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देश भर में यूथ हॉस्टल्स का बुरा हाल, राज्य सरकारों ने बस अड्डों और सरकारी आवास में बदला

8 मार्च 2018 को संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्यसभा की मानव संसाधन विकास मामलों की स्थायी समिति ने पाया कि राज्य सरकारों ने युवा छात्रावासों पर अतिक्रमण किया है और वे इनका उपयोग अपना हित साधने के लिए कर रही हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

ग्रांड ट्रंक रोड से सटे अमृतसर अंतरराष्ट्रीय बस अड्डे पर बसों की आवाजाही और मुसाफिरों की भीड़ आपको अपनी यात्रा से इतर कुछ देखने-सुनने का मौका नहीं देती है. यात्रा के बीच आपके भीतर भी एक यात्रा चल रही होती है.

मुसाफिरों की रेलमपेल में अमृतसर के अंतरराष्ट्रीय बस अड्डे पर होकर भी आप शायद वहां नहीं होते हैं. क्योंकि आप सफर पर होते हैं, लेकिन अगर बीच में थोड़ा ठहर कर बस अड्डे की इमारत के बारे में जांच पड़ताल की तो उसके बारे में जानकर हैरानी हुई.

हैरानी की वजह यह थी कि जिस जगह से आने-जाने के लिए बसें पकड़ी जा रही हैं, वह दरअसल बस अड्डे की इमारत नहीं बल्कि युवाओं के लिए बना हुआ यूथ हॉस्टल है जिसे राज्य सरकार ने बस अड्डे में तब्दील कर दिया है. एक निश्चित अवधि के समझौते के बाद कब्जे को सरकारी भाषा में अतिक्रमण कहते हैं.

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दरअसल, खेलों के लिए युवाओं को प्रोत्साहित करने के मकसद से देशभर में बनाए गए कई यूथ हॉस्टल अतिक्रमण का शिकार हो गए हैं. राज्य सरकारों के अतिक्रमण के कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनके बारे में जानकर हैरानी होगी. लेकिन यह सच है. हैरानी इसलिए कि यूथ हॉस्टल को बनाने की मुहिम यूरोप से चलकर भारत पहुंची, लेकिन यहां पर हॉस्टल अतिक्रमण का शिकार हो गए.

इनकी बदहाली की तस्वीर यह है कि कहीं यूथ हॉस्टल पट्टे पर एनजीओ को सुपुर्द कर दिए गए हैं तो कहीं उसे बस अड्डे में तब्दील कर दिया गया है. इनकी बदहाली देखने से पहले इसके इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है ताकि जाना जा सके कि युवाओं को रचने-बुनने के लिए बनाए गए इन हॉस्टलों के लिए अब तक का संघर्ष कितना व्यर्थ जा चुका है. 

संघर्ष की यात्रा

जर्मनी के एक शिक्षक रिचर्ड शिररमान ने पहली बार युवाओं के लिए विशेष छात्रावास स्थापित करने की मुहिम शुरू की थी. उन्होंने खुद अपने दम पर 1912 में ही जर्मनी के अल्टेनिया में एक युवा छात्रावास की स्थापना की थी, जहां वे अपने स्कूल के बच्चों को ट्रैकिंग के लिए प्रोत्साहित करते थे. उनकी इस मुहिम का असर रहा कि 1919 जर्मनी में यूथ हॉस्टल एसोसिएशन का गठन हो गया.

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रिचर्ड शिररमान की मुहिम जारी रही और उसका नतीजा यह हुआ कि 1932 में अमेस्टर्डम में इंटरनेशनल यूथ हॉस्टल फेडरेशन के उद्घाटन के दौरान यूथ हॉस्टल फेडरेशन कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया और इसी के साथ यूरोप में युवा छात्रावासों को स्थापित करने का चलन शुरू हुआ.

भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे से पहले युवा छात्रावास का विचार इस महाद्वीप पर दस्तक दे चुका था. पंजाब सर्किल के ब्यॉज स्काउट्स एंड गर्ल्स गाइड्स ऑफ इंडिया ने युवा छात्रावास के लिए प्रस्ताव रखा. 9 जून 1945 को शिमला के समीप तारा देवी में अविभाजित भारत का पहला यूथ हॉस्टल स्थापित किया गया. इसका उद्घाटन पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सर बर्ट्रैंड ग्लेन्सी ने किया था. बाद में भारत इंटरनेशनल यूथ फेडरेशन का सदस्य बना और 1956 में यूथ हॉस्टल्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की स्थापना की गई. इसके कार्यों से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसकी तारीफ की थी.

भारत में दस्तक

बाद में भारत के कई राज्यों में भी युवा छात्रावासों की स्थापना हुई. इन छात्रावासों का मकसद युवाओं को संवारने और उन्हें देश के समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना था. इनके निर्माण में केंद्र और राज्य सरकार दोनों भागीदार होती हैं. केंद्र सरकार जहां इनके निर्माण का खर्च उठाती है, वहीं राज्य सरकारें जमीन उपलब्ध कराने के साथ पानी, बिजली की आपूर्ति और सड़क निर्माण का कार्य देखती हैं.

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राज्य सरकारों का अतिक्रमण

भारत में इन युवा छात्रावासों को बनाने का मकसद जितना खूबसूरत था, अब उनका प्रबंधन उतना ही खराब हो चुका है. यह किसी और के नहीं, बल्कि सरकार के अतिक्रमण का शिकार हो गए हैं. राज्य सभा की मानव संसाधन विकास मामलों की स्थायी समिति के मुताबिक राज्य सरकारों ने युवा छात्रावासों पर अतिक्रमण किया है और वे इनका उपयोग अपना हित साधने के लिए कर रही हैं. 8 मार्च 2018 को संसद में पेश की गई रिपोर्ट में स्थायी समिति ने कहा है कि हरियाणा के यमुनागर और रेवाड़ी के यूथ हॉस्टलों का इनके लिए तय उद्देश्यों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है. रेवाड़ी के यूथ हॉस्टल में सैनिक स्कूल चल रहा है. हालांकि, रिपोर्ट में यमुनागर यूथ हॉस्टल के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.

सबसे बुरी तस्वीर

संसदीय समिति की रिपोर्ट से पंजाब में यूथ हॉस्टलों की सबसे बुरी तस्वीर उभरती है. रिपोर्ट के मुताबिक संगरूर के यूथ हॉस्टल को लड़कियों के लिए चलने वाले आईटीआई में तब्दील कर दिया गया है. वहीं अमृतसर में बने यूथ हॉस्टल पर राज्य परिवहन विभाग ने कब्जा जमा लिया है, जबकि इसे केवल नवंबर-दिसंबर 2005 में अंतरराज्यीय बस टर्मिनल के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई थी. हालांकि, इस पर काबिज परिवहन विभाग ने तब से न तो किराया चुकाया चुका रहा है, न ही इसे खाली कर रहा है.

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पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में भी एक यूथ हॉस्टल है, लेकिन उसे शरणार्थियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके अलावा सिक्किम के गंगटोक के यूथ हॉस्टल में विश्वविद्यालय चल रहा है. इसी तरह नगालैंड के दीमापुर के यूथ हॉस्टल को एक एनजीओ को पट्टे पर दे दिया गया. फिलहाल यहां से एक निजी विश्वविद्यालय ग्लोबल ओपन यूनिवर्सिटी का संचालन हो रहा है. गुवाहाटी का यूथ हॉस्टल खेल विभाग के कब्जे में है. इसे विभाग के दफ्तर और अफसरों के लिए आवास में तब्दील कर दिया गया है.

यूथ हॉस्टल्स पर अतिक्रमण को देखते हुए (हाल में) केंद्र सरकार के युवा मामलों के मंत्रालय के सचिव ने संबंधित राज्य सरकारों को पत्र लिखा है और अतिक्रमण हटाने के लिए कहा है. हालांकि, पंजाब जैसे राज्यों में यूथ हॉस्टल पर अतिक्रमण के इतिहास को देखते हुए लगता नहीं है कि इन्हें इतनी जल्दी मुक्ति मिलने वाली है.

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