इस्लामिक क्रांति के बाद खामेनेई के गुरु और ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खुमैनी ने इस्लामिक गणराज्य स्थापित किया. तब तेहरान में एक अप्रत्याशित घटना हुई. 4 नवंबर 1979 में, ईरानी छात्रों के एक समूह ने तेहरान में स्थित अमेरिकी दूतावास पर धावा बोलकर 52 अमेरिकियों को बंधक बना लिया था. 14 महीने तक अमेरिकी दूतावास वहां काम करने वाले लोगों के लिए जेल बन गया था. ईरान ने इसे गुस्साए छात्रों का समूह बताया था, जबकि अमेरिका के मुतबिक, वो खुमौनी के वफादार और कट्टरपंथी लड़ाके थे.
444 दिनों तक ईरान की धरती पर अमेरिकी नागरिकों को बंधक बनाकर रखना, अमेरिका के लिए वैश्विक अपमान से कम नहीं था. अमेरिकी दूतावास पर जिस समूह ने कब्जा किया था वो ईरान के इस्लामिक शासन के प्रति वफादार था. इस सदमे को अमेरिका कभी भूला नहीं सका. आज जब अमेरिका ने ईरान पर हमला कर वहां के सर्वोच्च लीडर खामेनेई का सफाया हो चुका है, जिसे अमेरिका का 47 साल पुराना बदला बताया जा रहा है. समझते हैं कैसे और क्यों कट्टरपंथी छात्र समूह ने अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया था.
1979 में ईरान में एक जन क्रांति ने वहां शाह को सत्ता से बेदखल कर दिया और उनकी जगह खुमैनी की इस्लामी सरकार ने ली. खुमैनी 14 वर्षों के निर्वासन के बाद ईरान लौटे थे और ईरान के सर्वोच्च राजनीतिक और धार्मिक नेता के रूप में अपना पदभार संभाला था.उसी साल अक्टूबर में ईरान से निर्वासित शाह , जो मेक्सिको में थे, उन्हें कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका में प्रवेश की अनुमति दी गई.
ईरान बंधक संकट की पूरी कहानी
इस फैसले ने ईरान में अमेरिका-विरोधी भावनाओं का भयंकर तूफान खड़ा कर दिया, जिसका नतीजा 4 नवंबर 1979 को तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर छात्रों के घेराबंदी के रूप में सामने आया. इस घटना को 'ईरान बंधक संकट' के नाम से जाना जाता है. उस वक्त अमेरिकी दूतावास में 66 बंधक थे. इस घटना ने अमेरिका को ईरान के साथ लगभग युद्ध की स्थिति में ला खड़ा किया और जिमी कार्टर के राष्ट्रपति पद को भी खतरे में डाल दिया.
कुछ ही समय बाद, छात्रों ने 66 बंधकों में से 13 को रिहा कर दिया. इनमें ज्यादातर राजनयिक और दूतावास के कर्मचारी थे. रिहा किए गए लोगों में ज्यादातर महिलाएं, अफ्रीकी अमेरिकी और गैर-अमेरिकी नागरिक थे. 1980 की गर्मियों तक दूतावास में 52 पुरुष और महिलाएं बंधक बने रहे.
राष्ट्रपति कार्टर ने ईरान में बंधकों को छुड़ाना अपने प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया, लेकिन न तो राजनयिक प्रयासों और न ही आर्थिक प्रतिबंधों से अयातुल्ला और उनके समर्थकों पर कोई असर पड़ा. अप्रैल 1980 में एक अमेरिकी स्पेशल रेस्क्यू ग्रुप ने मिलिट्री ऑपरेशन भी चलाया, लेकिन वो विफल हो गया जब हेलीकॉप्टर एक परिवहन विमान से टकरा गया, जिसमें आठ सैनिक मारे गए थे.
444 दिनों तक बंधक रहे थे 52 अमेरिकी नागरिक
इस बीच दूतावास में बंधक बनाए गए लोग गहरे अनिश्चितता और भय के माहौल में जी रहे थे. उन्हें लंबे समय तक कैद में रखा गया, यातनाएं दी गई और मौत तक की धमकियां दी गईं. रिहाई से कुछ दिन पहले तक गर्म और ठंडा पानी भी नहीं दिया. महीनों की बातचीत के बाद, अमेरिका और ईरान दिसंबर 1980 में बंधकों को रिहा करने के लिए एक समझौते पर पहुंचे, लेकिन ईरानियों ने कार्टर के प्रति अपनी घृणा जताते हुए 20 जनवरी 1981 को रीगन के उद्घाटन भाषण के कुछ मिनट बाद तक बंधकों को रिहा नहीं किया.
ईरान बंधक संकट ने पहली बारअमेरिका को ईरान के साथ सीधे टकराव में ला खड़ा किया. इसने उस शत्रुता की शुरुआत भी की जो आज तक अमेरिका और ईरान के संबंधों को प्रभावित कर रहा है. 14 महीने यानी 444 दिनों बाद बंधकों को रिहा कर दिया गया.
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तेहरान का वो दूतावास भवन, जो उन दर्दनाक 444 दिनों के दौरान बंधकों के लिए जेल के रूप में इस्तेमाल किया गया था. उसे बाद में इस्लामी सांस्कृतिक केंद्र और संग्रहालय का रूप दिया गया. ईरान ने उस दूतावास भवन को 'जासूसों का अड्डा' के रूप में प्रचारित किया था.