आज भले ही दुबई-कुवैत और अन्य खाड़ी देश अपनी अलग पहचान रखते हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब ये सभी इलाके ब्रिटिश शासन के तहत भारत से जुड़े हुए थे. उस दौर में न सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण भारत से होता था, बल्कि यहां भारतीय रुपये का भी इस्तेमाल होता था.
दरअसल, ब्रिटिश राज के समय खाड़ी के कई अरब राज्य सीधे तौर पर ब्रिटिश भारत का हिस्सा माने जाते थे. इन क्षेत्रों का प्रशासन भारत के जरिए चलाया जाता था और भारत एक तरह से इनका प्रशासनिक मुख्यालय (हेडक्वार्टर) था. व्यापार, समुद्री गतिविधियों और शासन व्यवस्था में भारत की बड़ी भूमिका थी.
लेकिन इतिहास ने 1947 में एक बड़ा मोड़ लिया. 1 अप्रैल 1947 को, भारत की आजादी और विभाजन से कुछ महीने पहले ही खाड़ी देशों को ब्रिटिश भारत से अलग कर दिया गया. इसके बाद जब भारत और पाकिस्तान आजाद हुए और रियासतों को अपने-अपने देशों में शामिल किया गया, तब खाड़ी के ये अरब राज्य उस प्रक्रिया से बाहर थे.
ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भारत से ब्रिटिश सेना हटाने के साथ-साथ अरब क्षेत्रों से भी हटाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन इसका विरोध हुआ. नतीजतन, 1947 के बाद भी ब्रिटेन ने करीब 24 साल तक खाड़ी क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखी.
भारत के आजाद होने के बाद इन खाड़ी देशों का प्रशासन भारत के वायसराय के बजाय सीधे लंदन के व्हाइटहॉल को रिपोर्ट करने लगा. यानी जो इलाके कभी भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में थे, वे पूरी तरह ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था के अधीन हो गए.
इतिहास का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि आज खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीयों और पाकिस्तानियों में से बहुत कम लोग जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब तेल से समृद्ध यह क्षेत्र भारत या पाकिस्तान का हिस्सा बन सकता था—ठीक वैसे ही जैसे जयपुर, हैदराबाद या बहावलपुर जैसी रियासतें नए देशों में शामिल हुई थीं.
इस बदलाव की शुरुआत इससे भी पहले हो चुकी थी. 1 अप्रैल 1937 को Aden को ब्रिटिश भारत से अलग कर दिया गया था। करीब 100 साल तक अदन भारत के प्रशासन का हिस्सा रहा था, लेकिन बाद में उसे सीधे ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के अधीन कर दिया गया.
इस तरह, खाड़ी देशों का भारत से अलग होना सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि यह इतिहास का एक ऐसा मोड़ था जिसने पूरे क्षेत्र की राजनीतिक और आर्थिक दिशा बदल दी.
हालांकि, खाड़ी क्षेत्र अगले एक दशक तक भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में ही रहा. ब्रिटिश अधिकारियों ने इस बात पर चर्चा भी की कि स्वतंत्रता के बाद भारत या पाकिस्तान में से किसे फारस की खाड़ी का संचालन करने की अनुमति दी जाएगी. तब तेहरान में ब्रिटिश दूतावास के एक सदस्य ने दिल्ली के अधिकारियों की स्पष्ट सर्वसम्मति पर आश्चर्य व्यक्त किया कि फारस की खाड़ी में भारत सरकार की बहुत कम रुचि थी.
खाड़ी क्षेत्र के निवासी विलियम हे के अनुसार, खाड़ी और अरबों से निपटने की जिम्मेदारी भारतीयों या पाकिस्तानियों को सौंपना स्पष्ट रूप से अनुचित होता. इस प्रकार, दुबई से लेकर कुवैत तक के खाड़ी राज्य अंततः 1 अप्रैल 1947 को भारत से अलग हो गए.