पूरा देश 71वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. ये दिन बेहद खास है, क्योंकि आजादी के बाद इसी दिन देश को अपना संविधान मिला था. देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया में भारत के संविधान से जुड़ा हुआ एक बड़ा इतिहास है. संविधान की पहली एक हजार प्रतियां देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया में छपी थीं, जिसकी एक कापी आज भी सर्वे ऑफ इंडिया देहरादून में मौजूद है. साथ ही जिन प्रिंटिग मशीनों पर संविधान की प्रतियों को छापा गया था वो धरोहर भी सर्वे ऑफ इंडिया के कार्यालय में है.
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15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू किया गया. अब बारी थी संविधान को छापने की जिसके लिए उस समय सर्वे ऑफ इंडिया देहरादून को चुना गया. वो मशीनें आज भी सर्वे ऑफ इंडिया में हैं जिन मशीनों से सबसे पहले संविधान को प्रिंट किया गया था. ये मशीनें आधुनिक युग में आज बूढ़ी हो गई हैं, लेकिन ये हमारे देश की धरोहर हैं.

संविधान की प्रति मौजूद
देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया में सबसे पहले प्रिंट करने वाली मशीनों के साथ ही संविधान की वो प्रति भी मौजूद है, जिसे सबसे पहले छापा गया था. संविधान की पहली प्रति छापने वाली सर्वियन मशीन को किसी कारण से हटाना पड़ा, लेकिन उसकी सहयोगी मशीनें आज भी धरोहर के रूप में देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया में मौजूद हैं जो इतिहास को अपने आप में समेटे हुए हैं.
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एन.पी.जी. (नॉर्थ प्रिंटिंग ग्रुप) और निदेशक मानचित्र, अभिलेख एंव प्रसारण केंद्र कर्नल राकेश सिंह का कहना है कि हमारे संविधान की ये पहली प्रिंट की गई कॉपी हमारे पास है, जिसे हम बहुत संजोकर रखते हैं, ताकि ये सीलन और किसी भी वजह से खराब ना हो. सर्वे ऑफ इंडिया देहरादून का भारत के संविधान को प्रकाशित करने में अहम योगदान हैं. यादों के तौर पर संविधान की पहली प्रिंटिंग की गई प्रति आज भी सर्वे ऑफ इंडिया में रखी गई है और हाथ से लिखी गई मूल प्रति दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में मौजूद है.

संविधान की पहली कॉपी छापने वाली मशीनों को अब नष्ट कर उनको पूर्ण रूप से समाप्त करने की बात भी सामने आई है. बिना कैमरे पर आए मशीनों को नष्ट करने को लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ न बोल, वार्तालाप के जरिए अधिकारियों ने ये भी बताया कि मशीनों को पिछले साल ही नष्ट करने की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई थी. ऐसे में अगर इस बात को सच मान लिया जाए तो इस को सरकार की विफलता भी माना जा सकता है, क्योंकि जिन मशीनों को संजोकर रखने की जरुरत है, जिनमें इतिहास के निशान हों उनको इस तरह से नष्ट करना कतई भी उचित नहीं है.