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कहानी स्वाइन फ्लू से हुई एक मौत की...

23 साल की सविता की बीती रात दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में मौत हो गई थी. स्वाइन फ्लू हुआ था उसे. मायका दिल्ली में ही था उसका. महीनाभर पहले यहां से अपने ससुराल गई तो हलका जुकाम था उसे. धीरे-धीरे कफ और खांसी बढ़ती गई. जानलेवा इन्फेक्शन से बचाने के लिए हर तरह का इलाज हुआ , लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. और सविता उन 663 लोगों में शुमार हो गई, जो इस बीमारी के चलते चल बसे. सविता और उसके परिवार का संघर्ष शायद उन दस हजार लोगों की दास्तान भी हो सकता है, जो इस बीमारी से जूझ रहे हैं.

स्वाइन फ्लू अब तक देश में 660 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है स्वाइन फ्लू अब तक देश में 660 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है

23 साल की सविता की बीती रात दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में मौत हो गई थी. स्वाइन फ्लू हुआ था उसे. मायका दिल्ली में ही था उसका. महीनाभर पहले यहां से अपने ससुराल गई तो हलका जुकाम था उसे. धीरे-धीरे कफ और खांसी बढ़ती गई. जानलेवा इन्फेक्शन से बचाने के लिए हर तरह का इलाज हुआ, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. और सविता उन 663 लोगों में शुमार हो गई, जो इस बीमारी के चलते चल बसे. सविता और उसके परिवार का संघर्ष शायद उन दस हजार लोगों की दास्तान भी हो सकता है, जो इस बीमारी से जूझ रहे हैं.

दो साल पहले ही सविता का ब्याह सहारनपुर में हुआ था. एक रसूखदार परिवार में. सफल कारोबारी और सियासत में सक्रिय. सविता ने सालभर पहले एक बेटे को जन्म दिया. सविता फिर गर्भवती थी. पिछले दिनों दिल्ली के सीलमपुर आई थी. यहीं उसके माता-पिता रहते हैं. सीलमपुर इलाके में कई लोगों को स्वाइन फ्लू का इन्फेक्शन हुआ था. इस बीमारी के वायरस ने सविता को भी धर लिया. वह सर्दी-जुकाम के साथ सहारनपुर लौट गई. मामूली जुकाम मानकर वह पहले तो घरेलू इलाज करती रही. उसका परिवार सोचता रहा कि वे तो अच्छा खाना खाते हैं और बेहतर जीवन जीते हैं. उनके परिवार को कैसे कुछ हो सकता है. स्वाइन फ्लू तो कल्पना में भी नहीं था.

सविता की तकलीफ बढ़ती गई. बुखार आ गया. सप्ताहभर बाद डॉक्टर के पास ले जाया गया. डॉक्टर को शंका हुई. सविता को अस्पताल में भर्ती कर लिया गया. स्वाइन फ्लू टेस्ट कराया गया. दुर्भाग्य से वह पॉजिटिव आ गया. बस यहीं से ट्विस्ट आ गया. जब तक लोगों को ये नहीं पता था कि परिवार की बीमार बहू को स्वाईन फ्लू है, तब तक हर दिन अस्पताल आने वालों की लाइन लगी रहती थी. फिर सब अचानक थम गया. इस परिवार ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जो पड़ौसी या रिश्तेदार हर वक्त इनके घर आने को बेताब रहते हैं या उन्हे अपने घर बुलाने का कोई मौका नहीं छोड़ते, वो उनसे ऐसी दूरी बना लेंगे.

डॉक्टर ने जैसे ही स्वाईन फ्लू की पुष्टि की तो पड़ौसी, रिश्तेदार, दोस्त सब अचानक गायब से हो गए. डॉक्टर से भी मामला नहीं संभला तो उन्होंने बिना देर किए सविता को दिल्ली रेफर कर दिया. सिर्फ पति सुधीर साथ था एंबुलेंस में उसके इस सफर में. सविता को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया. सविता के दिल्ली चले जाने के बाद भी लोग उसके घर आने में आनाकानी करते रहे. हालचाल भी लोगों ने अगर पूछा तो फोन पर. पड़ोसियों में तो अजीब सी दहशत थी. कहीं उनके घर में भी स्वाईन फ्लू हमला न कर दे. उनके बच्चों के साथ कोई खेलने नहीं आ रहा था. अघोषित सामाजिक बहिष्कार.

उधर, अस्पताल में कोई भी डॉक्टर सुधीर को ये बताने को तैयार नहीं था कि आखिर चल क्या रहा है. स्टॉफ ने भी दूरी बना रखी थी. बस हर दिन मोटी रकम ली जाती रही. हर बार कह दिया गया कि ईलाज चल रहा है. किसी प्राइवेट अस्पताल के स्टॉफ का ये रवैया देखकर वो भी हैरान था. लेकिन किससे कहें. न परिवार का कोई साथ था और न दोस्त. सविता की हालत बिगड़ती गई. उसने बोलचाल बंद कर दी. आखिरी कोशिशों के तौर पर उसे वेंटिलेटर के सहारे कर दिया गया. दस दिन तक वह उसी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रही. चूंकि सविता गर्भवती थी, इसलिए तकरीबन 12 दिन बाद डॉक्टरों ने एक ऑपरेशन करने की बात कही. ऑपरेशन हुआ. और साथ में सविता का अंत भी.

दरअसल, इस दुखद वाकये के पीछे जिम्मेदार सब रहे... सविता, उसका परिवार. और अब आगे आने वाले हालातों के लिए पड़ोसी और दोस्त भी. सविता जब मायके आई थी तो वह स्वस्थ थी. जब आसपास स्वाइन फ्लू फैला हुआ था, तो उसे यह गलतफहमी कैसे हो गई कि उसे इन्फेक्शन नहीं हो सकता. डॉक्टर और सरकार जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं कि गर्भवती महिलाएं, बच्चे और बूढ़े स्वाइन फ्लू का आसान शिकार बन रहे हैं. इतना ही नहीं, जानलेवा स्वाइन फ्लू का शुरुआती लक्षण सामान्य जुकाम के रूप में ही सामने आता है. अब जिस तरह से पड़ोसियों ने इस परिवार से किनारा किया है, वे यह जानने से वंचित रह गए हैं कि सविता के जीवन में कहां कमी रह गई थी कि उसे इस तरह असमय दुनिया से जाना पड़ा. उन्हें यह अब भी समझ नहीं आएगा कि डर के कारण घर में खुद को बंद करने से नहीं, बल्कि वैक्सीन लगवाने से इस बीमारी से बचा जा सकेगा.

इस वाकये से दशकों पहले का वो दौर याद आता है, जब टीबी एक लाइलाज और फैलने वाली बीमारी थी. लोग जाने-अनजाने टीबी के मरीजों से ऐसा व्यवहार करते थे, जिस पर अब ताज्जुब किया जाता है. लेकिन बदला तो अब भी कुछ नहीं है.

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