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महिला खिलाड़ियों को पहचान दे रहा वाराणसी का ये आखाड़ा, 480 साल पहले तुलसीदास ने रखी थी नींव

वाराणसी के 480 साल पुराने तुलसी घाट स्थित आखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास में महिला कुश्तीबाज पुरुष पहलवानों को जमकर पटखनी दे रही हैं. यहां कुश्तीबाजी की प्रैक्टिस कर रहीं महिलाएं कोई मामूली पहलवान नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर की कुश्तीबाज हैं.

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आखाड़े में दांव-पेंच सीखती महिला खिलाड़ी. आखाड़े में दांव-पेंच सीखती महिला खिलाड़ी.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • नागपंचमी पर वाराणसी में दंगल का होता है आयोजन
  • दंगल की तैयारियों को लेकर आखाड़े में पहुंच रहीं महिला खिलाड़ी

एक दौर था जब पहलवानी या अखाड़ा शब्द लड़कियों के लिए किसी टैबू से कम नहीं था, लेकिन बदलते वक्त और महिला कुश्तीबाजों की ओर से बनाए गए कीर्तिमानों के चलते ये मिथ्या भी टूट गई. अब वाराणसी में भी महिला कुश्तीबाजों ने अखाड़ों का रूख कर लिया है. बनारस के सैकड़ों वर्षों पुराने गंगा किनारे अखाड़ा तुलसीदास में न केवल महिला कुश्तीबाज नागपंचमी के पर्व को लेकर अभ्यास कर रहीं हैं, बल्कि पुरूष पहलवानों से भी दो-दो हाथ कर रहीं हैं. बता दें कि इस अखाड़े से निकलकर कई महिला कुश्ती खिलाड़ी न केवल प्रदेश, बल्कि राष्ट्रीय स्तर तक नाम रौशन कर चुकी हैं.

जब नागपंचमी का पर्व नजदीक रहता है तो इनके कदम खुद-ब-खुद महीनों पहले अखाड़े की ओर बढ़ चलते हैं. राष्ट्रीय स्तर की महिला पहलवान कशिश यादव ने बताया कि उनको विरासत में पहलवानी का खेल मिला है और जब गीता फोगाट का मेडल ओलंपिक में लगा था, उसी से प्रेरित होकर वे और उनकी छोटी बहन भी पहलवानी करना शुरू कर दिया.

वे बताती है कि उन्होंने दो बार नेशनल में मेडल हासिल किया है और यूपी केसरी भी रह चुकी हैं और खेलो इंडिया में भी अपने खेल का प्रदर्शन कर चुकी हैं. अब उनकी इच्छा ओलंपिक, एशियाड और वर्ड चैंपियनशिप खेलकर देश के लिए मेडल लेना है. वे बताती हैं कि अखाड़े और मेट की कुश्ती में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. अखाड़े में दमकशी बनती है. 

जो पहले ताने मारते थे, वही अब आकर प्रोत्साहित करते हैं: कशिश यादव

कशिश यादव बताती हैं कि कभी समाज में ताने सुनने को मिलते थे कि लड़कियां कुश्ती कैसे लड़ सकती है? लेकिन फिर मेडल जीतने के बाद वही लोग आकर प्रोत्साहित भी करने लगे. वे बताती हैं कि नागपंचमी को लेकर महीनों पहले से तैयारी होती है, जिसकी तैयारी उनके दादा उन्हे करा रहें हैं. नागपंचमी के दिन लड़कों से भी कुश्ती होती है. अगर वे तैयार नहीं होते हैं तो वे अपने भाई से ही कुश्ती लड़ती हैं. कशिश बताती हैं कि तैयारी के दौरान और खेल में भी वे लड़कों के साथ कुश्ती लड़ती हैं, ताकि फिर लड़कियों से लड़ना आसान हो जाता है और दमकशी बन जाती है. 

महिला कुश्ती खिलाड़ी पलक यादव की भी कहानी कशिश की ही तरह है. वे बताती हैं कि उनको भी विरासत में कुश्ती का खेल मिला है और ऐसे कम ही लोग मिले जो महिला कुश्ती के खिलाफ थे. साक्षी मलिक ने जब ओलंपिक में मेडल जीतीं, तभी से उन्होंने भी कुश्ती शुरू की. लोगों का बोलना भी तब बंद हो गया जब उन्होंने स्टेट में मेडल जीती. वे बताती है कि अपने देश के लिए मेडल लाना है. नागपंचमी पर कुश्ती की तैयारी और खेल के दौरान अपना सही आकलन हो पाता है. 

पलक यादव बताती है कि मिट्टी में कुश्ती लड़ने से ग्रीप अच्छा बनता है और दमकशी भी बनती है. पलक बताती है कि नागपंचमी को लेकर एक माह पहले से तैयारी शुरू कर देती है और प्रैक्टिस के साथ खानपान पर भी ध्यान देते हैं.   

लड़कों की तरह महिला कुश्तीबाजों को भी मौका मिलना चाहिए: पुरुष पहलवान

पुरूष पहलवान और कशिश के भाई करण बताते हैं कि कुश्ती लड़ते तीन साल हो गए. इसकी शुरूआत उन्होंने अपने दादा के साथ अखाड़े आकर की. वे बताते हैं कि वे लड़कियों से भी कुश्ती लड़ते हैं और लड़कों की ही तरह लड़कियों को भी बराबर मौका मिलना चाहिए. वे बताते हैं कि जब कोई लड़का उनकी बहन से कुश्ती के लिए तैयार नहीं होता है तो वह अपनी बहन की मदद करते हैं. इसके अलावा घर पर उसकी डाइट का भी ख्याल रखते हैं. वे बताते हैं कि नागपंचमी को लेकर दुगनी तैयारी करते हैं. सुबह मैट पर और शाम को अखाड़े में प्रैक्टिस करते हैं.

सीनियर महिला खिलाड़ी को देखकर और भी बच्चियां अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास का रूख कर रही हैं. परी यादव बताती है कि उनके पिता ने भी अखाड़े जाने की प्रेरणा दी और वे तभी से अखाड़े आने लगी. उनके पिता कुश्ती के खेल से जुड़े थे और दादा ने आगे खेलने के लिए उत्साहित किया. उनका ड्रीम है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक खेल सके. उन्होंने बताया कि नागपंचमी का पर्व अस्सी घाट पर दंगल के साथ मनाया जाता है. अगर उनको भी मौका मिला तो जरूर खेलेंगी.

क्लास 6 में पड़ने वाली लक्ष्मी गुप्ता बताती है कि अखाड़े की सीनियर खिलाड़ियों को देखकर उनको प्रेरणा मिली है और इस खेल को वे ओलंपिक तक खेलना चाहती हैं. वे भी बताती है कि नागपंचमी को लेकर वे तैयारी कर रही हैं. अगर मौका मिला तो जरूर खेलेंगी.

तुलसीदास अखाड़े से अंतरराष्ट्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकलते हैं: मेवालाल यादव

अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास में एक अर्से से कुश्ती की शिक्षा देते मेवालाल यादव बताते हैं कि तुलसीघाट किनारे इस अखाड़े को खुद गोस्वामी तुलसीदास ने करीब 500 साल पहले स्थापित किया था. वे विद्वान के साथ सेहत पर भी बहुत ध्यान देते थे और पहलवानी का शौक भी रखते थे. वे बताते हैं कि तुलसीदास अखाड़े से अंतरराष्ट्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक खिलाड़ी निकले हैं. उन्होंने बताया कि जिस तरह से लड़कों को दांव पेंच सिखाया जाता है, उसी तरह लड़कियों को भी ट्रेनिंग दी जाती है, दोनों के उत्साह में कही से कमी नहीं होती है.

मेवालाल यादव बताते हैं कि उनके अखाड़े की महिला खिलाड़ी नेशनल, सीनियर स्टेट, और यूपी स्तर तक खेल चुकी हैं. नागपंचमी को लेकर बहुत उत्साह रहता है. वाराणसी में और गली-गली में प्रतियोगिता होती हैं, लेकिन नागपंचमी को लेकर 4-6 महीने पहले से लोग तैयारी में जुट जाते हैं.

वहीं युवा ट्रेनर उमेश कुमार बताते हैं कि तुलसीदास अखाड़े से उन्होंने कुश्ती सीखा और यहीं से निकलकर कई पहलवानों ने कई सैन्यबलों में भी नौकरी की है. वे खुद 5 बार ऑल इंडिया खेल चुके हैं और अब 5 साल से लड़कियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं. पिछले 3 साल में 2 लड़कियां उनके अखाड़े से स्टेट में मेडल दे चुकी हैं. एक लड़की ने नेशनल में भी मेडल लिया है और कई लड़कियां कई बार क्वालीफाई भी कर चुकी हैं. उन्होंने बताया कि नागपंचमी को लेकर वाराणसी में प्रतियोगिताएं होती है और कई जिलों से खिलाड़ी आकर हिस्सा लेते हैं. प्रतियोगिता में लड़के-लड़की भी आपस में लड़ते हैं. वे बताते हैं कि लड़कियां लड़कों के साथ जब प्रैक्टिस करती है तो उनको लड़कियों के साथ कुश्ती लड़ना आसान हो जाता है. 

... इसलिए गोस्वामी तुलसीदास ने रखी अखाड़े की नींव

वहीं अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के महंत प्रो विशंभरनाथ मिश्रा बताते हैं कि हनुमान जी को गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपना गुरू बनाया क्योंकि उन्हें भगवान राम का दर्शन करना था. हनुमान जी बल, बुद्धि के देवता भी माने गए हैं. गोस्वामी जी का मानना था कि अगर इंसान को उपासना और लोगों की सेवा करना है तो सबसे पहले स्वस्थ रहना पड़ेगा. इसलिए उन्होंने अखाड़ा तुलसीदास की नींव रखी. तभी से लोग परंपरागत तरीके से आकर रियाज करते है और शरीर पर ध्यान देते हैं, 

महंत ने बताया कि पहले सिर्फ पुरूष पहलवान ही अखाड़े में जाया करते थे. महिलाओं का प्रवेश अखाड़े में प्रतिबंधित हुआ करता था, लेकिन चार-पांच साल पहले कुछ लड़कियों ने अखाड़े में प्रैक्टिस करना चाहा और लोगों की आपत्ति के बाद भी उनकी ओर से अखाड़े में जाने की अनुमति दे दी गई. आज 18-20 लड़कियां अखाड़े आती हैं. इनमें से कई स्टेट और नेशनल लेवल पर अच्छा परफॉर्म कर रही हैं और लड़कों के साथ भी अभ्यास करती हैं. 

महंत ने बताया कि नागपंचमी का दिन एक तरह से अखाड़ों का एनुअल मीट होता है. न केवल अखाड़े, बल्कि हनुमान जी की भी पूजा होती है और साल भर अभ्यास किए लोगों की परीक्षा होती है और फिर अगले दिन से उसमें सुधार भी होता है. नागपंचमी को अलग-अलग अखाड़ों के खिलाड़ी हिस्सा लेकर परफॉर्म करते हैं. उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी की वजह से दंगल बंद था, लेकिन अभी फिर से धीरे-धीरे सब शुरू होगा.

 

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