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UP पंचायत चुनाव: बंपर तैयारी- धुआंधार प्रचार, मगर किसी जिले में नहीं हुआ बीजेपी का बेड़ा पार

यूपी पंचायत चुनाव में बीजेपी ने योगी सरकार के मंत्रियों की ड्यूटी लगाई गई. बीजेपी सांसद-विधायकों को भी मोर्चा पर लगाई गया. पंचायत चुनाव में प्रत्याशियों के चयन के लिए लखनऊ में कई दिनों तक पार्टी दिग्गजों के बीच माथापच्ची और खूब मंथन हुआ. लखनऊ पार्टी दफ्तर में तो वॉर रूम बनाया गया था. इन सबके बावजूद बीजेपी यूपी पंचायत चुनाव में धराशायी हो गई.

सीएम योगी आदित्यनाथ सीएम योगी आदित्यनाथ
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पंचायत चुनाव में बीजेपी को मिली करारी हार
  • पीएम मोदी से सीएम योगी तक के क्षेत्र में हार
  • बीजेपी को यूपी के किसी भी जिले में बहुमत नहीं

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव जीतने के लिए सत्ताधारी बीजेपी ने बंपर तैयारी और हरसंभव कोशिश की थी. योगी सरकार के तमाम मंत्रियों की इसमें ड्यूटी लगाई गई. बीजेपी सांसद-विधायकों को भी मोर्चा पर लगाया गया. पंचायत चुनाव में प्रत्याशियों के चयन के लिए लखनऊ में कई दिनों तक पार्टी दिग्गजों के बीच माथापच्ची और खूब मंथन हुआ. लखनऊ पार्टी दफ्तर में तो वॉर रूम तक बनाया गया था. इन सबके बावजूद बीजेपी यूपी पंचायत चुनाव में धराशायी हो गई.

अयोध्या-मथुरा-काशी में बीजेपी धराशायी 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से लेकर रामनगरी अयोध्या, मथुरा और चित्रकूट तक में बीजेपी को करारी मात खानी पड़ी है. वहीं, सीएम योगी के गृहजनपद गोरखपुर में बराबर की टक्कर रही जबकि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के प्रयागराज और डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा के लखनऊ में पार्टी को सपा ने कड़ी शिकस्त दी है. यूपी के किसी भी जिले में बीजेपी को बहुमत नहीं मिल सका.  

उत्तर प्रदेश के जिला पंचायत चुनाव में बीजेपी को ज्यादातर जिलों में समाजवादी पार्टी (सपा) से कड़ी टक्कर मिली है. कई जगहों पर तो सपा के उम्मीदवार बीजेपी के उम्मीदवारों पर भारी पड़े हैं. सूबे के 75 जिलों की कुल 3050 सीटों पर चुनाव हुए हैं, जिनमें से 690 बीजेपी समर्थित उम्मीदवार को ही जीत मिल सकी है. एक तरह से बीजेपी महज 23 फीसदी सीटें ही मिली हैं जबकि उसे 77 फीसदी सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा है. 

पश्चिम यूपी से पूर्वांचल तक बीजेपी हारी

पंचायत चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में अपना दम दिखाया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों के आंदोलन से उपजे रोष के चलते आरएलडी ने भी अप्रत्याशित तौर पर बेहतर प्रदर्शन किया है. हालांकि, पूर्वांचल में सपा ने एकतरफा जीत दर्ज की है और बीजेपी अपना दुर्ग नहीं बचा सकी है. बीजेपी के कई बड़े नेता अपना वर्चस्व बचाने में भी नाकाम साबित हुए. अयोध्या, काशी, मथुरा, गोरखपुर जैसे धार्मिक स्थल वाले जिलों में भी पार्टी को करारी हार मिली है. 

बीजेपी को पंचायत चुनाव में तब ऐसी शिकस्त मिली है जब, पार्टी ने चुनाव जीतने के लिए हर जतन किए थे. प्रदेश में जिले से लेकर मंडल और गांव-गांव तक बीजेपी नेताओं ने बैठकें कर पंचायत चुनाव जीतने के लिए ताकत झोंकी थी. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह से लेकर पार्टी के तमाम बड़े नेता 900 से ज्यादा सीटें जीतने और 400 सीटों पर आगे होने दावा कर मंगलवार तक कर रहे थे, लेकिन नतीजे आने के बाद उनके सारे दावे फुस्स हो गए. 

मंत्री, सांसद और विधायक भी नहीं जिता पाए सीट

कल्याण सिंह का गढ़ कहे जाने वाले अलीगढ़ जिला पंचायत के सभी 47 वार्डों पर प्रत्याशी उतारने वाली इकलौती पार्टी भाजपा को जिले में कुल नौ सीटों पर जीत मिली है. प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री रमापति शास्त्री के भतीजे जहां ग्राम प्रधान का चुनाव हार गए. ऐसे ही रायबरेली में एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह अपने भाई की पत्नी को चुनाव नहीं जिता सके जबकि वो जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं. वहीं, गोंड़ा में भाजपा समर्थित प्रत्याशी व भाजपा के अवध क्षेत्र के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष पीयूष मिश्रा को करारी मात मिली है. 

लखनऊ मोहनलालगंज के सांसद कौशल किशोर की बहू जिला पंचायत सदस्य का चुनाव हार गईं. बलिया में बीजेपी के बेल्थरारोड क्षेत्र के विधायक धनंजय कन्नौजिया की मां सर्यकुमारी देवी हार गई हैं. भाजपा के पूर्व सांसद हरिनारायण राजभर के बेटे अटल राजभर भी हार गए. भाजपा के गोरक्षनाथ प्रांत के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष देवेंद्र यादव नहीं जीते हैं. इतना ही नहीं पूर्व विधायक राजराम त्यागी और उनकी पत्नी भी चुनाव हार गई हैं. वहीं, मथुरा जिले से बीजेपी के पूर्व विधायक प्रणतपाल सिंह के बेटे चुनाव हार गए हैं. 

किसान आंदोलन और कोरोना ने बिगाड़ा खेल
बीजेपी के लिए पश्चिम यूपी में किसान आंदोलन ने तो पूर्वांचल में कोरोना लहर ने खेल बिगाड़ने का काम किया है. मेरठ से लेकर शामली, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, गाजियाबाद, बुलंदशहर, बागपत, हापुड़, हाथरस, अलीगढ़, मथुरा में बीजेपी को करारी मात मिली है. पश्चिम यूपी में किसान आंदोलन आरएलडी के लिए संजीवनी साबित हुआ है और बीजेपी के लिए सियासी तौर पर बड़ा झटका है. किसान आंदोलन का असर दिखा, जिसके चलते राष्ट्रीय लोकदल ने 35 सीटें मिलने का दावा किया है और सपा के साथ उसके गठबंधन होने के चलते सपा को 76 सीटें मिली हैं. 

वहीं, कोरोना लहर के बीच हुए पंचायत चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को तगड़ा नुक़सान उठाना पड़ा है. गोरखपुर से लेकर लेकर देवरिया, आजमगढ़, वाराणसी, अयोध्या, कुशीनगर, अंबेडकर नगर, प्रतापगढ़, जौनपुर, महाराजगंज, बस्ती, गाजीपुर, मऊ सहित तमाम जिलों में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है जबकि सपा को बढ़त मिली है.  ऐसे में यह चुनाव बीजेपी के लिए सियासी तौर पर काफी झटके वाले माना जा रहा है. बीजेपी पूर्वांचल में 118 सीटें जीतने का दावा कर रही है और सपा के मुताबिक उसे 171 सीटें हाथ लगी हैं. वहीं,  बसपा ने पूर्वांचल में पश्चिमी यूपी के बाद सबसे अच्छे प्रदर्शन का दावा किया है और उसे 90 सीटें मिली हैं जबकि कांग्रेस को 21 सीटें मिली हैं. 

बुंदेलखंड में सपा-बसपा बनी चुनौती
बुंदेलखड़ इलाके के हमीरपुर, महोबा, बांदा, चित्राकूट जालौन, झांसी और ललितपुर सात जिले आते हैं. इस इलाके में कुल 148 सीट हैं जिनमें से भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं, लेकिन सपा और बसपा बहुत ज्यादा पीछे नहीं हैं. बीजेपी को 44 सीटें मिली है जबकि सपा को 34 और बसपा को 31 सीटें मिली हैं. इसके अलावा 39 सीटें अन्य के खाते में गई हैं. इस इलाके से ही प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह आते हैं, लेकिन किसी भी जिले में बीजेपी अपने दम पर जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने की स्थिति में नहीं है. 

सेंट्रल यूपी में सपा से पिछड़ी बीजेपी
अवध क्षेत्र के साथ ही मध्य यूपी के अयोध्या, लखनऊ, गोंडा, अमेठी और कानपुर, इटावा, मैनपुरी, उरई आदि में आए नतीजे बीजेपी के लिए झटका माने जा रहे हैं. सपा ने 285 सीटें और भाजपा ने 155 सीटें जीतने का दावा किया है. लखनऊ की 25 सीटों में से 10 पर सपा ने कब्जे का दावा किया है जबकि बीजेपी को तीन और बसपा को पांच सीटें मिली हैं. गोंडा जैसे जिले में जहां भाजपा से सांसद कीर्तिवर्धन सिंह हैं और सातों विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है, वहां पर भी सपा ने सबसे ज्यादा 30 और भाजपा ने 17 सीटें जीतने का दावा किया है.  

पंचायत चुनाव के नतीजों ने बीजेपी को मंथन करने के लिए मजबूर कर दिया हैं, क्योंकि 25 फीसदी सीटें भी उसके हिस्से में नहीं आई हैं. सत्ता में रहते ही बीजेपी का 75 फीसदी से ज्यादा सीटें हार जाना निश्चित तौर पर पार्टी के लिए चिंता बढ़ाने वाला है. ऐसे में तब जब सूबे में आठ महीने के बाद विधानसभा चुनाव होने हैं. 


 

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