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क्यों अपनी दुकान में बिछे कारपेट को रोज नहीं हटाते सोने के कारीगर?

ज्वेलरी की दुकानों और सुनारों की दुकानों में बिछा कारपेट सिर्फ सजावट के लिए नहीं होता. आभूषण बनाते समय सोने के बेहद महीन पार्टिकल्स नीचे गिरते रहते हैं, जो कारपेट के रेशों में फंस जाते हैं. इसी वजह से कारीगर कारपेट को रोज नहीं हटाते. कुछ महीनों बाद इसकी सफाई करके जमा हुई धूल से सोने के कण निकाले जाते हैं.

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साधारण दिखने वाला कारपेट भी सुनारों के लिए काफी कीमती माना जाता है. ( Photo:ITG)
साधारण दिखने वाला कारपेट भी सुनारों के लिए काफी कीमती माना जाता है. ( Photo:ITG)

जब भी आप किसी ज्वेलरी की दुकान या सोने-चांदी के कारीगर की दुकान में जाते हैं, तो आपने देखा होगा कि काम करने वाली जगह पर अक्सर कारपेट, चादर या मोटा कपड़ा बिछा होता है. कई लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर सोने के कारीगर इस कारपेट को रोज क्यों नहीं हटाते? क्या इसके पीछे कोई खास वजह होती है? चलिए जानते हैं.

काम के दौरान गिरते रहते हैं छोटे कण
सोने के आभूषण बनाना बहुत बारीकी का काम होता है. जब कारीगर सोने को काटते, घिसते, पॉलिश करते या आकार देते हैं, तब सोने के बेहद छोटे-छोटे कण हवा में उड़ते हैं या नीचे गिर जाते हैं. ये पार्टिकल्स इतने छोटे होते हैं कि सामान्य आंखों से इन्हें देख पाना मुश्किल होता है. अगर फर्श पर सीधे काम किया जाए तो ये कण इधर-उधर फैल सकते हैं और हमेशा के लिए खो सकते हैं. इसी नुकसान से बचने के लिए कारीगर अपने कार्यस्थल पर कारपेट या मोटा कपड़ा बिछाते हैं.

कारपेट बन जमा होते रहता है सोना
काम के दौरान गिरने वाले सोने के महीन कण कारपेट के रेशों में फंस जाते हैं. धीरे-धीरे दिनों, हफ्तों और महीनों में काफी मात्रा में सोने की धूल उसमें जमा हो जाती है. यही वजह है कि कारीगर कारपेट को रोज नहीं हटाते. यदि उसे बार-बार झाड़ा या हटाया जाए तो कुछ सोने के कण उड़कर नष्ट हो सकते हैं. इसलिए उसे लंबे समय तक उसी जगह पर रहने दिया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा सोने की धूल उसमें जमा होती रहे.

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महीनों बाद की जाती है सफाई
अधिकांश कारीगर कुछ महीनों या कभी-कभी साल में एक-दो बार कारपेट की विशेष तरीके से सफाई करवाते हैं. इस दौरान कारपेट को झाड़ा जाता है, धोया जाता है या उसके रेशों में फंसी धूल को इकट्ठा किया जाता है. इसके बाद उस धूल को विशेष प्रक्रिया से गुजारा जाता है, जिससे उसमें मौजूद सोने के कण अलग किए जा सकें. कई बार इस धूल से ग्रामों में सोना निकल आता है, जिसकी कीमत हजारों या लाखों रुपये तक हो सकती है.

झाड़ू की धूल भी होती है कीमती
ज्वेलरी शॉप में सिर्फ कारपेट ही नहीं, बल्कि फर्श की धूल, झाड़ू से निकला कचरा, पॉलिशिंग मशीन के फिल्टर और यहां तक कि कारीगरों के एप्रन तक संभालकर रखे जाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इनमें भी सोने के बेहद छोटे कण मौजूद हो सकते हैं. समय-समय पर इन सभी चीजों को प्रोसेस करके उनमें से कीमती धातु निकाली जाती है.

पुरानी परंपरा है यह तरीका
सोने के कण बचाने का यह तरीका नया नहीं है. सदियों से सुनार और ज्वेलर्स इसी तकनीक का इस्तेमाल करते आ रहे हैं. पहले के समय में भी कारीगर अपने ऑफिस पर मोटे कपड़े या चटाई बिछाते थे ताकि कोई भी कीमती धातु व्यर्थ न जाए. आज आधुनिक मशीनें आने के बावजूद यह परंपरा कई जगहों पर जारी है क्योंकि सोने की कीमत बहुत अधिक होती है और उसका एक छोटा सा कण भी मूल्यवान माना जाता है.

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सोने के कारीगर अपनी दुकान या कार्यशाला में बिछे कारपेट को रोज इसलिए नहीं हटाते क्योंकि उसमें काम के दौरान गिरने वाले सोने के बेहद महीन कण जमा होते रहते हैं. बाद में इन कणों को इकट्ठा करके दोबारा सोना निकाला जाता है. यही कारण है कि देखने में साधारण लगने वाला कारपेट कारीगरों के लिए काफी कीमती होता है और उसे विशेष सावधानी के साथ संभालकर रखा जाता है.

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