हरिद्वार की हर की पौड़ी के पास स्थित शिवसेतु पर वर्षों से गूंजने वाली एक आवाज अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है. भंडारा कर दो बाबूजी, 100 में पांच बाबा, 200 में 11 बाबा खाएंगे कहकर तीर्थयात्रियों से गरीबों के लिए भोजन कराने की अपील करने वाले रमाशंकर गुप्ता, जिन्हें लोग प्यार से भंडारा किंग बाबा के नाम से जानते थे, अब इस दुनिया में नहीं रहे. दो दिन पहले उनका निधन हो गया. हरिद्वार आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए रमाशंकर गुप्ता कोई अनजान चेहरा नहीं थे. हर की पौड़ी के निकट शिवसेतु पर बैठकर वह आने-जाने वाले तीर्थयात्रियों से हाथ जोड़कर विनम्रता से अपील करते थे कि वे गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए भंडारा करवा दें.
उनकी आवाज और अंदाज ही उनकी पहचान बन गए थे. वह अक्सर कहते थे, भंडारा कर दो बाबूजी. 100 रुपये में पांच बाबा और 200 रुपये में 11 बाबा खाएंगे. उनकी यह पुकार सुनकर कई श्रद्धालु जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था कराते थे. रमाशंकर गुप्ता का मानना था कि जो भोजन वह खुद खाते हैं, वही भोजन दूसरों को भी खिलाना चाहिए. इसलिए वह स्वयं खाना तैयार करते थे. रोटी और सब्जी बनाकर लाते थे और श्रद्धालुओं के सहयोग से शिवसेतु पर बैठे गरीब, साधु और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराते थे.
बताया जाता है कि रमाशंकर गुप्ता मूल रूप से उत्तर प्रदेश के हरदोई के रहने वाले थे. लंबे समय से उन्होंने हरिद्वार को ही अपना ठिकाना बना लिया था. उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन जुटाने और उन्हें सम्मान के साथ खाना खिलाने में बिताया. उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि वह कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगते थे. उनकी अपील हमेशा दूसरों के लिए होती थी. वह तीर्थयात्रियों से कहते थे कि यदि वो चाहें तो कुछ लोगों के भोजन की व्यवस्था कर सकते हैं. उनकी सादगी और सेवा भाव ने उन्हें हरिद्वार में एक अलग पहचान दिलाई.
भंडारा किंग बाबा के नाम से थी अलग पहचान
उनके निधन के बाद अब शिवसेतु पर बैठने वाले गरीब और मांगकर जीवन यापन करने वाले लोगों के सामने भी चिंता खड़ी हो गई है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अब उनके लिए भंडारे की व्यवस्था कौन करेगा. रमाशंकर गुप्ता रोज श्रद्धालुओं से आग्रह करते थे और उसी सहयोग से कई जरूरतमंदों का पेट भरता था. हरिद्वार आने वाले कई श्रद्धालु भी उन्हें अच्छी तरह पहचानते थे. बहुत से लोग हर बार हरिद्वार आने पर उन्हें खोजते थे और उनके कहने पर भंडारा करवाते थे. उनकी आवाज सुनते ही कई लोग रुक जाते थे और अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करते थे.
भंडारा कर दो बाबूजी सिर्फ एक आवाज नहीं थी, बल्कि जरूरतमंदों के लिए भोजन जुटाने का माध्यम बन गई थी. सालों तक शिवसेतु पर गूंजने वाली यह पुकार अब सुनाई नहीं देगी. उनके जाने से हरिद्वार की एक ऐसी पहचान भी खत्म हो गई, जिससे हजारों श्रद्धालु और स्थानीय लोग भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे.
श्रद्धालुओं के बीच बेहद लोकप्रिय थे रमाशंकर गुप्ता
रमाशंकर गुप्ता के निधन के साथ एक ऐसा चेहरा भी विदा हो गया, जिसने बिना किसी प्रचार और पहचान की इच्छा के जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने का काम किया.अब हर की पौड़ी के पास शिवसेतु से गुजरने वाले लोगों को न वह परिचित चेहरा दिखाई देगा और न ही वह आवाज सुनाई देगी, जो वर्षों तक लोगों से गरीबों के लिए भंडारा कराने की अपील करती रही.