4 जून 1989 को चीनी सेना ने बीजिंग के केंद्र में स्थित तियानमेन चौक पर धावा बोल दिया. इसमें हजारों लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों को मार डाला गया और गिरफ्तार कर लिया गया. प्रदर्शनकारियों में अधिकतर छात्र-छात्राएं थे. छात्रों पर चीनी सरकार के इस क्रूर हमले ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया. वहीं अमेरिका ने इसकी निंदा करते हुए चीन पर प्रतिबंध लगा दिए.
मई 1989 में, लगभग दस लाख चीनी नागरिक, जिनमें अधिकतर युवा छात्र थे. लोकतंत्र की मांग और दमनकारी माने जाने वाले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के इस्तीफे की मांग को लेकर बीजिंग के तियानमेन चौक पर जमा हो गए. लगभग तीन सप्ताह तक, प्रदर्शनकारियों ने प्रतिदिन धरना दिया, मार्च निकाला और नारे लगाए.
4 जून 1989 को चीनी सेना और सुरक्षा पुलिस ने तियानमेन चौक पर धावा बोल दिया. प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर अंधाधुंध गोलीबारी की. इसके बाद अफरा-तफरी मच गई, क्योंकि हजारों युवा छात्र उत्पात मचा रही चीनी सेना से बचने की कोशिश कर रहे थे. अन्य प्रदर्शनकारियों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए हमलावर सैनिकों पर पत्थर फेंके और सैन्य वाहनों को पलटकर आग लगा दी. सेना ने टैंक भी उतार दिए थे.
चीनी सरकार के इस क्रूर हमले ने उसके सहयोगियों और शीत युद्ध के शत्रुओं दोनों को स्तब्ध कर दिया. सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने चीन में घटी घटनाओं पर दुख व्यक्त किया. उन्होंने आशा जताई कि सरकार उनके अपने घरेलू सुधार कार्यक्रम को अपनाएगी और चीनी राजनीतिक व्यवस्था का लोकतंत्रीकरण शुरू करेगी.
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अमेरिका में मीडिया और कांग्रेस सदस्यों ने तियानमेन स्क्वायर नरसंहार की निंदा की और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से चीनी सरकार पर बैन लगाने का आग्रह किया. इसके तीन सप्ताह से कुछ अधिक समय बाद, अमेरिकी कांग्रेस ने मानवाधिकारों के क्रूर उल्लंघन के जवाब में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए मतदान किया.