चिंता जताई है कि नई योजना साल में सिर्फ 10 महीने काम देती है और इसमें सभी पंचायतों को शामिल करने की गारंटी भी नहीं है. ये महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और छोटे किसानों को आधुनिक बंधुआ मजदूरी की ओर धकेल सकती है.