पानी की किल्लत के बीच भूजल स्रोतों और नदियों ने देश के नीति निर्माताओं का भरपूर ध्यान खींचा है. ये जल स्रोत अब रडार पर हैं. सदियों से झीलें, तालाब, बावली समेत अन्य प्राकृतिक और मानव निर्मित जल स्रोत पीने के लिए, घरेलू उपयोग और कृषि के लिए पानी उपलब्ध करा रहे हैं. ये जलस्रोत भूजल स्तर बढ़ाते हैं. साथ ही शहरों में बाढ़ की आशंका को कम करते हैं.
ऐसे जलस्रोतों पर अतिक्रमण की वजह से ही कई शहरों को फ्लैश फ्लड का शिकार होना पड़ा. पिछले डेढ़ दशक के दौरान 2005 में मुंबई, 2013 में उत्तराखंड, 2014 में जम्मू-कश्मीर और 2015 में चेन्नई ऐसे ही फ्लैश फ्लड का शिकार हुए हैं. अगर हम नीति आयोग की सिफारिशों पर ध्यान दें तो जलस्रोतों के पुनरुत्थान और प्रबंधन पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है. क्योंकि दिल्ली, हैदराबाद और बेंगलुरू समेत देश के 21 बड़े शहरों में साल 2020 तक भूजल खत्म हो जाएगा. इससे 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे.
अनियंत्रित शहरीकरण की वजह से शहरों और गांवों से जलस्रोत तेजी से खत्म हो रहे हैं. ये हम दिन प्रतिदिन देखते भी हैं और विभिन्न रिसर्च रिपोर्ट में पढ़ते भी हैं. जलस्रोतों के बुरे हाल का सबसे बड़ा कारण अतिक्रमण, कचरा डंप, सीवरेज, औद्योगिक कचरा, निर्माणस्थल से निकलने वाला मलबा और पानी के सामुदायिक उपयोग से व्यक्तिगत उपयोग की तरफ बढ़ना है.
तेजी से गायब होते जलस्रोत
देश के विभिन्न राज्यों से जलस्रोत तेजी से गायब हो रहे हैं. तीसरे माइनर इरीगेशन (MI) सेंसस 2000-01 के अनुसार देश में 556,601 जलस्रोत थे, जो 2006-07 में हुए चौथे माइनर इरीगेशन (MI) सेंसस में घटकर 523,816 जलस्रोत हो गए. यानी 32,785 जलस्रोत घट गए.
इन 523,816 जलस्रोतों में 80,128 (15%) जलस्रोत किसी उपयोग के लिए नहीं बचे. ऐसे जलस्रोत कर्नाटक, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तराखंड और गुजरात में ज्यादा हैं. माइनर इरीगेशन (MI) सेंसस पूरे देश की सही तस्वीर नहीं दिखाता क्योंकि यह सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक ही सीमित है. 2013-14 में पांचवां माइनर इरीगेशन (MI) सेंसस हुआ था लेकिन जलस्रोतों का डाटा जारी नहीं किया गया.
माइनर इरीगेशन (MI) सेंसस में एक खामी यह भी है कि राज्यों के सभी जलस्रोतों के आंकड़ें तो हैं लेकिन यह नहीं पता चलता है कि कौन सा जलस्रोत उपयोग में क्यों नहीं है. साथ ही यह भी नहीं बताया गया है कि किस जलस्रोत को कितना नुकसान हुआ है और क्यों. इस वजह से जलस्रोतों के पुनरुत्थान का काम नहीं हो पा रहा है.
जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने 2016 और 2017 में शहरी और ग्रामीण इलाकों पर दो रिपोर्ट तैयार की है. इसमें जलस्रोतों को लेकर राज्य सरकारों से कई सवाल किए थे, लेकिन राज्य सरकारों ने केंद्र को कोई जवाब नहीं दिया. इस वजह से केंद्र सरकार 2019-20 में होने वाले छठे माइनर इरीगेशन (MI) सेंसस की शुरुआत नहीं हो पा रही है.
राज्य सरकारों के इस रवैये से नाराज जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने कहा कि देश में तत्काल जलस्रोतों को लेकर सर्वे कराने की जरुरत है. अगर यह जल्द नहीं किया गया तो जलस्रोतों के साथ उत्पन्न हो रही समस्याओं का समाधान खोजना मुश्किल होगा. जल संसाधन मंत्रालय ने भी कम हो रहे जलस्रोतों पर चिंता जाहिर की थी.
देश में सभी जलस्रोतों की संख्या तो सैटेलाइट मैपिंग से पता चल जाती है. लेकिन जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने यह चिंता जताई है कि जलस्रोतों की संख्या और उनके उपयोगों की गिनती किसी काम की नहीं है, जब तक इनके आधार पर समाधान न खोजे जाएं.
जलस्रोतों के लिए रिपेयर, रिनोवेशन और रेस्टोरेशन स्कीम
केंद्र सरकार ने 2005 में जलस्रोतों के रिपेयर, रिनोवेशन और रेस्टोरेशन (RRR) स्कीम लॉन्च की थी. इसमें संग्रहण क्षमता, भूजल और पेयजल बढ़ाने की योजना बनाई गई थी. इसके तहत पारंपरिक जलस्रोतों को संरक्षित करने, उनका जलस्तर बढ़ाने, टैंक स्टोरेज क्षमता बढ़ाने, भूजल स्तर में इजाफा करना आदि शामिल था. लेकिन जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने जलस्रोतों के बुरे हाल पर आपत्ति जताने के बाद रिपेयर, रिनोवेशन और रेस्टोरेशन (RRR) स्कीम पर दोबारा नजर डालने की जरूरत है.
संयुक्त राष्ट्र के विश्व जल विकास रिपोर्ट 2018 के अनुसार दुनिया के सभी देशों को पारंपरिक तरीकों को अपनाकर प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाने के अपील की थी. इसमें दो बड़े उदाहरण दिए गए थे. पहला राजस्थान के अलवर जिले में भारत के वाटरमैन कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह की योजना. जिसमें उन्होंने 1000 सूखाग्रस्त गांवों में छोटे-छोटे रेन वाटर हार्वेस्टिंग ढांचे बनाकर पानी का स्तर बढ़ाया. इसकी वजह से इन गांवों के कृषि उपज में 20 से 80 फीसदी का इजाफा हुआ. साथ ही 33 फीसदी जंगल भी बढ़ गए.
दूसरा उदाहरण जॉर्डन का था. जहां पारंपरिक जमीन प्रबंधन सिस्टम हिमा शुरू किया गया है. यहां जमीन को उसके प्राकृतिक हाल पर छोड़ दिया गया ताकि वह खुद-ब-खुद सुधार ला सके. साथ ही ऐसे पौधे लगाए गए जो आर्थिक रूप से देश के मजबूत कर रहे हैं. जॉर्डन ने जरका रिवर बेसिन के प्राकृतिक संसाधनों के बचाने के लिए भी यही फॉर्मूला लगाया.
देश में कई ऐसी योजनाएं हैं जो पारंपरिक जल प्रबंधन को बढ़ावा देते हैं लेकिन रिपेयर, रिनोवेशन और रेस्टोरेशन (RRR) स्कीम से ऐसा बिल्कुल नहीं होता. जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने कहा था कि RRR स्कीम के जरिए नए जलस्रोत भी बनाए जाएं ताकि खत्म हो रहे पुराने जलस्रोतों की कमी को पूरा किया जा सके.
मध्यप्रदेश, तेलंगाना, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम, त्रिपुरा और ओडिशा जैसे राज्यों ने मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत नए टैंक, चेक डैम जैसे जलस्रोत बनाए हैं. लेकिन जल संसाधन मंत्रालय ने संसदीय समिति की सिफारिश को खारिज कर दिया.
अब यह देखना होगा कि कैसे हमें जलस्रोतों को बचाना है, ताकि भविष्य में होने वाली पानी की किल्लत से अगली पीढ़ी को बचाया जा सके.