महिलाओं की रात में ड्यूटी (नाइट शिफ्ट) लगाने से पहले बॉस को उनकी रजामंदी लेनी होगी. नहीं तो, उनके खिलाफ एक्शन हो सकता है. मोदी सरकार की ओर से लोकसभा में 23 जुलाई को पेश द अकूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन्स कोड, 2019 में कुछ ऐसे ही प्रावधान हैं. संख्या बल को देखते हुए इस विधेयक का दोनों सदनों से पास होना तय माना जा रहा है. क्योंकि इसके प्रावधानों पर अब तक विपक्ष ने आपत्ति नहीं जताई है.
लंबे अरसे से कार्यस्थलों पर महिलाओं और अन्य कर्मचारियों के हितों को लेकर आवाज उठती रही है. श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से तैयार इस बिल को लोकसभा में संतोष कुमार गंगवार पेश कर चुके हैं. भारतीय मजदूर संघ के प्रमुख पदाधिकारियों में शुमार पवन कुमार ने नाइट शिफ्ट को लेकर महिला कर्मियों को मिली रियायत को बेहतर कदम बताया है. राज्यसभा से भी विधेयक के पास होने पर यह कानून बन जाएगा.
मोदी सरकार की ओर से बनाया जाने वाला यह कानून हर उस संस्थान पर लागू होगा, जहां कम से कम 10 कर्मचारी काम करते हैं. यह विधेयक 13 श्रम कानूनों की जगह लेगा जो कर्मचारियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल के माहौल की बेहतरी के लिए बनाए गए थे. इस नए बिल में फैक्ट्रीज एक्ट 1948, द माइन्स एक्ट 1952 और द कॉन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन एंड अबोलिशन) एक्ट 1970 के प्रावधानों को शामिल किया गया है. बिल में कहा गया है कि अगर नियोक्ता की किसी गलती से कर्मचारी की मौत होती है तो उसे दो साल की सजा और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना देना पड़ेगा.
नियोक्ताओं का कामः बिल में नियोक्ताओं ( Employers) की कई जिम्मेदारियां तय की गई हैं. मसलन, कर्मचारियों के लिए ऐसा दफ्तर उपलब्ध कराएंगे, जहां किसी तरह का खतरा या फिर बीमारी होने की गुंजाइश न हो. हर साल मुफ्त में स्वास्थ्य जांच शिविर लगाना भी जरूरी है. अगर कार्यस्थल पर कोई कर्मचारी गंभीर रूप से घायल होता है या जान चली जाती है तो उसकी सूचना सक्षम अधिकारी को देनी जरूरी है.
कर्मचारियों के अधिकार और कर्तव्यः बिल में कहा गया है कि कर्मचारी अपने स्वास्थ्य एवं सुरक्षा का ध्यान रखेंगे. सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों का अनुपालन करेंगे. कार्यस्थल पर असुरक्षित स्थितियों की सूचना अपने निरीक्षक को देंगे. हर कर्मचारी को कार्यस्थल पर स्वास्थ्य एवं सुरक्षा मानकों से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार होगा. कर्मचारियों के लिए ऐसा ऑफिस देना जरूरी है, जहां हवा आने-जाने की व्यवस्था हो, उचित तापमान हो. पीने के लिए साफ पानी हो, शौचालय आदि सुविधाएं हों.
वर्किंग ऑवर्सः राज्य या केंद्र सरकार की ओर से विभिन्न वर्गों के कर्मचारियों की ओर से निर्धारित काम के घंटों का पालन जरूरी है. अगर कोई ओवरटाइम करता है तो उसे दैनिक मजदूरी का दोगुना पैसा देना जरूरी है. वहीं महिला स्टाफ का ड्यूटी टाइम सुबह छह से शाम सात बजे तक होगा. फिर भी शाम सात बजे के बाद और सुबह छह बजे से पहले महिला स्टाफ की ड्यूटी उसकी परमीशन लिए बगैर बॉस नहीं लगा सकते. इसके अलावा नाइट शिफ्ट में महिला स्टाफ की सेफ्टी की जिम्मेदारी भी संस्थान को लेनी होगी.
अवकाशः एक हफ्ते में छह दिन से ज्यादा कोई कर्मचारी काम नहीं करेगा. मोटर ट्रांसपोर्ट से जुड़े वर्कर्स इसके अपवाद रहेंगे. हर 20 दिन पर एक पेड एनुअवल लीव और 18 दिन पर एक मेडिकल लीव देनी जरूरी है. मेडिकल लीव के दौरान वर्कर्स को डेली की पगार का आधा भुगतान होगा.