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जब सियासत पर भारी पड़ी प्याज, इंदिरा गांधी ने भी बनाया था चुनावी मुद्दा

महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और देश में एक बार फिर प्याज के दाम आसमान छू रहे हैं. सियासत में महंगे प्याज ने कई बार सरकारों की बलि लेते हुए राजनीतिक दलों के आंखों से आंसू निकाल दिए हैं.

इंदिरा गांधी ने चुनाव में प्याज को बनाया था मुद्दा (फोटो-India Today Archives) इंदिरा गांधी ने चुनाव में प्याज को बनाया था मुद्दा (फोटो-India Today Archives)

  • प्याज की कीमतों ने कई सरकारों की ली बलि
  • इंदिरा गांधी ने 1980 में प्याज को बनाया था मुद्दा
  • 1998 में दिल्ली में सुषमा को गवांनी पड़ी सत्ता

महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और देश में एक बार फिर प्याज के दाम आसमान छू रहे हैं. सियासत में महंगे प्याज ने कई बार सरकारों की बलि लेते हुए राजनीतिक दलों के आंखों से आंसू निकाल दिए हैं. किस्सा हर बार एक होता है, बस चेहरे बदल जाते हैं. आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी ने प्याज को चुनावी मुद्दा बनाकर कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराई थी. जबकि, सुषमा स्वराज को 20 साल पहले इसी प्याज के चलते दिल्ली में अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी.

बता दें कि इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लगाने के फैसले के खिलाफ करीब दो साल तक चले आंदोलन के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी की गठबंधन सरकार सत्ता में आई. मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, लेकिन जल्द ही गठबंधन बिखरने लगा. जनता पार्टी के नेताओं की आपसी खींचतान ने सरकार की जड़ें हिला दी. जुलाई 1979 में मोरारजी को इस्तीफा देना पड़ा. चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन तीन हफ्ते के बाद उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा.

1981 में इंदिरा को भी रुलाया प्याज

1980 के चुनाव में जनता पार्टी के खिलाफ कई मुद्दे थे, लेकिन इंदिरा गांधी के भाषणों में सिर्फ प्याज छाया हुआ था. यही वजह है कि ये चुनाव देश का पहला प्याज चुनाव भी कहा जाता है. उस समय इंदिरा गांधी ने कहा था प्याज की बढ़ती कीमते पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के पतन का कारण बनी.

1980 में इंदिरा गांधी प्याज की कीमतों को मुद्दा बना कर सत्ता में लौटी थीं, लेकिन प्याज को नजरअंदाज करना उन्हें भी भारी पड़ गया था. 1980 में ही 1 रुपये प्रति किलो बिकने वाली प्याज 1981 में 6 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिकने लगी थी. 1981 में प्याज ने उनकी कुर्सी तो नहीं छीनी लेकिन प्याज ने इंदिरा सरकार के आंसू निकाल दिए थे.

मिठाई के डिब्बे में प्याज

18 साल बाद 1998 प्याज ने एक बार फिर आंसू निकाल दिए. दिवाली का मौका था प्याज के रेट आसमान छू रहे थे. कांग्रेसी नेता छगन भुजबल ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी को मिठाई के डिब्बे में प्याज भरकर भेजा और डिब्बे पर लिख दिया था, 'दिवाली एक त्योहार है, जहां आप कुछ कीमती चीज तोहफे में देते हैं. इस बार प्याज बहुत कीमती है.' इसके बाद मनोहर जोशी को शर्मिंदा होना पड़ा और उन्होंने 45 रुपये किलो की प्याज को राशन कार्ड धारकों को 15 रुपये किलो उपलब्ध कराया था.

सुषमा को गंवानी पड़ी सत्ता

1998 में बढ़ी प्याज की कीमतों से सुषमा स्वराज को दिल्ली की सत्ता गंवानी पड़ी थी. दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सुषमा स्वराज दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं और उस समय दिल्ली में प्याज 45 से 50 रुपये किलो बिक रही थी. कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाया और सुषमा स्वराज की तमाम कोशिशों के बाद भी बीजेपी अपनी सत्ता नहीं बचा पायी. सुषमा के साथ राजस्थान में भैरो सिंह शेखावत को भी महंगी प्याज के चलते हार का मुंह देखना पड़ा.  

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