भारत, नेपाल, भूटान और चीन के बीच हिमालय की गोद में बसा सिक्किम, कभी एक स्वतंत्र रियासत थी. वहां 'नामग्याल राजवंश' का शासन था. इस राजवंश के 'चोग्याल' यानी 'गॉड किंग' ने तीन शताब्दियों तक सिक्किम पर शासन किया. भारत की स्वतंत्रता के बाद भी दो दशक से अधिक समय तक यह भारत का हिस्सा नहीं था. 1975 में यह भारत का अभिन्न अंग बना. आज सिक्किम भारतीय संघ में शामिल होने की स्वर्ण जयंती का जश्न मना रहा है.
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सिक्किम के स्वर्ण जयंती समारोह को लेकर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए और कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया. ऐसे में सिक्किम भारत में कैसे शामिल हुआ और इसके लिए क्या कुछ करना पड़ा, इसकी कहानी काफी दिलचस्प है.
सिक्किम के भारत में शामिल होने की कहानी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है. 16 मई 1975 को सिक्किम जब आधिकारिक तौर पर भारत का 22वां राज्य बना. उससे पहले वर्षों तक सधी हुई कूटनीति, राजनीतिक उथल-पुथल और आशंकाओं का दौर चलता रहा.
भारत की आजादी के बाद 1950 में एक संधि के तहत सिक्किम एक संरक्षित राज्य बन गया. इस संधि ने नई दिल्ली को रक्षा, विदेश मामले और संचार पर नियंत्रण दिया, जबकि सिक्किम को अपना शासन चलाने की अनुमति दी.सिक्किम एक रणनीतिक जगह पर स्थित है. भारत का हिस्सा बनने से पहले यह संवेदनशील भारत-चीन सीमा पर चीन के खिलाफ एक बफर जोन के तौर पर काम करता था.
इस पुराने राजतंत्र वाले रियासत में नेपाली मूल के बहुसंख्यक लोगों में असंतोष बढ़ रहा था. वे राजशाही की सामंती व्यवस्था और अल्पसंख्यक भूटिया-लेपचा समुदायों के प्रति पक्षपात से नाराज थे. आधुनिक भारत, जिसने कभी भी सैन्य अभियान का सहारा नहीं लिया, सिक्किम को शांतिपूर्वक अपने साथ मिलाने के लिए खुफिया कूटनीति पर भरोसा किया.
तब भारत ने सिक्किम में 27 महीने लंबा एक गुप्त अभियान शुरू किया. इस सीक्रेट ऑपरेशन की बदौलत ही सिक्किम भारत का अहम हिस्सा बना. यह ऑपरेशन भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) का अबतक का सबसे सफल मिशन कहलाता है.
कैसे RAW के एक ऑपरेशन ने सिक्किम को भारत में समेट लिया
सिक्किम के भारत में विलय की कहानी लंबे समय तक राज रही. इसके बारे में पूरी जानकारी पहली बार तब सामने आई, जब रॉ के पूर्व विशेष सचिव जीबीएस सिद्धू ने इस पर एक किताब लिखी.
सिद्धू 1970 के दशक की शुरुआत में सिक्किम की राजधानी गंगटोक में भारत के स्टेशन चीफ थे. अपनी किताब 'सिक्किम: डॉन ऑफ डेमोक्रेसी - द ट्रुथ बिहाइंड द मर्जर विद इंडिया' में सिद्धू ने बताया है कि कैसे भारत की खुफिया एजेंसी ने इस हिमालयी राज्य को भारत संघ में शामिल करने के लिए दो साल से ज्यादा समय तक एक बेहद गोपनीय अभियान चलाया. दिलचस्प बात यह है कि भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) के शीर्ष अधिकारियों को भी RAW के इस ऑपरेशन के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.
रॉ ने एक बेहद सीक्रेट ऑपरेशन शुरू किया, जो 27 महीनों तक चला. इसका मकसद सिक्किम को भारत के 22वें राज्य के रूप में भारत में शामिल करना था. अप्रैल 1975 में, एक जनमत संग्रह के बाद यह मिशन अपने चरम पर पहुंच गया. 14 अप्रैल 1975 को हुए जनमत संग्रह में सिक्किम के मतदाताओं से पूछा गया था कि क्या वे राजशाही को खत्म करके पूरी तरह से भारत में शामिल होना चाहते हैं.
आधिकारिक नतीजों के अनुसार, लगभग 63% मतदान हुआ और 97.55% लोगों ने इसके पक्ष में वोट दिया, जो कि एक ज़बरदस्त समर्थन था. इस परिणाम ने सिक्किम विधानसभा के लिए एक प्रस्ताव पारित करने का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके तहत इस राज्य का भारत में पूर्ण विलय होना था. चीन ने इस जनमत-संग्रह को सिरे से खारिज कर दिया और इसे एक 'ढोंग' तथा एक अवैध कब्जा करार दिया. किंतु भारत ने इस जनमत को निर्णायक मानते हुए अपनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई.
1970 के दशक में सिक्किम और वहां की जियोपॉलिटिक्स
1970 के दशक की शुरुआत भारत के लिए क्षेत्रीय तनाव का एक दौर था. हालांकि, बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में मिली जीत अभी ताजा थी, फिर भी भारत को चीन के साथ सीमा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था. 1962 के युद्ध के जख्म अभी भी भरे नहीं थे. ऐसे में उत्तरी हिमालयी सीमा पर स्थिरता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण था.
यह ऑपरेशन फरवरी 1973 में RAW के फाउंडर और प्रमुख रामेश्वर नाथ काओ ने शुरू किया गया था. यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के उस अनुरोध के बाद शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने सिक्किम को भारत के साथ मिलाने की बात कही थी. सिद्धू, आरएन काओ और ईस्टर्न रीजनल डायरेक्टर पीएन बनर्जी के अंदर गंगटोक में RAW की तीन-सदस्यीय सीक्रेट टीम की अगुआई कर रहे थे. उन्होंने अपनी किताब में इस ऑपरेशन में बरती गई असाधारण गोपनीयता का जिक्र किया है.
सिद्धू ने अपनी किताब में लिखा है - यह ऑपरेशन इतना सीक्रेट था कि सिक्किम को भारत में मिलाने का इसका अंतिम उद्देश्य केवल तीन अधिकारियों को पता था – काओ, बनर्जी और मुझे.
सिद्धू ने 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' को दिए एक इंटरव्यू में कहा था - गंगटोक में विशेष टीम के दो अन्य रॉ अफसर, पदम बहादुर प्रधान और म्यंगमा शेरिंग को ऑपरेशन के अगले चरण के बारे में तभी बताया जाता था, जब एक स्टेज पूरा हो जाता था.
भारत का हिस्सा बनने से पहले सिक्किम
1975 तक, सिक्किम नामग्याल वंश के 12वें और अंतिम शासक, चोग्याल पाल्डेन थोंडुप नामग्याल के अधीन एक भारतीय संरक्षित राज्य के तौर पर था. चोग्याल की अधिक स्वतंत्रता की बढ़ती मांग से नई दिल्ली के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण होने लगे थे. चोग्याल की इस मांग के पीछे उनकी दूसरी अमेरिकी पत्नी, होप कुक का प्रभाव था. उसकी वजह से ही नई दिल्ली के साथ उनके संबंधों में तनाव पैदा हो गया था.
कुक अक्सर चोग्याल को सिक्किम को 'पूरब का स्विट्जरलैंड' बनाने के लिए प्रोत्साहित करती थीं.उसने चोग्याल के पूर्ण संप्रभुता की दिशा में उठाए गए कदमों का समर्थन किया था. इन कदमों में संयुक्त राष्ट्र जैसे इंटरनेशनल बॉडी की संभावित सदस्यता भी शामिल थी.
इस रुख ने भारत को चिंतित कर दिया था. क्योंकि, अगर ऐसा होता तो इससे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस 'बफर ज़ोन' में चीनी प्रभाव के विस्तार की संभावना बढ़ जाती. राज्य की स्थिति नाथू ला जैसे महत्वपूर्ण दर्रों के पास होने के कारण, यह भारत की सीमा सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक था.
पूर्ण संप्रभु अधिकार प्रदान करने से रक्षा और विदेश संबंधों पर भारत का नियंत्रण खत्म खतरे में पड़ सकता था. विशेषकर तिब्बत पर चीन के कब्जे और सीमा पर बार-बार होने वाले तनावों के बाद, हालात चिंताजनक बनते जा रहे थे. भारत ने लंबे समय तक सिक्किम के लोकतंत्र-समर्थक आंदोलनों को सहन किया. साथ ही मोटे तौर पर राजशाही-समर्थक नीति भी बनाए रखी. 1972 के अंत में इस स्थिति में नाटकीय बदलाव आया.
सिद्धू की किताब के मुताबिक, जब चोग्याल ने असहयोगात्मक रवैया अपनाया, तो प्रधानमंत्री गांधी ने इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए काओ और अपने प्रधान सचिव पीएन हक्सर को तलब किया. चोग्याल को भारत के साथ स्थायी जुड़ाव का प्रस्ताव दिया गया था, जिसमें भारत द्वारा सिक्किम को संयुक्त राष्ट्र के कुछ संगठनों में शामिल करवाने की बात भी कही गई थी. लेकिन उन्होंने अपने राज्य के लिए पूर्ण संप्रभु अधिकारों पर जोर दिया. भारत अपनी रणनीतिक जरूरतों के चलते इस मांग को स्वीकार नहीं कर सका.
सितंबर 1972 तक, चोग्याल को एक और अंतिम असफल प्रस्ताव देने के बाद, भारत की नीति में 180 डिग्री का बदलाव आ गया. जब फरवरी 1973 में सिद्धू ने गंगटोक में अपना पदभार संभाला, तब तक राजशाही शासन को समाप्त करने और सिक्किम को भारत में शामिल करने की गुप्त योजना पर काम शुरू हो चुका था.
RAW के ऑपरेशन ने सिक्किम को भारत के साथ कैसे जोड़ा
रॉ का तरीका सीधे दखल देने के बजाय, पहले से मौजूद लोकतंत्र-समर्थक ताकतों को मजबूत करने पर फोकस था. सिद्धू ने बताया कि कैसे रॉ ने राजनीतिक पार्टियों, खासकर सिक्किम नेशनल कांग्रेस (SNC) को, उनके सुधार-समर्थक और राजशाही-विरोधी अभियानों को तेज करने के लिए गुपचुप तरीके से मदद और फंडिंग दी. इन पार्टियों को गुप्त रूप से सलाह दी जाती थी. हालांकि, भारत का अंतिम लक्ष्य ज्यादातर नेताओं को नहीं बताया गया था.
सिद्धू ने अपनी किताब में लिखा - सिर्फ SNC प्रमुख काजी लेंडुप दोरजी को ही भरोसे में लिया गया था, क्योंकि हमें भरोसा था कि वे राज नहीं खोलेंगे. सिद्धू ने अपनी किताब में आगे बताया कि दूसरे राजनेता, जिनमें से कई चोग्याल के बहकावे में थे, उन्हें धीरे-धीरे इस मकसद के लिए अपने साथ मिला लिया गया.
सिद्धू लिखते हैं - जुलाई 1973 में, हमने सिक्किम में चोग्याल-विरोधी और लोकतंत्र-समर्थक राजनीतिक दलों तथा उनके नेताओं, विशेष रूप से काजी लेंडुप दोरजी को समर्थन देने के लिए एक अभियान पहले ही शुरू कर दिया था. ताकि राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों की उनकी इच्छा पूरी की जा सके. इस अभियान का अंतिम रिजल्ट सिक्किम का भारत में विलय होना था. यह अंतिम उद्देश्य विभिन्न चरणों में, संवैधानिक माध्यमों से और जहां तक संभव हो, निर्वाचित नेताओं के लिए जनसमर्थन के द्वारा प्राप्त किया जाना था.
सिक्किम गार्ड्स को निहत्था करने में इंडियन आर्मी की भूमिका
सिक्किम में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन की गति धीरे-धीरे बढ़ती गई. लोकतंत्र-समर्थक आंदोलन ने चोग्याल के अधिकार को कमजोर कर दिया. इससे चुनी हुई विधानसभा को ज्यादा अधिकार मिले और अंततः प्रशासन की बागडोर भारतीय अधिकारियों के हाथों में चली गई.
भारतीय सेना ने केवल एक बार ही इसमें सीधी भूमिका निभाई. अप्रैल 1975 में, विधानसभा द्वारा विलय का अंतिम प्रस्ताव पारित किए जाने से ठीक पहले, सेना ने राजशाही-समर्थक 'सिक्किम गार्ड्स' को निहत्था कर दिया. भारतीय सेना ने चोग्याल पैलेस को घेर लिया और सिक्किम गार्ड्स को निहत्था कर दिया और राजभवन की सुरक्षा अपने हाथ में ले ली.
सिद्धू ने बताया कि ऐसा करना जरूरी था. क्योंकि खुफिया जानकारी मिली थी कि ये गार्ड्स चोग्याल के आदेश पर प्रस्ताव को रोकने की कोशिश कर सकते हैं या फिर लोकतंत्र-समर्थक नेताओं को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं. शुरू से आखिर तक, ज़ोर ज़बरदस्ती के बजाय राजनीतिक तरीकों और जनता की भावनाओं पर ही रहा.
'सिक्किम पर भारत ने कभी 'कब्जा' नहीं किया'
सिद्धू लिखते हैं कि इसलिए, इसे 'कब्ज़ा' कहना गलत होगा, जैसा कि कुछ लेखकों और विदेशी जानकारों ने कहा है. हमने तो बस अपने मकसद को पाने के लिए जनता की भावनाओं का इस्तेमाल किया. यह एक राजनीतिक कार्रवाई थी, जिसमें सेना के इस्तेमाल की ज़रूरत शायद ही कभी पड़ी.
जब ये दस्तावेज सार्वजनिक किए गए, तो खुफिया विभाग के पूर्व अधिकारी सुबीर दत्ता ने कहा कि सिक्किम के भारत में विलय से ज़्यादा सफल भारतीय खुफिया कार्रवाई शायद ही कभी हुई हो.
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नेपाल, भूटान, चीन और भारत के बीच स्थित सिक्किम, नई दिल्ली के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था. इसका भारत में विलय, इस राजशाही के लोगों और भारत, दोनों के लिए ही फायदेमंद साबित हुआ है. आज आधी सदी बीत जाने के बाद, सिक्किम भारतीय संघ के भीतर एक समृद्ध राज्य के रूप में खड़ा है.
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा का मुख्य उद्देश्य इस ऐतिहासिक उपलब्धि का जश्न मनाना और विकास के बड़े प्रोजेक्ट की शुरुआत करना है. साथ ही यह सिक्किम के उस बदलाव को दिखाती, जिसके तहत यह एक 'संरक्षित राजशाही' से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग बन गया.